पिछले वर्ष अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जोएल मोकिर, फिलिप एगियों और पीटर हॉविट को दिया गया। उन्हें यह समझाने के लिए पुरस्कृत किया गया कि नवाचार कैसे आर्थिक वृद्धि को गति प्रदान करता है। डॉ. मोकिर जिन्हें आधा पुरस्कार दिया गया उन्हें उन किताबों के लिए जाना जाता है जिनमें उन्होंने समझाया है कि कैसे विभिन्न देश दीर्घकालिक तकनीकी बदलाव और औद्योगीकरण से विकसित होते हैं।
डॉ. मोकिर की औद्योगिक क्रांति की कहानी ज्ञान के क्रमिक संचय की कहानी है। इस ज्ञान का बड़ा हिस्सा, विशेषकर ब्रिटेन में, वह जिसे निर्देशात्मक ज्ञान कहते हैं, ऐसा ज्ञान है जिसने अधिक कुशल स्टीम इंजन या कपास कातने का बेहतर तरीका खोजा। यह एक प्रसिद्ध कहानी है, जिसे उनसे पहले कई लोग बता चुके हैं। नई मशीनें अत्यंत चतुराई से बनाई गई थीं, लेकिन वे वैज्ञानिक खोज पर आधारित नहीं थीं। वे कुशल कारीगरों द्वारा वर्षों तक किए गए प्रयोग और सुधार का परिणाम थीं।
डॉ. मोकिर की अंतर्दृष्टि यह दिखाती है कि विज्ञान अब भी एक ज्ञान-भंडार और सोचने के तरीके के रूप में आवश्यक भूमिका निभा रहा था, जो आविष्कारकों के दिमाग में मौजूद था जब वे प्रयोग कर रहे थे। वैज्ञानिक दृष्टिकोणों को महान कारीगरों की मौलिकता के साथ जोड़कर उद्यमियों ने तकनीकी नवाचार को बनाए रखा और दीर्घकालिक आर्थिक प्रगति सुनिश्चित की।
डॉ. मोकिर ने हाल ही में ‘टू पाथ्स टु प्रॉस्पेरिटी: कल्चर ऐंड इंस्टीट्यूशन्स इन यूरोप ऐंड चाइना, 1000-2000’ नामक नई पुस्तक का सहलेखन किया है, जो पढ़ने में अत्यंत रोचक है। इस पुस्तक का शीर्षक वास्तव में वन पाथ टु प्रॉस्पेरिटी होना चाहिए। आधुनिक चीन पर लिखा गया अंतिम से पहले का अध्याय किसी दूसरे समृद्धि मार्ग को स्पष्ट रूप से दर्शाने में विफल रहा है।
हालांकि यूरोप में औद्योगिक क्रांति के स्रोतों की मुख्य कहानी अत्यंत संतोषजनक है। सांस्कृतिक विशेषताओं ने संस्थागत परिवर्तन की शुरुआत की, जिसने बदले में सकारात्मक सांस्कृतिक विशेषताओं को और मजबूत किया। पश्चिमी यूरोप में यह सांस्कृतिक और संस्थागत विकास वैज्ञानिक और शिल्पकारी ज्ञान के संचय को प्रेरित करता है, जिसने 18वीं और 19वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के तकनीकी परिवर्तन की नींव रखी।
डॉ. मोकिर और उनके सह-लेखक एवनर ग्रेइफ और गुइडो टाबेलिनी का तर्क है कि यूरोप की खंडित राजनीतिक व्यवस्था ने नवाचार को बढ़ावा दिया। नवाचार यथास्थिति को बदल देता है। यह अक्सर उन लोगों को असहज कर देता है जो राजनीतिक शक्ति या प्रभाव रखते हैं। खंडित यूरोप में, कोई भी नवप्रवर्तक जो प्रभावशाली लोगों को इतना नाराज कर देता कि प्रतिशोध का सामना करना पड़े, वह पास के किसी अन्य देश में जा सकता था। चीन में, वे केंद्रीय सरकार की पहुंच से बच नहीं सकते थे। यूरोपीय शहरों में वास्तविक शक्ति और संसाधनों वाले स्थानीय सरकारों के विकास ने सुरक्षित ठिकानों की उपलब्धता को बढ़ाया।
शहरों ने इसे गर्व का प्रतीक माना कि वे देश और विदेश से सर्वश्रेष्ठ और प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित कर वहां बसने के लिए प्रेरित करें। यूरोप में वैज्ञानिक समाजों का गठन हुआ, जिसने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सोच को फैलाया। अवलोकन और प्रयोग पर आधारित नए सिद्धांतों ने कट्टरपंथ पर आधारित पुराने सिद्धांतों की जगह ले ली। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण केवल वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीति, व्यापार और नगर प्रशासन के व्यापक अभिजात वर्ग तक फैल गया। सोचने के इन नए तरीकों का प्रसार उद्यमियों को उस समय महत्त्वपूर्ण सहारा देता था जब वे स्थापित शक्तियों को चुनौती देते थे। विचारों के आदान-प्रदान और बहस का ऐसा वातावरण स्वीकृत ज्ञान की परतों के संचय को बढ़ावा देता था।
ये अंतर्दृष्टियां केवल दो, पांच और दस शताब्दियों पहले के यूरोप और चीन को समझने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं। ये हमारे लिए भारत में भी मायने रखती हैं, क्योंकि हम 2047 तक विकसित देश का दर्जा हासिल करना चाहते हैं। हमें वही फलदायी सांस्कृतिक दृष्टिकोण और संस्थागत परस्पर क्रिया चाहिए, जो तकनीकी परिवर्तन की नींव प्रदान करती हो। इससे उच्च वृद्धि दर प्राप्त होगी। तेजी से विकास के लिए सामाजिक पूंजी की आवश्यकता होती है, जिसके कठोर और नरम दोनों घटक होते हैं। कठोर घटक हैं जनसंख्या का शिक्षा और कौशल स्तर। उच्च गुणवत्ता वाली स्कूल शिक्षा प्रणाली शायद दीर्घकालिक प्रगति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चीज है।
उत्पादकता और निहित ज्ञान के के कौशल व्यापक कार्यबल में कार्य अनुभव से आते हैं। आज चीन दुनिया के विनिर्माण उत्पादन का एक-तिहाई हिस्सा रखता है, और इसके साथ ही हर उद्योग में गहराई से जमे हुए विनिर्माण कौशल की सबसे व्यापक श्रृंखला को लागू करने की क्षमता भी। यही हमारी प्रतिस्पर्धा है। हमें कंपनियों द्वारा लाखों विनिर्माण नौकरियों में गंभीर निवेश की आवश्यकता है, जो कौशल और कार्य नैतिकता का निर्माण करें। हाल ही में फोन असेंबली में हमारे निवेश, जिसमें अब 2 लाख से अधिक लोग कार्यरत हैं, एक शुरुआत है।
सामाजिक पूंजी का एक नरम घटक भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। यूरोप में प्रगति का एक विचार विकसित हुआ, और इसके साथ विकास की भूख भी पैदा हुई। अधिक से अधिक व्यक्तियों ने विश्वास करना शुरू किया कि उनके पास अपनी भूमिका निभाने की क्षमता है और प्रत्येक पीढ़ी के साथ जीवन बेहतर होता जाएगा। भारत में यह भूख भरपूर मात्रा में मौजूद है। 1991 से, हममें से अधिक से अधिक लोगों ने यह मानना शुरू किया है कि हमारे पास अपनी जिंदगी सुधारने की क्षमता है। फिर भी हम अभी बहुमत में नहीं हैं; हममें से बहुत से लोग सोचते हैं कि सरकार या कोई महान नेता ही हमारे जीवन को बेहतर बनाएगा। इसलिए हमें अभी काम करना है।
हाल के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कारों से तीसरा सबक है: क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन (रचनात्मक विनाश)। डॉ. मोकिर के साथ नोबेल पाने वाले जोड़ीदार, एगियों और हॉविट, को इसी विषय पर उनके काम के लिए उद्धृत किया गया। औद्योगिक क्रांति ने महान प्रगति को आगे बढ़ाया, लेकिन साथ ही बड़ी दुर्दशा भी पैदा की क्योंकि कुशल श्रमिक नई तकनीक के कारण बेरोजगार हो गए। एक स्थायी विश्वास था कि कुल रोजगार बढ़ता रहेगा, भले ही व्यक्तिगत पेशे गायब हो जाएं। आंकड़ों ने इस विश्वास को सही साबित किया।
कोई यह सुझाव नहीं देता कि हम उसी रास्ते पर चलें जो जितना शक्तिशाली था उतना ही क्रूर भी। हमें सुरक्षा जाल, समायोजन कार्यक्रम और पुनः प्रशिक्षण योजनाओं की आवश्यकता है क्योंकि नई तकनीक मौजूदा रोजगार को बाधित करती है। लेकिन हमें तकनीकी परिवर्तन के लिए भूख भी चाहिए, जो तेज प्रगति को आगे बढ़ाए, और जो सृजन करते हुए विनाश भी करे। हमारा दिवालिया एवं शोधन अक्षमता अधिनियम 2016 में पारित हुआ, जिसने ऐसे ही पुनर्गठन को तेज करने का वादा किया।
लेकिन सिर्फ एक उद्योग यानी एयरलाइंस को देखें तो जेट एयरवेज ने 2019 में उड़ान बंद कर दी और गो फर्स्ट ने 2023 में। दोनों एयरलाइनों के विमान अब भी हमारे हवाई अड्डों पर खड़े हैं। नतीजा यह है कि एक मौजूदा कंपनी के पास 60 फीसदी बाजार हिस्सेदारी है। जब वह लंबे समय से घोषित नियमों के लिए तैयारी नहीं करती, तो पूरे उद्योग में अराजकता पैदा करने की क्षमता रखती है।
यूरोप की वर्तमान कठिनाइयां काफी हद तक इस तथ्य से उत्पन्न होती हैं कि उसने विकास की भूख को खो दिया है। उसने रचनात्मक विनाश के प्रति सहनशीलता भी खो दी है, और पुराने पेशों तथा स्थापित कंपनियों से चिपके रहने का विकल्प चुना है। अमेरिका की वर्तमान शुल्क नीति भी ठीक उसी दिशा में जा रही है।
विकसित भारत की मांग है कि हम इससे बेहतर करें। हम एक समाज के रूप में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में निवेश करें। विनिर्माण और सेवाओं दोनों में उद्यमी क्षमता और रोजगार में निवेश करें, जिससे हमारे व्यापक कार्यबल को कौशल मिले। हम एक समाज के रूप में प्रगति के विचार पर विश्वास रखें, कि हमारा भविष्य बेहतर होगा, और उस बेहतर भविष्य को हासिल करने की जिम्मेदारी सरकार पर नहीं बल्कि हम पर स्वयं हो। और यह भी कि हम उस रचनात्मक विनाश को अपनाएं जो अक्षम स्थापित कंपनियों को अधिक चुस्त प्रतिस्पर्धियों से बदल देता है।
(लेखक फोर्ब्स मार्शल के सह-अध्यक्ष, सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष और सेंटर फॉर टेक्नॉलजी इनोवेशन ऐंड इकनॉमिक रिसर्च के अध्यक्ष हैं)