यूरोपीय संघ (ईयू) से समझौता भारत के वस्त्र और परिधान उद्योग के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। समझौते की बदौलत भारत के निर्माताओं को 95 अरब डॉलर के यूरोपीय बाजार में शून्य शुल्क पर पहुंच मिलेगी। अभी यूरोपीय बाजार में भारत की हिस्सेदारी बमुश्किल 6 प्रतिशत या 5.5 अरब डॉलर है।
उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है कि यह अगले पांच वर्षों में दोगुनी होकर 11 अरब डॉलर को पार कर सकती है। यह समझौता वस्त्र और परिधान क्षेत्र के 2030 के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य 100 अरब डॉलर को हासिल करने में अहम भूमिका निभा सकता है जबकि अभी इस क्षेत्र का वित्त वर्ष 25 में निर्यात 37.7 अरब डॉलर है। यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब भारत के निर्यातकों को अमेरिका के बाजार में शुल्क बढ़ाने के कारण घाटे का सामना करना पड़ा है। बुनाई वस्त्रों के केंद्र तिरुपुर को अमेरिकी शुल्क में वृद्धि के कारण वर्ष 2025 में 15,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।
एपैरल एक्सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल (एईपीसी) के चेयरमैन ए. शक्तिवेल ने बताया, ‘मुक्त व्यापार समझौता लागू होने के बाद भारत का परिधान निर्यात सालाना आधार पर 20 से 25 प्रतिशत बढ़ सकता है। ईयू के मार्केट में अभी इसकी वृद्धि दर 3.01 प्रतिशत है।’ यूरोप के 95 अरब डॉलर के बाजार पर चीन और बांग्लादेश की 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है।
बांग्लादेश को ‘एवरीथिंग बट आर्म्स’ (ईबीए) पहल के तहत शुल्क-मुक्त और कोटा-मुक्त पहुंच का लाभ मिला हुआ है। इसका कारण यह है कि वह अल्प विकसित देश (एलडीसी) है। यूरोपीय संघ के बाजार में तरजीही शुल्क पहुंच का लाभ उठाने वाले अन्य प्रतिस्पर्धी तुर्की और वियतनाम हैं। इंडियन टेक्सप्रेन्योर्स फेडरेशन (आईटीएफ) के संयोजक प्रभु दामोधरन ने कहा, ‘एक साल के भीतर शुल्क-मुक्त पहुंच मिलने की उम्मीद के साथ यूरोपीय संघ को भारत के परिधान निर्यात में 15 प्रतिशत की सीएजीआर वृद्धि हो सकती है। यह अगले पांच वर्षों में दोगुना होकर 11 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा।’
कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (सीआईटीआई) के चेयरमैन अश्विनी चंद्रन ने बताया, ‘यह समझौता ऐसे दौर में हुआ है जब भारत के वस्त्र और परिधान क्षेत्र को अमेरिका के भारी भरकम शुल्क से दबाव का सामना करना पड़ा है। यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते की घोषणा से जबरदस्त आत्मविश्वास बढ़ा है।’