मुक्त व्यापार समझौते के तहत भारत को यूरोपीय यूनियन से कार्बन विनियमन पर किसी तरह की रियायत नहीं मिली है। हालांकि, भारत ने यह आश्वासन हासिल कर लिया है कि किसी भी अन्य देश को दी जाने वाली कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) संबंधी कोई भी छूट भारतीय निर्यातकों पर भी लागू होगी।
सरकारी अधिकारियों ने कहा कि यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) विनियमन (जो 1 जनवरी से लागू हुआ) वार्ता में सबसे कठिन मुद्दों में से एक था क्योंकि ब्रसेल्स किसी भी देश को विशिष्ट छूट या रियायत देने को तैयार नहीं था।
इस एफटीए में अधिकारों के पुनर्संतुलन का प्रावधान भी है, अगर इस विनियमन के तहत यूरोपीय संघ के उपाय भारतीय फर्मों को समझौते के लाभों को प्रभावित करते हैं या अगर यूरोपीय संघ इसके लिए आधार स्थापित करने में विफल रहता है।
कार्बन रिसाव को रोकने के मकसद से बनाया गया सीबीएएम यूरोपीय संघ में प्रवेश करने वाले कार्बन-गहन उत्पादों के प्रोडक्शन के दौरान उत्सर्जित कार्बन पर उचित मूल्य निर्धारित करने का एक साधन है। इस नियम के तहत, 50 टन से अधिक सीमेंट, लोहा और इस्पात, एल्युमीनियम, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन के आयात के लिए आयात के समय ऑथराइजेश की आवश्यकता होती है। हालांकि यह उपाय केवल भारत तक सीमित नहीं है और सभी देशों पर लागू होगा।
भारतीय कंपनियों को उनके कार्बन डेटा के सत्यापन में सहायता करने और यूरोपीय संघ के नियमों को बेहतर ढंग से समझने के लिए एक तकनीकी समूह का गठन किया जाएगा। इससे भारत की भावी कार्बन मूल्य निर्धारण प्रणाली को मान्यता मिल सकेगी और दोहरे कराधान से बचा जा सकेगा।
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने मंगलवार को पत्रकारों से कहा, एफटीए के तहत सीबीएएम से संबंधित कुछ प्रावधानों पर हमने सहमति जताई है। इनमें से पहला एक तकनीकी संवाद स्थापित करने पर सहमति बनी है, जो सीबीएएम विनियमन के बावजूद हमारे उद्योगों को बाजार तक पहुंच प्रदान करने के मार्ग को स्पष्ट करेगा। हम यह सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करेंगे कि भारत में सीबीएएम के सत्यापनकर्ताओं को भी यूज एजेंसी द्वारा मान्यता प्राप्त हो, ताकि हमारा उद्योग उनका लाभ उठा सके।
अग्रवाल ने कहा, हम दोनों अर्थव्यवस्थाओं में कार्बन ट्रेडिंग प्रणाली (सीबीएएम) के मापन की तकनीकी प्रक्रियाओं को समझने के लिए मिलकर काम करेंगे। यह समूह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य में जो भी भारतीय कार्बन ट्रेडिंग प्रणाली लागू हो, उसे भी इसमें शामिल किया जाए, ताकि भारत में कार्बन ट्रेडिंग मूल्य निर्धारण प्रणाली का हिस्सा रहे उद्योगों को उनके भुगतान का हिसाब मिल सके।
एक सरकारी अधिकारी ने कहा कि किसी भी नए उपाय के खिलाफ भारत के हितों की रक्षा के लिए एक नॉन-वायलेंस क्लाउज मौजूद है। अधिकारी ने कहा, समझौते में नॉन-वायलेंस क्लाउज भी है। अगर बाद में कोई नया उपाय आता है, जो मुक्त व्यापार समझौते के तहत हमें दी गई रियायतों को रद्द कर देता है तो हमारे पास परामर्श का अधिकार है और अगर परामर्श से कोई परिणाम नहीं निकलता है तो हमारे पास पुनर्संतुलन का अधिकार है।
भारत एक मुक्त व्यापार समझौता भागीदार के रूप में यूरोपीय संघ के इस्पात आयात कोटा तक बेहतर और अधिक पहुंच की मांग भी कर रहा है।
भारत का यह अनुरोध ऐसे समय आया है जब यूरोपीय परिषद ने यूरोपीय संसद के साथ उस नियम पर बातचीत करने का दायित्व स्वीकार किया है, जो वैश्विक अति-उत्पादन के यूरोपीय संघ के इस्पात बाजार पर पड़ने वाले नकारात्मक व्यापार प्रभावों का हल निकालता है। यह नया नियम मौजूदा इस्पात सुरक्षा उपाय का स्थान लेगा, जिसकी अवधि 30 जून को समाप्त हो रही है। परिषद का दायित्व एक ऐसा संतुलन स्थापित करने का है, जिसका मकसद यूरोपीय इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक उच्च स्तर की सुरक्षा बनाए रखना है।