अब दिसंबर 31 की डेडलाइन गुजर चुकी है, तो कई लोग सोच रहे होंगे कि इनकम टैक्स रिटर्न में अगर कोई इनकम छूट गई या रिपोर्टिंग में चूक हो गई, तो अब क्या करें? लेकिन घबराने की बात नहीं है। इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 139(8A) के तहत एक और विकल्प है, जिसे अपडेटेड रिटर्न, यानी ITR-U कहते हैं। ये उन टैक्सपेयर्स के लिए बड़ा सहारा है जो पहले रिटर्न फाइल करते वक्त कुछ भूल गए थे। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये तरीका टैक्स अथॉरिटी को बिना झगड़े के पैसे इकट्ठा करने में मदद करता है, और टैक्सपेयर्स को भी अपनी गलती सुधारने का मौका देता है।
इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 139 में रिटर्न फाइल करने के सारे नियम बताए गए हैं। ओरिजिनल रिटर्न सेक्शन 139(1) के तहत ड्यू डेट तक फाइल होता है। अगर देरी हो जाए, तो सेक्शन 139(4) से दिसंबर 31 तक बिलेटेड रिटर्न डाल सकते हैं, लेकिन इसमें इंटरेस्ट और लेट फीस लगती है। सेक्शन 139(5) से रिवाइज्ड रिटर्न भी उसी डेडलाइन तक फाइल कर सकते हैं, अगर कोई गलती सुधारनी हो। लेकिन अपडेटेड रिटर्न इन सारी डेडलाइनों से आगे जाता है। ये सेक्शन 139(8A) के तहत है, जहां टैक्सपेयर्स अपनी मर्जी से पहले न बताई गई इनकम को डिस्क्लोज कर सकते हैं। इसके लिए एक्स्ट्रा टैक्स देना पड़ता है।
नांगिया एंड कंपनी LLP के डायरेक्टर इतेश दोधी बताते हैं कि यह तरीका टैक्सपेयर्स को पुरानी चूकों को ठीक करने का मौका देता है। साथ ही, टैक्स डिपार्टमेंट को भी बिना कोर्ट-कचहरी के टैक्स वसूलने में आसानी होती है। मतलब, दोनों तरफ से फायदा। ये सिर्फ उन मामलों के लिए है जहां टैक्स कम पड़ा हो, और अब उसे ठीक करना हो।
ये विकल्प हर तरह के टैक्सपेयर्स के लिए खुला है, चाहे इंडिविजुअल हो, फर्म हो या कंपनी। यहां तक कि अगर किसी साल का रिटर्न ही नहीं फाइल किया था, तब भी अपडेटेड रिटर्न डाल सकते हैं। लेकिन एक्ट में कुछ जगहों पर रोक है। अगर इनकम छूट गई हो, गलत डिडक्शन या एग्जेम्प्शन क्लेम कर लिया हो, या रिपोर्टिंग में कोई भूल से टैक्स कम हो गया हो, तो ITR-U का इस्तेमाल करें।
BDO इंडिया की पार्टनर दीपाश्री शेट्टी कहती हैं कि ये सुविधा सिर्फ अपनी मर्जी से एक्स्ट्रा इनकम बताने और उस पर टैक्स चुकाने के लिए है। लेकिन याद रखें, अगर अपडेटेड रिटर्न से रिफंड बनता हो या टैक्स लायबिलिटी कम होती हो, तो ये फाइल नहीं कर सकते। साथ ही, अगर सर्च, सर्वे, रीअसेसमेंट या प्रॉसीक्यूशन की कार्रवाई शुरू हो चुकी हो, या टैक्स अथॉरिटी ने पहले से ही वो इनकम पकड़ ली हो, तो ये ऑप्शन बंद। दोधी जोड़ते हैं कि ये सिर्फ एन्फोर्समेंट एक्शन शुरू होने से पहले वाली वॉलंटरी डिस्क्लोजर के लिए है।
अपडेटेड रिटर्न फाइल करने की मियाद असेसमेंट ईयर के अंत से चार साल, यानी 48 महीने तक है। मिसाल के तौर पर, अगर 2023-24 का असेसमेंट ईयर है, तो 2028 तक का समय मिलेगा। लेकिन इसमें एक्स्ट्रा चार्ज लगते हैं। एडिशनल इनकम पर रेगुलर टैक्स तो देना ही पड़ता है, साथ ही सेक्शन 234A, 234B और 234C के तहत इंटरेस्ट भी।
इसके अलावा, सेक्शन 140B के तहत एक्स्ट्रा टैक्स लगता है, जो डिले पर निर्भर करता है। अगर असेसमेंट ईयर के अंत से 12 महीने के अंदर फाइल करें, तो 25% एक्स्ट्रा टैक्स। 24 महीने में तो 50%, 36 महीने में 60% और 48 महीने में 70%। शेट्टी बताती हैं कि ये एडिशनल टैक्स अनिवार्य है, इसे माफ नहीं किया जा सकता। मतलब, जितनी जल्दी फाइल करें, उतना कम बोझ।
अपडेटेड रिटर्न का मकसद है कि ओरिजिनल रिटर्न में छूट गई इनकम या डिस्क्लोजर को ठीक करना। डेलॉयट इंडिया के पार्टनर सुधाकर सेतुरमन कहते हैं कि खुद से ITR-U फाइल करने पर एक्स्ट्रा टैक्स कम लगता है, और पेनल्टी, प्रॉसीक्यूशन या लंबी कानूनी लड़ाई से बच जाते हैं। ये प्रोएक्टिव कंप्लायंस दिखाता है, जो टैक्स अथॉरिटी को अच्छा लगता है। नोटिस और स्क्रूटिनी का खतरा भी कम हो जाता है। कुल मिलाकर, ये टैक्सपेयर्स को अपनी गलती मानकर आगे बढ़ने का रास्ता देता है।
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हालांकि ITR-U फाइल करने से ऑटोमैटिक स्क्रूटिनी नहीं शुरू होती, लेकिन अगर डिस्क्लोजर बड़ा या अजीब लगे, तो टैक्स डिपार्टमेंट जांच कर सकता है। सेतुरमन बताते हैं कि अगर ये नॉन-कंप्लायंस का पैटर्न दिखाता हो, तो दूसरे असेसमेंट ईयर भी चेक हो सकते हैं, लेकिन टाइम लिमिट के अंदर। और ये भी याद रखें कि अगर ITR-U न फाइल करें, तो भी असेसमेंट या रीअसेसमेंट में चूक पकड़ी जा सकती है। मतलब, ये कोई फुलप्रूफ शील्ड नहीं है, बल्कि एक रिस्क मैनेजमेंट टूल है।
कई टैक्सपेयर्स गलती से ITR-U से रिफंड क्लेम करने या टैक्स कम करने की कोशिश करते हैं, जो गलत है। या फिर सर्च, सर्वे या असेसमेंट चल रहा हो, तब भी फाइल करने लगते हैं, जबकि ये इनएलिजिबल है। सेक्शन 140B और 234A, B, C के तहत एक्स्ट्रा टैक्स और इंटरेस्ट की कैलकुलेशन में चूक होना भी कॉमन है।
शेट्टी सलाह देती हैं कि ITR-U को रिवाइज्ड रिटर्न की जगह न समझें। साथ ही, एडिशनल इनकम के लिए डॉक्यूमेंटेशन जरूर रखें, ताकि बाद में प्रूफ दे सकें। ये छोटी-छोटी बातें नजरअंदाज करने से बड़ा नुकसान हो सकता है।
अगर गलती साफ नजर आ रही हो, तो सेतुरमन की राय है कि ITR-U खुद से फाइल कर दें। इससे कंप्लायंस टाइम पर होता है और रिस्क कम। नोटिस का इंतजार करने से ज्यादा पेनल्टी, इंटरेस्ट, रीअसेसमेंट और यहां तक कि प्रॉसीक्यूशन का खतरा बढ़ जाता है। शेट्टी कहती हैं कि अमाउंट कितना है, सेक्शन 139(8A) के तहत एलिजिबल हैं या नहीं, और एक्स्ट्रा टैक्स का कॉस्ट क्या बनेगा, ये सब सोचकर फैसला लें। प्रोएक्टिव रहना हमेशा बेहतर।
सोर्स: Deloitte India