बजट जिस पृष्ठभूमि में तैयार होता है वही आगे का माहौल तय करती है। मगर इस साल हालात भ्रमित करने वाले लग रहे हैं। ऐसे पर्याप्त संकेत हैं जो यह बताते हैं कि आर्थिक वृद्धि कमजोर और मजबूत दोनों है। कुछ लोगों का तर्क है कि आर्थिक वृद्धि तेजी की ओर बढ़ रही है। वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि के आंकड़े मजबूत रहे हैं और कई क्षेत्रों में ऋण आवंटन बढ़ रहा है। मगर कुछ लोगों का यह भी कहना है कि अच्छा दौर खत्म हो गया है।
वर्ष 2025 में कई बातें अनुकूल रहीं मसलन अच्छा मॉनसून, तेल की कम कीमतें, मुद्रास्फीति में कमी आदि। ये सभी बातें अनौपचारिक क्षेत्र के लिए फायदेमंद थीं। नीतिगत नरमी जैसे कर दरें कम रहने से खपत को मदद मिली और कम ब्याज दरों से भी खूब मदद मिली। मगर वह दौर शायद पीछे चला गया है। ऐसे लोगों का कहना है कि नॉमिनल जीडीपी वृद्धि बेहद कमजोर रही है और व्यापार घाटा पूरा करने के लिए विदेशी निवेश अपर्याप्त रहा है। पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) के आंकड़े भी मजबूत रहने के बाद अब कमजोर होने लगे हैं।
मगर हमारा मानना है कि वास्तविकता कहीं न कहीं इन दोनों दलीलों के बीच है। भारत इस समय एक महत्त्वपूर्ण बिंदु पर खड़ा है। साल 2025 काफी हद तक अनौपचारिक क्षेत्र की मजबूती की कहानी लिख गया मगर अब अवसर है कि 2026 में औपचारिक क्षेत्र को दुरुस्त किया जाए। ऋण आवंटन में वृद्धि और पूंजीगत व्यय में मजबूती के रूप में कुछ सकारात्मक संकेत देख रहे हैं। ऋण आवंटन बढ़ रहा है मगर यह सिलसिला लगातार बनाए रखना मुख्य चुनौती है। रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, बिजली और धातु जैसे कुछ क्षेत्रों में पूंजीगत व्यय बढ़ रहा है। मगर यह बहुत व्यापक नहीं है। पूर्व में मजबूत निवेश (जिससे घरेलू वृद्धि को बढ़ावा मिला) केवल उन वर्षों में हुआ जब निर्यात मजबूत था। अमेरिका द्वारा भारत के निर्यात पर लगाए गए शुल्क में अगर कमी होती है ताे वह एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
अनौपचारिक से औपचारिक क्षेत्र में और खपत से निवेश में सफल बदलाव सुनिश्चित करने के लिए नीति निर्माता क्या भूमिका निभा सकते हैं? इसमें दो चीजें मदद कर सकती हैं। पहली, अल्पावधि में राजकोषीय और मौद्रिक नीति के बीच एक अच्छा संतुलन और दूसरी है मध्यम अवधि में रिटर्न बढ़ाने और जोखिम कम करने वाले महत्त्वपूर्ण सुधार।
आइए, शुरुआत राजकोषीय और मौद्रिक नीति के बीच संतुलन के साथ करते हैं। क्या राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति एक स्थिर संतुलन की ओर बढ़ सकती है जो स्थिरता और पूर्वानुमान प्रदान करे? क्या यह नीति सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के साथ-साथ निवेशकों और बचतकर्ताओं के हितों के बीच एक अच्छा संतुलन बना सकती है? बेहतर संतुलन अक्सर तटस्थ नीति की अवधारणा से संबंधित होता है मगर व्यवहार में इसका क्या मतलब है?
राजकोषीय मोर्चे पर घाटा और ऋण अनुपात ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। केंद्र सरकार का लक्ष्य वित्त वर्ष 2031 तक सार्वजनिक ऋण अनुपात को कम कर कोविड पूर्व स्तर तक ले जाना है जिसके लिए अगले पांच वर्षों में निरंतर राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता होगी। आगामी बजट में हम सरकार से निरंतर संयम बरतने की उम्मीद करते हैं यानी वित्त वर्ष 2027 के लिए राजकोषीय घाटा सीमित रखने का लक्ष्य और (वित्त वर्ष 2026 के 4.4 फीसदी से जीडीपी का 4.2 फीसदी) घटाना। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए बुनियादी ढांचे पर खर्च लगातार जारी रखते हुए योजनाओं की संख्या घटाकर इसे थोड़ा समेकित करने की उम्मीद करते हैं।
मगर असल समस्या राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति से जुड़ी है। राज्यों में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के अभाव में सार्वजनिक ऋण अनुपात अगले कुछ वर्षों तक बढ़ता रहेगा। हालांकि, अच्छी बात यह है कि 3 फीसदी की राजकोषीय सीमा राज्यों का घाटा सीमित रख सकती है। कुल मिलाकर, राजकोषीय नीति 2026 तक तंग रहने की संभावना है।
हम जॉन टेलर द्वारा प्रतिपादित ढांचे में तटस्थ मौद्रिक नीति का अनुसरण करते हैं। पिछले एक दशक में भारत के लिए यह नीति कारगर रही है। हमें लगता है कि अगले साल मुद्रास्फीति 4 फीसदी के लक्ष्य से ठीक नीचे रहेगी (आंशिक रूप से चीन से आयातित अपस्फीति के कारण) जिससे ब्याज दरें बढ़ाने का कोई दबाव नहीं है। वास्तव में अगर वृद्धि दर में गिरावट आती है तो और ढील देने की गुंजाइश है।
सख्त राजकोषीय और आसान मौद्रिक नीति का एक संयोजन (जो एक बेहतर आर्थिक संतुलन बनाता है) पूरे वर्ष सभी परिसंपत्ति श्रेणियों के लिए सकारात्मक होना चाहिए खासकर अन्य उभरते बाजारों की तुलना में कम प्रदर्शन वाले वर्ष के बाद। भारत का केंद्रीय बैंक बॉन्ड खरीद रहा है और हम बजट में राजकोषीय विवेक की उम्मीद करते हैं। जहां तक शेयरों की बात है तो हाल में हुई आर्थिक सुधारों की घोषणाएं, नॉमिनल जीडीपी वृद्धि में क्रमिक वृद्धि और अधिक उचित मूल्यांकन से मदद मिलनी चाहिए। मुद्रा की बात करें तो रुपया पहले ही बहुत गिर चुका है जबकि बेहतर बॉन्ड और शेयर अनुमान पोर्टफोलियो निवेश बढ़ा सकते हैं।
ये सभी उपाय अस्थायी तौर पर तो आर्थिक गतिविधियां प्रोत्साहित कर सकते हैं मगर अर्थव्यवस्था एवं बाजार में निरंतर वृद्धि के लिए सुधार महत्त्वपूर्ण हैं। पिछले वर्ष में कुछ अहम आर्थिक सुधार शुरू हुए हैं और हमें उम्मीद है कि 2026 में उन्हें और अधिक सक्रियता से आगे बढ़ाया जाएगा। घरेलू मोर्चे पर इनमें क्रमशः केंद्र और राज्य सरकार के स्तर पर विनियमन हटाने का अभियान शामिल है। बाहरी मोर्चे पर इनमें सीमा शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं जैसे गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (क्यूसीओ) को कम करना और न केवल पश्चिमी देशों के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करना शामिल है बल्कि पूर्वी देशों (क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ बेहतर ढंग से एकीकृत होने के लिए) के साथ व्यापार संबंध गहरे करना भी शामिल है।
मगर कहानी यहां खत्म नहीं होती। ऊपर जिन सुधारों का जिक्र है वे अगर अच्छी तरह लागू किए जाएं तो फायदे (रिटर्न) बढ़ सकते हैं। मगर हमें जोखिम कम करने की भी उतनी ही जरूरत है। यहां नीतिगत पारदर्शिता, स्थिरता और पूर्वानुमान योग्य बातों पर ध्यान केंद्रित करना अहम है। नियम-कायदे या उनकी व्याख्या को अचानक बदल देना ठीक नहीं होगा। यह सब इस महत्त्वपूर्ण नीतिगत हालात में अधिक स्वागत योग्य निवेश वातावरण तैयार करने में योगदान कर सकते हैं।
(लेखिका एचएसबीसी में मुख्य भारत अर्थशास्त्री और मैक्रो रणनीतिकार, आसियान अर्थशास्त्री हैं)