व्यापार संबंध: भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) इस सप्ताह मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को अंतिम रूप दे सकते हैं। कुछ संवेदनशील क्षेत्र एफटीए से बाहर रखे जा सकते हैं फिर भी दोनों पक्षों के लिए यह (एफटीए) एक बड़ी सफलता होगी। हालांकि, अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है। रूस से तेल खरीदने से नाराज होकर अमेरिका ने भारत पर शुल्क लगा दिए हैं जिससे दोनों देशों के संबंध और बिगड़ गए हैं। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और समझौते में देरी से भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।
वस्तुओं के व्यापार के अलावा इस सौदे का प्रत्यक्ष विदेशी और पोर्टफोलियो निवेश पर भी असर पड़ता है। उदाहरण के लिए पिछले कई महीनों में शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों द्वारा भारी बिकवाली से रुपया काफी दबाव में आ गया है। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि क्या भारत समग्र रूप से शुल्कों को काफी हद तक कम कर सकता है जिन्हें लेकर अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि निर्यात को स्थायी रूप से बढ़ावा देने के लिए यह जरूरी है। भारत ईयू सहित बड़े देशों एवं समूहों के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार है इसलिए सामान्य तौर पर शुल्कों को कम करना अब अपेक्षाकृत आसान रहना चाहिए।
वित्तीय प्राथमिकताएं: अगले वित्त वर्ष से केंद्र सरकार ऋण-सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुपात को लक्ष्य बनाने की दिशा में शुरुआत करेगी। संभवतः राजकोषीय घाटे से जुड़ा लक्ष्य निर्धारित करने के बजाय ऋण-जीडीपी अनुपात मानक के साथ आगे बढ़ने से सरकार की वित्तीय स्थिति के प्रबंधन में अधिक लचीलापन आएगा। भारत का सामान्य सरकारी ऋण जीडीपी का 80 फीसदी से अधिक है। यह अधिक है और इसे नियंत्रित स्तर पर लाने के लिए महत्त्वपूर्ण समायोजन करना और राजकोषीय घाटा सीमित रखना होगा।
यह पहलू विचार करने योग्य है कि वित्तीय बाजार को इस आशंका से निपटने के लिए तैयार रहना होगा कि राजकोषीय घाटा मध्यम अवधि में जीडीपी के 3 फीसदी तक नहीं सिमट सकता है जैसा कई लोगों ने उम्मीद जताई थी। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकारी प्रतिभूतियों (बॉन्ड) की आपूर्ति में बहुत अधिक कमी आती नहीं दिख रही है। इनकी आपूर्ति बाजार के लिए चिंता का विषय रही है। इस बदलाव से सबको सावधानीपूर्वक रूबरू करना होगा। यह भी साफ नहीं है कि क्या राज्यों को वित्तीय प्रबंधन में इसी तरह की छूट दी जाएगी। कुछ राज्यों पर ऋण चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुका है और इस पर सक्रियता से ध्यान देने की आवश्यकता है।
सुधरते संकेतक: आने वाले हफ्तों में सांख्यिकी विभाग जीडीपी, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के लिए नई श्रृंखला जारी करेगा। सीपीआई में खाद्य पदार्थों का भारांश काफी घटने की उम्मीद है जिससे यह अधिक स्थिर हो जाएगा और इसे लेकर अनुमान लगाना भी आसान हो जाएगा। नई सीपीआई श्रृंखला मौद्रिक नीति के लिए विशेष रुचि की होगी। नई जीडीपी श्रृंखला से भारत के राष्ट्रीय खातों में कई कमजोरियां दूर होने की उम्मीद है जिन्हें लेकर अर्थशास्त्री वर्षों से आगाह करते रहे हैं। व्यापक दायरे और बेहतर कार्य प्रणाली वाली एक नई श्रृंखला अर्थव्यवस्था की बेहतर तस्वीर पेश करेगी और भारत के नीति प्रबंधकों सहित सभी हितधारकों को फायदा पहुंचाएगी।
हालांकि, नई श्रृंखला 1 फरवरी को केंद्रीय बजट प्रस्तुत होने के बाद जारी की जाएगी और अगर अर्थव्यवस्था के आकार को नए आंकड़ों के आधार पर समायोजित किया जाता है तो बजट अनुमानों पर दोबारा विचार करने की जरूरत पेश आ सकती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए संशोधन की बेहतर योजना तैयार की जा सकती थी।
अमेरिकी केंद्रीय बैंक पर दबाव: वैश्विक वित्तीय बाजार में और अन्य हितधारकों के बीच अमेरिकी केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर उठे सवाल की खूब चर्चा हो रही है। एक अभूतपूर्व घटनाक्रम में फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष जेरोम पॉवेल पर आपराधिक आरोप तय करने की धमकी दी गई है। पॉवेल ने कहा है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के इशारे पर काम नहीं करने की वजह से उन्हें यह धमकी मिली है। ट्रंप प्रशासन की कार्रवाई की कई लोगों ने निंदा की है जिसमें फेडरल रिजर्व के पूर्व अध्यक्ष एवं सीनेट बैंकिंग समिति के रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य भी शामिल हैं।
एक अहम सवाल यह है कि फेडरल रिजर्व कब तक अपना बचाव कर पाएगा। पॉवेल का कार्यकाल मई में समाप्त हो रहा है और ट्रंप के पसंदीदा व्यक्ति को अध्यक्ष पद पर बैठाने की अकटल तेज हो गई है। फेडरल रिजर्व दुनिया का सबसे ताकतवर केंद्रीय बैंक है। अगर इसकी स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता खतरे में दिखाई देगी तो वित्तीय बाजार में ऐसी अस्थिरता आ सकती है जिसका अनुमान लगा पाना भी मुश्किल है।
अमेरिका के वित्तीय बाजार में सबसे अधिक लेनदेन होता है और डॉलर दुनिया की सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्रा है। मौजूदा हालात को देखते हुए 2026 फेडरल रिजर्व और आधुनिक केंद्रीय बैंकिंग के इतिहास के लिए एक निर्णायक वर्ष हो सकता है।
अर्श या फर्श पर: साल 2026 आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के लिए भी एक निर्णायक वर्ष साबित हो सकता है। एआई से जुड़ी क्षमताओं के विकास पर अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार एआई अनुप्रयोगों में वार्षिक निवेश 2030 तक बढ़कर 1.5 लाख करोड़ डॉलर पार कर सकता है। हालांकि, एआई निवेश से कमाई अब तक उत्साहजनक नहीं रही है। यह भी कहा जा रहा है कि एआई में पेचीदा माध्यमों से उधार ली गई रकम झोंकी जा रही है।
हालांकि, अगर निवेशकों का उत्साह कम हो जाता है और मूल्यांकन में गिरावट आने लगती है तो इससे वैश्विक वित्तीय बाजार और अर्थव्यवस्था अस्थिर हो सकते हैं। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2025 की पहली छमाही में अमेरिकी जीडीपी वृद्धि में उपभोक्ता खर्च से अधिक एआई से संबंधित निवेश का योगदान था। कुछ टिप्पणीकारों का मानना है कि एआई एक बड़ा बुलबुला है और इसके फटने से 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से भी बड़ा भूचाल आ सकता है। हालांकि, निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता मगर आने वाले महीनों में इस क्षेत्र में दिलचस्पी बढ़ेगी।
भारत और विश्व की नजरें इस पर टिकी होंगी कि इनमें से कुछ विषय किस तरह से करवट लेते हैं। एक बात तो स्पष्ट है कि ट्रंप सुर्खियों में लगातार बने रहेंगे। हालांकि, 2026 में दुनिया नई व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाने की दिशा में कदम बढ़ा सकती है। भारत-ईयू एफटीए इस लिहाज से एक बड़ा कदम होगा।