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भारत में खामोशी से आगे बढ़ रही एआई: शुरुआती तकनीकी फायदे जीडीपी में क्यों नहीं दिख रहे

लोग एआई को खूब अपना रहे हैं, लेकिन उत्पादकता में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं दिख रही। आजकल एआई को लेकर पूरी दुनिया में हो रही बहस के बीच यही तनाव है

Last Updated- January 23, 2026 | 10:54 PM IST
AI

अधिकांश सरकारी आंकड़ों को देखें तो लगता है कि भारत में कामकाज की रफ्तार (उत्पादकता) में कोई खास बदलाव नहीं हो रहा है। कामगारों की उत्पादकता में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हो रही है और उनकी पगार भी थोड़ी-थोड़ी बढ़ रही है। हालांकि काम करने की क्षमता लगभग वैसी ही है। अगर हम केवल इन आंकड़ों पर ध्यान दें, तब यह मानना भी तर्कसंगत होगा कि भारत में काम करने के तरीके में ज्यादा बदलाव नहीं आया है।

हालांकि अब इसे भी मानना मुश्किल होता जा रहा है। दफ्तरों, कॉल सेंटर, सॉफ्टवेयर बनाने वाली टीमों और सरकारी विभागों के अंदर, काम करने का तरीका बदल रहा है। अब फैसले जल्दी लिए जा रहे हैं। अब मसौदों पर काम जल्दी पूरा हो जाता है। गलतियां पहले ही पकड़ में आ रही हैं। आपस में तालमेल बिठाने में कम समय लग रहा है। हालांकि, ये सब देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) या श्रम उत्पादकता के आंकड़ों में साफतौर पर नहीं दिखता है लेकिन ये बदलाव हमारे रोजमर्रा के कामकाज को प्रभावित कर रहे हैं।  

भारत के समग्र उत्पादकता आंकड़े, इस बदलाव को मुश्किल से ही दर्ज करते हैं। जीडीपी में अचानक कोई उछाल नहीं आई है। वेतन में भी कोई तेज बढ़ोतरी नहीं दिखी है। श्रम उत्पादकता के आंकड़ों में ‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) लाभांश’ के बहुत कम संकेत दिखते हैं। कई विश्लेषकों के हिसाब से यह उसी आशंका की पुष्टि करता हुआ लगता है कि एआई के बारे में जितना बताया जा रहा है वह उतना भी कमाल का नहीं है। हालांकि अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। समस्या एआई नहीं हो सकती है। समस्या यह हो सकती है कि उत्पादकता को कैसे मापा जाता है।

उत्पादकता को मापने के ज्यादातर तरीके उस दौर के हिसाब से बने हैं जब औद्योगिक अर्थव्यवस्था का दौर था। कारखानों में इंसानी दिमाग का इस्तेमाल कम होता था और अधिकांश काम मानव श्रम से जुड़ा होता था। उस वक्त अगर किसी कंपनी को अधिक सामान बनाना होता था, तो कंपनी को ज्यादा लोगों को नौकरी पर रखना पड़ता था, ज्यादा मशीनें लगती थी, या फिर कर्मचारियों से अधिक घंटे काम करवाया जाता था। एआई इस मॉडल से मेल नहीं खाता। यह बिना ज्यादा लोगों को नौकरी पर रखे या ज्यादा वक्त लगाए, सोचने-समझने में मदद करता है। नतीजतन इसके कई फायदे आंकड़ों में साफतौर पर नहीं दिखते लेकिन ये फायदे कंपनियों को मिल जाते हैं।

हालांकि यह पहेली केवल भारत के लिए अनूठी नहीं है। अमेरिका में भी, पिछले दस साल से कर्मचारियों की उत्पादन क्षमता (श्रम उत्पादकता) में हर साल सिर्फ औसतन 1 से 1.5 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। वर्ष 2022 के आखिर में जेनरेटिव एआई टूल्स आने के बाद भी इसमें कोई खास तेजी नहीं आई है। यह हैरान करने वाली बात है क्योंकि अमेरिका में लोगों ने इसे बहुत जल्दी अपना लिया है। वर्ष 2024 तक, लगभग एक-तिहाई अमेरिकी कर्मचारी अपने काम के लिए जेनरेटिव एआई का इस्तेमाल कर रहे थे। 

लोग एआई को खूब अपना रहे हैं, लेकिन उत्पादकता में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं दिख रही है। आजकल एआई को लेकर पूरी दुनिया में हो रही बहस के बीच में यही तनाव है। हालांकि अगर आप गहराई से देखेंगे, तो यह उलझन थोड़ी कम होती दिखेगी। व्यक्तिगत स्तर के कामों को देखा जाए तो एआई का असर ज्यादा होता है। ग्राहक सेवा पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एआई की वजह से काम करने की रफ्तार औसतन 14 फीसदी तक बढ़ जाती है। नए या कम अनुभवी कर्मचारियों के लिए तो यह बढ़ोतरी 30 फीसदी से भी ज्यादा हो जाती है। इसके साथ ही, जवाब देने का तरीका बेहतर होता है और गलतियां कम होती हैं और कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर भी घट जाती है। प्रबंधन सलाहकारों से जुड़ी शोध रिपोर्ट से पता चला है कि एआई की वजह से काम जल्दी पूरा होता है और आपस में तालमेल भी बेहतर होता है।

ये फायदे भी बहुत मायने रखते हैं लेकिन ये ज्यादातर आंकड़े उत्पादन बढ़ोतरी के रूप में नहीं दिखते हैं। कंपनियां इनका इस्तेमाल काम को जल्दी पूरा करने, प्रशिक्षण का खर्च कम करने, जवाब देने के तरीकों में एकरूपता लाने और आंतरिक स्तर के कामकाज को आसान बनाने के लिए करती हैं। हालांकि जितने फोन कॉल किए जाते हैं या जितनी रिपोर्ट बिल की जाती हैं, उनकी संख्या अधिकांश वही रहती है। ऊपर से देखने में लगता है कि उत्पादन में कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन अंदर ही अंदर काम करने का तरीका बदल जाता है।

भारत में भी यही रुझान देखने को मिल रहा है। बड़ी आईटी सेवा कंपनियां बता रही हैं कि जेनरेटिव एआई का इस्तेमाल करके कुछ खास तरह के कामों में कोडिंग और टेस्टिंग का वक्त 20 से 30 फीसदी तक कम हो गया है। फिर भी, काम और कुल कमाई में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है। तेजी से काम पूरा होने का फायदा, अधिकांश निश्चित कीमत वाले अनुबंध, मुनाफे की सुरक्षा और गुणवत्ता नियंत्रण में चला जाता है, न कि ज्यादा उत्पादकता में।  

राष्ट्रीय लेखांकन के नजरिए से देखें तो इस क्षेत्र में कुछ खास होता हुआ दिखाई नहीं देता। इसका कारण काफी सरल है। एआई मुख्य रूप से समय बचाता है लेकिन श्रम नहीं। यह ड्राफ्ट तैयार करने, सर्च करने, त्रुटियां सुधारने, सारांश तैयार करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज कर देता है। हालांकि, उत्पादकता के आंकड़े प्रत्येक घंटे के काम से होने वाले ‘उत्पादन’ में बदलाव को मापने के लिए बने हैं, न कि इस बात को मापने के लिए कि अनिश्चितता कितनी जल्दी दूर हुई या समन्वय के स्तर में कितना सुधार हुआ।

इसमें एक और अनदेखा पहलू भी है। उत्पादकता विश्लेषण का पूरा ध्यान ‘औसत’ पर होता है जबकि एआई का सबसे निरंतर प्रभाव ‘विविधता’ में है। कम प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों में सबसे अधिक सुधार देखा जाता है। गलतियां कम होती हैं और परिणाम अधिक विश्वसनीय हो जाते हैं। कंपनियों के लिए, उच्च औसत उत्पादन के साथ-साथ विश्वसनीयता और निरंतरता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण होती है। सरकारी आंकड़ों में ये बदलाव मुश्किल से ही दिखाई देते हैं।

आर्थिक इतिहास हमें एक महत्त्वपूर्ण बात याद दिलाता है। बिजली के आने के शुरुआती दशकों में, उत्पादकता की वृद्धि धीमी रही क्योंकि उस समय कारखानों ने इलेक्ट्रिक मोटरों का उपयोग केवल भाप के इंजनों को बदलने के लिए किया था। दशकों बाद उत्पादकता में भारी उछाल तब आई जब उत्पादन के पूरे तरीके को बिजली की व्यवस्था के अनुसार फिर से व्यवस्थित किया गया। इसी तरह, 1987 में अर्थशास्त्री रॉबर्ट सोलो ने कहा था कि कंप्यूटर हर जगह दिखाई दे रहे हैं लेकिन ‘उत्पादकता के आंकड़ों’ में उनकी अनुपस्थिति है। कंप्यूटर के कारण उत्पादकता में तेजी 1990 के दशक के उत्तरार्ध में ही आई, जब संस्थानों ने इसके अनुसार खुद को ढाल लिया।

आज एआई भी इसी राह पर आगे बढ़ता दिख रही है। यह माप करने योग्य उत्पादन बढ़ाने की तुलना में, काम करने के तरीके को कहीं अधिक तेजी से बदल रही है। भारत के लिए यह बात बहुत मायने रखती है। देश की वृद्धि रणनीति, काफी हद तक डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (डीपीआई), सेवाओं के निर्यात और अपनी बड़ी कामकाजी आबादी की उत्पादकता पर निर्भर है। इन क्षेत्रों में एआई की उपस्थिति पहले से ही है। लेकिन इसके शुरुआती लाभ मुख्य रूप से ‘तेज वर्कफ्लो’, ‘कम गलतियों’ और ‘बेहतर तालमेल’ के रूप में दिखेंगे न कि सीधे तौर पर प्रति श्रमिक उत्पादन में अचानक आई तेजी के रूप में। एआई के आने की घोषणा जीडीपी में किसी भारी तेजी के माध्यम से होने की संभावना कम है। यह बहुत ही खामोशी से आएगा और छोटे-छोटे बदलावों के जरिए होगा जो समय के साथ इकट्ठा होकर व्यापक असर दिखाएंगे। 

असली जोखिम यह नहीं है कि एआई भारत की अर्थव्यवस्था को बदलने में विफल रहेगा। असली जोखिम यह है कि यह बदलाव पहले से ही हो रहा है जबकि हमारी मापक प्रणाली अब भी इसे अनदेखा कर रही हैं।  


(लेखक अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलाइना में सैद्धांतिक भौतिकविज्ञानी हैं)

First Published - January 23, 2026 | 9:54 PM IST

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