Editorial: भारत में निजी निवेश में तेजी, उच्च आर्थिक वृद्धि के लिए राह खुली
चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था के स्थिर मूल्यों पर 7.4 फीसदी की दर से वृद्धि हासिल करने का अनुमान है। वर्ष 2024-25 में इसमें 6.5 फीसदी की वृद्धि हुई थी। कोविड-19 महामारी के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख थीम लगातार उच्च सरकारी पूंजीगत व्यय रही है। महामारी के बाद आर्थिक सुधार में […]
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प्रतिस्पर्धा से बदली दुनिया: हर देश को खुद तय करना होगा अपना भविष्य
‘पुराना जमाना खत्म हो रहा है, और नया जमाना आने के लिए जूझ रहा है। अब राक्षसों का समय है।’ इटली के दार्शनिक एंटोनियो ग्राम्शी का यह उद्धरण आज राजनीतिक-नीति जगत में अक्सर दोहराया जाता है। यह गलत नहीं है। जनवरी 2026 में मौजूदा विश्व व्यवस्था में और अधिक उथल-पुथल तथा उतार-चढ़ाव देखने को मिला। […]
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भारत की व्यापारिक उपलब्धियों और बजट के बाद अब हो असल मुद्दों पर बात
पिछले कुछ दिनों में जो घटनाक्रम हुए हैं उनसे ऐसा लगता है कि अर्थशास्त्र में एक सप्ताह उतना ही लंबा समय होता है जितना राजनीति में। इसकी शुरुआत भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच ‘सभी व्यापार करार की जननी’ की घोषणा के साथ हुई और इसके दो दिन बाद भारत में अब तक की […]
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16वें वित्त आयोग की नई अंतरण व्यवस्था: राज्यों के लिए फायदे-नुकसान और उठते सवाल
राजकोषीय अंतरण की किसी भी योजना के दो मुख्य पहलू होते हैं। उनका ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज आयाम। अंतरण का मुख्य ऊर्ध्वाधर निर्धारक यानी केंद्रीय करों के साझा पूल में राज्यों का हिस्सा समय के साथ लगभग अपरिवर्तित रहा है। वास्तव में, चौदहवें वित्त आयोग ने इस हिस्से को बढ़ाकर 32 फीसदी (जैसा कि तेरहवें वित्त […]
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