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सेना के हथियारों पर अब भारत का पूरा नियंत्रण, नई रक्षा नीति से बदलेगा डिफेंस सिस्टम

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ड्राफ्ट DAP 2026 के तहत सरकार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, उन्नत तकनीक और आर्थिक विकास को एक साथ जोड़कर भारत की सैन्य ताकत को नई दिशा देना चाहती है।

Last Updated- February 11, 2026 | 9:16 AM IST
defence
Representative Image

भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को नई दिशा देने की तैयारी कर ली है। रक्षा मंत्रालय (MoD) द्वारा जारी ड्राफ्ट डिफेंस एक्विज़िशन प्रोसीजर (DAP) 2026 में साफ किया गया है कि आने वाले वर्षों में भारत की प्राथमिकता केवल विदेशी हथियारों का देश में निर्माण नहीं, बल्कि तकनीक, बौद्धिक संपदा (IP), सोर्स कोड और डिजाइन पर पूर्ण भारतीय नियंत्रण हासिल करना होगी।

इस ड्राफ्ट नीति के अनुसार, टैंक, युद्धपोत, लड़ाकू विमान और ड्रोन जैसे सभी प्रमुख रक्षा प्लेटफॉर्म की खरीद में अब इस बात को सबसे अहम माना जाएगा कि भारत उन्हें स्वतंत्र रूप से अपग्रेड और विकसित कर सके। मंत्रालय ने इसे रक्षा खरीद नीति में एक “वैचारिक बदलाव” (Doctrinal Shift) बताया है।

ड्राफ्ट दस्तावेज़ में कहा गया है कि अब तक का स्वदेशीकरण मॉडल मुख्य रूप से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) और लोकल मैन्युफैक्चरिंग पर आधारित था, जिससे कई बार भारत को पुराने और सीमित तकनीकी सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ा। नई नीति में इस सोच से आगे बढ़ते हुए भारत को वैश्विक रक्षा डिजाइन हब के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।

ड्राफ्ट DAP 2026 में कहा गया है कि “अगले दस वर्षों में सफलता का पैमाना सिर्फ ‘मेड इन इंडिया’ नहीं, बल्कि ‘ओन्ड बाय इंडिया’ होगा।”

रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) देश में पूंजीगत रक्षा खरीद से जुड़े नियमों, प्रक्रियाओं और समय-सीमा को तय करती है। यह नीति लागू होने के बाद DAP 2020 की जगह लेगी।

सरकार ने इस ड्राफ्ट पर स्टेकहोल्डर्स से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं। अपनी राय देने की अंतिम तारीख 3 मार्च 2026 तय की गई है।

संयुक्तता और आत्मनिर्भरता पर सरकार का नया जोर

देश की रक्षा तैयारियों को लेकर सरकार ने अगले दस वर्षों को स्वतंत्र भारत के रक्षा इतिहास का सबसे अहम और निर्णायक दौर बताया है। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) के मसौदा दस्तावेज में संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और नवाचार को राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का मूल आधार माना गया है।

सरकार का उद्देश्य थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है, ताकि भूमि, समुद्र, वायु, अंतरिक्ष और साइबर जैसे सभी क्षेत्रों में एकीकृत योजना, कमान और सैन्य अभियानों को प्रभावी ढंग से अंजाम दिया जा सके। हालांकि लंबे समय से प्रस्तावित थिएटर कमांड अब तक लागू नहीं हो सके हैं। संयुक्तता को किस रूप में आगे बढ़ाया जाए, इस पर तीनों सेनाओं के बीच मतभेद बने हुए हैं।

यह मसौदा ऐसे समय सामने आया है जब ऑपरेशन सिंदूर को नौ महीने पूरे हो चुके हैं। सात से दस मई के बीच पाकिस्तान के साथ हुए इस सैन्य टकराव में भारतीय सेनाओं की संयुक्त क्षमताओं की वास्तविक परीक्षा हुई। विशेष रूप से वायु रक्षा क्षेत्र में तीनों सेनाओं के संसाधनों का एक साथ उपयोग किया गया, जिससे पाकिस्तानी मिसाइल और ड्रोन हमलों का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सका।

दस्तावेज में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और नवाचार पर दोबारा जोर दिया गया है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के संबोधन की भावना के अनुरूप है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर ने रणनीतिक स्वायत्तता और स्वदेशी क्षमताओं की आवश्यकता को स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा विदेशी स्रोतों पर निर्भर नहीं रह सकती।

प्रधानमंत्री ने मेड इन इंडिया हथियार प्रणालियों के महत्व को रेखांकित करते हुए देश के युवाओं और नवप्रवर्तकों से रक्षा तकनीक के क्षेत्र में आगे आने का आह्वान किया था। उन्होंने स्वदेशी जेट इंजन के विकास पर विशेष ध्यान देने की बात कही, जिसे लंबे समय से भारत की रक्षा परियोजनाओं में एक बड़ी तकनीकी चुनौती माना जाता रहा है।

कुल मिलाकर सरकार का संदेश स्पष्ट है कि आने वाला दशक संयुक्त सैन्य क्षमता, स्वदेशी तकनीक और नवाचार के बल पर भारत की रक्षा शक्ति को मजबूत बनाने का होगा।

ड्रोन और एआई क्षमताओं को तेजी से शामिल करने पर जोर

भविष्य की युद्ध तैयारियों को ध्यान में रखते हुए रक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती अब बजट नहीं, बल्कि तेजी से बदलती तकनीक बनती जा रही है। रक्षा मंत्रालय के एक मसौदा दस्तावेज में माना गया है कि हथियार और सैन्य प्रणालियां जितनी तेजी से पुरानी हो रही हैं, उतनी तेजी से उन्हें शामिल करना अब जरूरी हो गया है। इसी को देखते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, स्वायत्त प्लेटफॉर्म, आधुनिक ड्रोन और निर्देशित ऊर्जा हथियारों के लिए नए और तेज खरीद नियम लाने की बात कही गई है।

दस्तावेज में स्वीकार किया गया है कि एआई और नई पीढ़ी की तकनीकों का विकास पारंपरिक 2 से 3 साल की रक्षा खरीद प्रक्रिया से कहीं तेज़ है। ऐसे में अब केवल नए हथियार खरीदना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि मौजूदा प्रणालियों को सॉफ्टवेयर के माध्यम से लगातार अपग्रेड करना भी उतना ही अहम माना जा रहा है। सेना के अनुसार आज के युद्ध में सॉफ्टवेयर की भूमिका हार्डवेयर जितनी ही निर्णायक हो चुकी है।

आधुनिक और भविष्य के युद्ध कौशल पर यह फोकस हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों से भी जुड़ा है। सेना और वायुसेना दोनों ने इस ऑपरेशन के दौरान एआई के व्यापक इस्तेमाल की पुष्टि की थी। सेना ने बताया कि स्वदेशी रूप से विकसित सैन्य सॉफ्टवेयर और एआई टूल्स की मदद से निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज़ हुई और युद्ध क्षेत्र की बेहतर जानकारी मिल सकी। इन क्षमताओं को और मजबूत करने के लिए सेना एक विशेष सैन्य लार्ज लैंग्वेज मॉडल पर भी काम कर रही है, जिसे भारतीय परिस्थितियों और सैन्य जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षित किया गया है।

ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियों पर बढ़ता जोर भी ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ा है। इस अभियान के दौरान पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों का इस्तेमाल करते हुए भारतीय नागरिक और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। वहीं, भारतीय सेनाओं ने भी आतंकवादी ठिकानों पर शुरुआती हमलों और पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणालियों को निष्क्रिय करने में ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन का प्रभावी उपयोग किया। इस ऑपरेशन ने उपमहाद्वीप में लंबी दूरी से लड़े जाने वाले गैर-संपर्क युद्ध के एक नए दौर की शुरुआत की।

रक्षा आधुनिकीकरण की 15 वर्षीय योजना के तहत आने वाले वर्षों में थल, जल और वायु सेनाओं के लिए कम से कम 670 मानवरहित हवाई वाहनों की खरीद प्रस्तावित है। इनमें ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भरने वाले भारी ड्रोन से लेकर वर्टिकल टेकऑफ वाले सिस्टम शामिल हैं। इसके अलावा, सेना की जरूरतों में लगभग 70 ऐसे रडार से बच निकलने वाले रिमोट पायलटेड विमान भी शामिल किए गए हैं, जो भविष्य के युद्ध में अहम भूमिका निभाएंगे।

सिविल मिलिट्री फ्यूजन को मिलेगी नई मजबूती

आने वाले दशक में युद्ध के तरीकों में बड़े बदलाव की संभावना को देखते हुए सरकार ने सिविल और सैन्य क्षेत्रों के बीच तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया है। एक आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार भविष्य का युद्धक्षेत्र उन तकनीकों से संचालित होगा, जिनका मूल रूप से नागरिक उपयोग होता है लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें सैन्य उद्देश्यों के लिए भी अपनाया जा सकता है। अब नागरिक और सैन्य तकनीक के बीच की पारंपरिक सीमाएं तेजी से कमजोर हो रही हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए सिविल मिलिट्री फ्यूजन को संस्थागत रूप देने की योजना बनाई गई है। इसके तहत नागरिक और रक्षा क्षेत्र एक साथ मिलकर क्षमताएं विकसित करेंगे और नवाचार को साझा करेंगे, ताकि तकनीकी विकास का सीधा लाभ सुरक्षा तैयारियों को मिल सके।

दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि सशस्त्र बलों को बाजार में आसानी से उपलब्ध नागरिक तकनीकों की खरीद की अनुमति दी जाएगी। इनमें ड्रोन स्वार्म, अंतरिक्ष से जुड़ी तकनीक और साइबर सुरक्षा समाधान शामिल हैं। इन उत्पादों में केवल जरूरी स्तर का ही अनुकूलन किया जाएगा, ताकि उन्नत नागरिक तकनीक को जल्दी और प्रभावी ढंग से सैन्य क्षमता में बदला जा सके।

कमर्शियल ऑफ द शेल्फ यानी COTS उत्पाद ऐसे तैयार नागरिक उपकरण होते हैं, जिन्हें बिना बड़े बदलाव के रक्षा जरूरतों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे समय और लागत दोनों की बचत होगी।

नागरिक और सैन्य क्षेत्रों के एकीकरण पर यह जोर सरकार के उस लक्ष्य से भी जुड़ा है, जिसके तहत रक्षा क्षेत्र में ड्यूल प्रोडक्शन मॉडल को बढ़ावा दिया जाना है। इस मॉडल में निजी कंपनियों और सरकारी रक्षा उपक्रमों के बीच सहयोग को मजबूत किया जाएगा, ताकि देश की रक्षा उत्पादन क्षमता को नई गति मिल सके।

रक्षा खरीद को आर्थिक विकास से जोड़ने की तैयारी

केंद्र सरकार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को देश की आर्थिक मजबूती से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। रक्षा मंत्रालय के ड्राफ्ट डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2026 में साफ कहा गया है कि अब महंगे हथियारों और रक्षा प्रणालियों की खरीद को सीधे देश की आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रक्षा पर होने वाला खर्च देश के भीतर ही निवेश, रोजगार और औद्योगिक विकास को बढ़ावा दे।

ड्राफ्ट के अनुसार सरकार का फोकस ऐसे भारतीय रक्षा उपकरणों पर होगा, जिनका डिजाइन और विकास देश में ही हो। इससे रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा घरेलू अर्थव्यवस्था में घूमेगा और सेमीकंडक्टर, प्रिसीजन फोर्जिंग जैसे कई क्षेत्रों में मजबूत सप्लाई चेन तैयार होगी।

हालांकि सरकार यह भी मानती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक तकनीक जरूरी है। इसी वजह से जहां आवश्यक होगा, वहां विदेशी स्रोतों से महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों की खरीद जारी रहेगी। साथ ही इन उपकरणों के भारतीय विकल्प विकसित करने पर भी समानांतर रूप से काम किया जाएगा।

रक्षा मंत्रालय की नीति के अनुरूप हाल ही में पेश किए गए केंद्रीय बजट में वित्त वर्ष 2027 के लिए रक्षा पूंजीगत खरीद का 75 प्रतिशत हिस्सा घरेलू उद्योग से खरीद के लिए आरक्षित किया गया है। इसकी राशि लगभग 1.39 लाख करोड़ रुपये है।

इससे पहले वित्त वर्ष 2021 में यह फैसला लिया गया था कि रक्षा आधुनिकीकरण बजट का बड़ा हिस्सा घरेलू स्रोतों से खरीद पर खर्च होगा, जिसमें निजी भारतीय कंपनियों के लिए भी विशेष प्रावधान रखा गया। वित्त वर्ष 2026 में भी करीब 1.11 लाख करोड़ रुपये घरेलू रक्षा खरीद के लिए तय किए गए थे। वित्त वर्ष 2027 का यह प्रावधान बजट अनुमान के मुकाबले 25 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी को दर्शाता है।

ड्राफ्ट दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि सरकार रक्षा बलों की जरूरतों के अनुरूप मानव संसाधन और औद्योगिक क्षमता को मजबूत करेगी। इसके लिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को बढ़ावा देने, और भारत में काम कर रही विदेशी कंपनियों के जरिए उन्नत तकनीकी कौशल को देश में लाने की योजना है।

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी बयान में बताया गया कि डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2026 का मकसद सेना के आधुनिकीकरण को तेज करना, खरीद प्रक्रियाओं में देरी कम करना और बड़े पैमाने पर उत्पादन को संभव बनाना है। साथ ही रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता घटाने पर भी जोर दिया गया है।

ड्राफ्ट में उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए वित्तीय और अनुभव से जुड़े नियमों को सरल बनाने, निर्णय प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत करने, ट्रायल और गुणवत्ता जांच प्रणाली में सुधार लाने, और खरीद प्रक्रिया में डिजिटल तकनीक के अधिक इस्तेमाल का भी प्रस्ताव रखा गया है।

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First Published - February 11, 2026 | 8:54 AM IST

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