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अमेरिका की नई रिपोर्ट से भारत पर बढ़ा दबाव, चीन के ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क में किया गया शामिल

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रिपोर्ट में विशेष रूप से भारत के पुणे-गुजरात-चेन्नई उत्पादन गलियारे को चीन से जुड़े पंपों और कंप्रेसरों के अमेरिका में आयात के संभावित मार्ग के रूप में चिह्नित किया गया है

Last Updated- August 14, 2026 | 10:23 PM IST
White house
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

अमेरिका द्वारा चीनी सामान को तीसरे देशों के रास्ते अमेरिकी शुल्क से बचकर आने से रोकने के प्रयास तेज किए जाने के बीच व्हाइट हाउस ने भारत को उन 40 से अधिक देशों और व्यापारिक क्षेत्रों में शामिल किया है जिन्हें अमेरिकी प्रशासन चीन से जुड़े ट्रांसशिपमेंट (तीसरे देश के जरिये सामान भेजने) के जोखिम के लिहाज से संवेदनशील मानता है। व्हाइट हाउस के ऑफिस ऑफ ट्रेड ऐंड मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी ने ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा है, ‘चीन के छद्म ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क में अमेरिका के कई सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार शामिल हैं। चीन के सबसे बड़े मददगारों में अमेरिका की जमीनी सीमाओं से लगे मेक्सिको और कनाडा से लेकर यूरोपीय संघ, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया तक शामिल हैं।’

रिपोर्ट में विशेष रूप से भारत के पुणे-गुजरात-चेन्नई उत्पादन गलियारे को चीन से जुड़े पंपों और कंप्रेसरों के अमेरिका में आयात के संभावित मार्ग के रूप में चिह्नित किया गया है। रिपोर्ट का दावा है कि इस गलियारे में होने वाली गतिविधियों का असर सिनसिनाटी, डेटन और कोलंबस में स्थित अमेरिकी औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ता है।

अमेरिका के साथ भारत के व्यापार आंकड़ों की समीक्षा से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2025-26  में भारत ने अमेरिका को लगभग 75 करोड़ डॉलर मूल्य के पंप और कंप्रेसर निर्यात किए थे जो अमेरिका को भारत के कुल निर्यात का 1 प्रतिशत से भी कम है। वहीं वित्त वर्ष 26 में भारत ने चीन से इन वस्तुओं का लगभग 2 अरब डॉलर का आयात किया। ऑफिस ऑफ ट्रेड ऐंड इकनॉमिक एनालिसिस के अनुमानों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में अमेरिका को लगभग 67 अरब डॉलर मूल्य का ऐसा सामान मिला, जिसके बारे में उसका अनुमान है कि वह मेक्सिको, भारत और वियतनाम आदि के जरिए चीन से ट्रांसशिप किया गया था। रिपोर्ट का अनुमान है कि इस प्रक्रिया के कारण अमेरिका को शुल्क राजस्व में करीब 28 अरब डॉलर का नुकसान हुआ।

रिपोर्ट में केवल भारत के जरिये कथित रूप से किए गए ट्रांसशिपमेंट के सामान के मूल्य का कोई अनुमान नहीं है। भारत सरकार फिलहाल व्हाइट हाउस की रिपोर्ट के निष्कर्षों और उसमें अपनाई गई कार्यप्रणाली की समीक्षा कर रही है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘हम निष्कर्षों और अपनाई गई कार्यप्रणाली का विस्तार से अध्ययन करना चाहेंगे। हमारे पास सीमा शुल्क, मूल देश के नियम और उत्पादों के निर्यात को नियंत्रित करने वाले मजबूत कानून और प्रक्रियाएं हैं। नियमों के उल्लंघन का कोई भी मामला सामने आने पर उससे कानून के अनुसार निपटा जाता है।’

रिपोर्ट में अवैध ट्रांसशिपमेंट को इस तरह परिभाषित किया गया है कि किसी सामान को किसी तीसरे देश के रास्ते भेजा जाए जहां उस पर मामूली प्रसंस्करण, दोबारा लेबल लगाना, दोबारा पैकिंग, दोबारा बिल बनाना या दस्तावेजों में बदलाव जैसे काम किए जाएं। इसका उद्देश्य बिना किसी महत्त्वपूर्ण बदलाव के सामान को ऐसे पेश करना होता है जिससे ऐसा लगे कि उसका मूल देश कोई नया देश है।

रिपोर्ट के अनुसार 2018 से अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए शुल्क का जवाब चीन ने अमेरिका को होने वाले प्रत्यक्ष निर्यात को कम करके और एक वैश्विक ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क के विकास को प्रोत्साहित करके दिया है। व्हाइट हाउस की रिपोर्ट ने चिन्हित किए गए 40 से अधिक देशों और अर्थव्यवस्थाओं को तीन श्रेणियों में बांटा है। भारत को ‘चीन के छद्म ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क’ की पहली श्रेणी में रखा गया है। इस श्रेणी में कनाडा, यूरोपीय संघ, इजरायल, जापान, मेक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताइवान भी शामिल हैं।

रिपोर्ट ने पहली श्रेणी की अर्थव्यवस्थाओं को विविधीकृत और  बड़े पैमाने के अग्रणी बताया है। इनके बारे में कहा गया है कि ये देश चीन से जुड़े सामान की बड़ी मात्रा में आवाजाही करते हैं। साथ ही इनके औद्योगिक आधार विविध हैं और अमेरिका को निर्यात के लिए बड़े प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है कि इन देशों और क्षेत्रों में ट्रांसशिपमेंट का जोखिम व्यापक और वैध व्यापारिक गतिविधियों के भीतर ही मौजूद है।

हालांकि भारत के व्यापार विशेषज्ञ व्हाइट हाउस की रिपोर्ट के निष्कर्ष को लेकर संदेह व्यक्त कर रहे हैं। नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अनुसार, रिपोर्ट ने ट्रांसशिपमेंट के तकनीकी अर्थ को जरूरत से ज्यादा व्यापक बना दिया है। इससे मूल देश से संबंधित धोखाधड़ी और वैध विनिर्माण को एक ही श्रेणी में मिला दिया गया है। जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, ‘इससे यह जोखिम पैदा होता है कि किसी उल्लंघन के साबित होने से पहले ही वैध प्रसंस्करण और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के तहत होने वाले उत्पादन को ट्रांसशिपमेंट के रूप में पेश किया जाए।’

रिपोर्ट में असामान्य तरीके से माल भेजे जाने के पैटर्न की पहचान करने, उत्पादन क्षमता का आकलन करने और अधिक जोखिम वाले शिपमेंट पर सीमा शुल्क विभाग की कार्रवाई को केंद्रित करने के लिए आर्टिफिशिल इंटेलिजेंस  आधारित ‘डिटेक्टिव बॉर्डर’ प्रणाली बनाने का प्रस्ताव दिया गया है। श्रीवास्तव ने आगाह किया कि प्रस्तावित एआई आधारित ‘डिटेक्टिव बॉर्डर’ के कारण अधिक निरीक्षण, माल की खेप पहुंचने में देरी, पिछली अवधि से लागू होने वाले शुल्क और जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।

यह रिपोर्ट भारत-अमेरिका व्यापार के लिए एक संवेदनशील समय में आई है। इसके जारी होने के महज एक सप्ताह पहले अमेरिकी सीनेट ने एक ऐसा विधेयक भी पारित किया था, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर 100 प्रतिशत तक दंडात्मक शुल्क लगाया जा सकता है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय  ने भारत के खिलाफ अमेरिकी व्यापार कानून की धारा 301 के तहत अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के आरोपों को लेकर जांच शुरू कर रखी है। 

(साथ में अर्चिस मोहन)

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First Published - August 14, 2026 | 10:23 PM IST

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