माता-पिता या परिवार के बुजुर्ग अपनी जिंदगी भर की कमाई यानी जायदाद की वसीयत बनाकर जाते हैं। लेकिन उनके निधन के बाद कई बार परिवार के सामने कानूनी दिक्कतें खड़ी हो जाती हैं। वसीयत होने के बावजूद लोगों को अक्सर समझ नहीं आता कि संपत्ति अपने नाम कैसे कराएं या उसे बेचने की प्रक्रिया क्या होगी।
इसी प्रक्रिया में एक शब्द सबसे ज्यादा सुनने को मिलता है, ‘प्रोबेट’। आमतौर पर लोगों को लगता है कि बिना प्रोबेट के वसीयत मान्य नहीं होती और संपत्ति का मालिकाना हक भी हासिल नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या वाकई हर वसीयत के लिए कोर्ट से प्रोबेट लेना जरूरी है? आइए कानून के जानकारों से समझते हैं कि इसको लेकर क्या नियम है और लोगों को ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए।
‘मान एंड सिंह लॉ फर्म’ की फाउंडिंग पार्टनर एडवोकेट भवानी जी मान के मुताबिक, आसान शब्दों में कहें तो प्रोबेट और कुछ नहीं, बल्कि किसी वसीयत के असली और सही होने पर कोर्ट द्वारा दी गई एक सरकारी या कानूनी मंजूरी है। जब कोई इंसान अपनी वसीयत में किसी व्यक्ति को अपनी जायदाद की देखरेख या उसकी सही व्यवस्था करने का जिम्मा सौंपता है, तो कानूनी बोली में उस व्यक्ति को ‘निष्पादक’ या ‘एग्जीक्यूटर’ कहा जाता है। कोर्ट प्रोबेट जारी करके उसी एग्जीक्यूटर को यह कानूनी अधिकार और मान्यता देती है कि वह वसीयत के हिसाब से काम कर सके।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान कोर्ट मुख्य रूप से यही जांचती है कि जो वसीयत सामने लाई गई है, वह पूरी तरह असली है या नहीं, और क्या उसे सही नियमों और प्रक्रिया का पालन करते हुए तैयार किया गया था। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 222 का नियम स्पष्ट कहता है कि प्रोबेट सिर्फ और सिर्फ उसी व्यक्ति को मिल सकता है, जिसे वसीयत में उस संपत्ति की जिम्मेदारी दी गई हो।
अक्सर लोगों को लगता है कि बिना प्रोबेट के वसीयत की कोई कानूनी अहमियत नहीं होती। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अमितराज कौशल बताते हैं कि कानून में हमेशा ऐसा नहीं था। पहले भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 213 के तहत कुछ खास मामलों में वसीयत से मिले अधिकारों को साबित करने के लिए प्रोबेट लेना जरूरी होता था। हालांकि, संसद ने निरसन एवं संशोधन अधिनियम, 2025 (Repealing and Amending Act, 2025) के जरिए धारा 213 को हटा दिया है। इस बदलाव के बाद कानूनी स्थिति काफी बदल गई है। कौशल के मुताबिक, अब वसीयत के आधार पर संपत्ति का नामांतरण यानी म्यूटेशन या ट्रांसफर कराने के लिए हर मामले में प्रोबेट लेना जरूरी नहीं है।
वहीं, भवानी जी मान इस मामले की कुछ और जरूरी कानूनी बातें बताती हैं। उनके मुताबिक, यह मानना सही नहीं है कि 2025 के संशोधन से पहले हर वसीयत के लिए प्रोबेट जरूरी था। पुराने कानून में भी धारा 213 की कुछ सीमाएं थीं। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 57 और 213 मुख्य रूप से कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जैसे पुराने प्रेसीडेंसी शहरों में बनाई गई वसीयतों या वहां मौजूद अचल संपत्तियों पर लागू होती थीं।
इसके अलावा, यह नियम हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन और पारसी समुदाय के कुछ मामलों में ही लागू होता था। वहीं, मुस्लिम समुदाय और 2002 के कानूनी संशोधन के बाद ईसाई समुदाय को इसके दायरे से बाहर रखा गया था। भवानी यह भी साफ करती हैं कि दिल्ली में किसी हिंदू की संपत्ति सिर्फ इसलिए प्रोबेट के दायरे में नहीं आ जाती क्योंकि उसकी कीमत बहुत ज्यादा है।
इसलिए यह मानना सही नहीं है कि ‘वसीयत + अचल संपत्ति = जरूरी प्रोबेट’। प्रोबेट की जरूरत हर मामले में अलग हो सकती है और यह केस के तथ्यों, परिस्थितियों और संबंधित इलाके के कानूनी अधिकार क्षेत्र पर निर्भर करती है।
अगर किसी मामले में प्रोबेट लेना जरूरी हो या वारिस अपनी इच्छा से प्रोबेट लेना चाहें, तो इसके लिए एक तय कानूनी प्रक्रिया होती है। सबसे पहले वसीयत के एग्जीक्यूटर को संबंधित कोर्ट में याचिका या पेटीशन दाखिल करनी होती है। इसमें मृत व्यक्ति की जानकारी, वसीयत की मूल प्रति, संपत्ति की पूरी सूची, वारिसों के नाम और वसीयत के गवाहों से जुड़ी जानकारी देनी होती है। दिल्ली हाईकोर्ट जैसे कोर्ट में आमतौर पर मूल मृत्यु प्रमाण पत्र, संपत्ति की सूची और कम से कम एक अटेस्टिंग गवाह का वेरिफिकेशन भी जरूरी होता है।
याचिका दाखिल होने के बाद कोर्ट उन सभी लोगों को नोटिस भेजती है, जिनका संपत्ति में कोई हित हो सकता है। जरूरत पड़ने पर सार्वजनिक सूचना भी जारी की जाती है। अगर कोई व्यक्ति वसीयत या प्रोबेट पर आपत्ति नहीं करता, तो मामला आमतौर पर आसानी से आगे बढ़ जाता है।
लेकिन अगर कोई वारिस भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 284 के तहत ‘कैविएट’ या आपत्ति दाखिल कर देता है, तो मामला सिविल मुकदमे की तरह चलने लगता है। इस दौरान गवाहों की गवाही, वसीयत बनाने वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति और वसीयत से जुड़ी परिस्थितियों की विस्तार से जांच की जाती है। यही वजह है कि बिना विवाद वाले मामलों में प्रोबेट जल्दी मिल सकता है, जबकि विवाद होने पर मामला सुलझने में कई साल लग सकते हैं।
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जब वारिस बिना प्रोबेट के संपत्ति बेचना, ट्रांसफर करना या अपने नाम पर म्यूटेशन करवाना चाहते हैं, तो उनके सामने कई व्यावहारिक सवाल आते हैं। कौशल के मुताबिक, धारा 213 हटने के बाद सिर्फ प्रोबेट न होने की वजह से संपत्ति के इस्तेमाल या उसे ट्रांसफर करने पर कोई रोक नहीं है। हालांकि, नगर निगम, बैंक, हाउसिंग सोसायटी और रजिस्ट्रार कार्यालय अपनी संतुष्टि के लिए कुछ अतिरिक्त दस्तावेज मांग सकते हैं। यह भी समझना जरूरी है कि म्यूटेशन सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में संपत्ति से जुड़ी जानकारी अपडेट करने की प्रक्रिया है। इससे किसी व्यक्ति को संपत्ति का मालिकाना हक यानी ‘टाइटल’ नहीं मिलता।
भवानी जी मान इस स्थिति को तीन हिस्सों में समझने की सलाह देती हैं। पहला है ‘कानूनी जरूरत’, दूसरा ‘प्रशासनिक जरूरत’ और तीसरा ‘व्यावहारिक सुरक्षा’। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए वे बताते हैं कि अगर वारिसों के बीच कोई विवाद नहीं है, तो सिर्फ प्रोबेट न होने की वजह से म्यूटेशन रोकने की जरूरत नहीं है।
हालांकि, संपत्ति बेचने के मामले में स्थिति थोड़ी अलग हो सकती है। खरीदार, बैंक या बिल्डर भविष्य में होने वाले किसी विवाद से बचने के लिए प्रोबेट की मांग कर सकते हैं। यानी कानूनन प्रोबेट जरूरी न होने के बावजूद, व्यावसायिक और व्यावहारिक सुरक्षा के लिहाज से खरीदार अक्सर बिना प्रोबेट वाली वसीयत पर तुरंत भरोसा करने से बचते हैं।
परिवार में किसी संपत्ति मालिक की मृत्यु के बाद कानूनी उलझनों और पारिवारिक विवादों से बचने के लिए एक्सपर्ट्स ने कुछ जरूरी कदम उठाने की सलाह दी है। दोनों एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सबसे पहले वसीयत के मूल दस्तावेज को सुरक्षित रखना चाहिए। भवानी जी मान की सलाह है कि मूल वसीयत में किसी तरह की कटिंग न करें, उस पर पेंसिल या पेन से कुछ न लिखें और न ही उसे लैमिनेट करवाएं। अगर वसीयत के साथ कोई पूरक पत्र यानी ‘Codicil’ है, तो उसे भी सुरक्षित रखें।
इसके बाद मृत्यु प्रमाण पत्र की कई प्रतियां बनवा लें। साथ ही संपत्ति के पुराने कागजात, टैक्स की रसीदें, बैंक की जानकारी और सोसाइटी के रिकॉर्ड भी इकट्ठा कर लें। सभी संभावित कानूनी वारिसों की एक सूची बनाना भी जरूरी है। इसमें उन लोगों के नाम भी शामिल करें, जिनका नाम वसीयत में नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि भविष्य में कौन व्यक्ति आपत्ति उठा सकता है, यह पहले से समझना जरूरी है।
इसके बाद किसी कानूनी एक्सपर्ट से सलाह लेकर पता करें कि आपके मामले में प्रोबेट लेना जरूरी है या नहीं। अगर वारिसों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद है, वसीयत से जुड़ी कोई संदिग्ध परिस्थिति नजर आ रही है या संपत्ति बहुत बड़ी है, तो कानूनन प्रोबेट जरूरी न होने पर भी अपनी इच्छा से प्रोबेट लेना बेहतर हो सकता है। इससे भविष्य में होने वाले लंबे कानूनी विवादों से बचने में मदद मिल सकती है।