सरकारी और कॉरपोरेट ऋण मार्केट दोनों में दीर्घावधि बॉन्ड की सीमित आपूर्ति के कारण दीर्घावधि सरकारी प्रतिभूतियों की यील्ड में गिरावट आई। बाजार के जानकारों का कहना है कि यील्ड में गिरावट का कारण बीमा कंपनियां और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) का दीर्घावधि परिपत्रों में निवेश करना है। ये अपनी लंबी अवधि की निवेश जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसे परिपत्रों में निवेश बढ़ा रहे हैं। यह रुझान जारी रहने की संभावना है। संस्थागत निवेशक लंबी अवधि की देनदारियों के कारण ऐसी परिसंपत्तियों की तलाश में रहते हैं।
बाजार के जानकारों ने कहा कि इस साल लंबी अवधि वाले सरकारी प्रतिभूतियों के खंड में मांग- आपूर्ति का संतुलन बेहतर हुआ है। इसका कारण यह है कि पिछले साल की तुलना में इश्यूअंस कैलेंडर में लंबी अवधि की प्रतिभूतियों का हिस्सा कम रहा है। वित्त वर्ष 27 की पहली छमाही में कुल जारी किए गए बॉन्ड में 15 वर्षीय बॉन्ड की हिस्सेदारी 14.5 प्रतिशत था जबकि यह वित्त वर्ष 26 की पहली छमाही में 14 प्रतिशत था। उधर 30 वर्षीय बॉन्ड की हिस्सेदारी 10.5 प्रतिशत से घटकर 7.3प्रतिशत हो गई। इस क्रम में 40 वर्षीय बॉन्ड की हिस्सा 14 प्रतिशत से घटकर 8 प्रतिशत रह गई। ऐसे कुल जारी बॉन्ड में 50 वर्षीय बॉन्ड की हिस्सेदारी गिरकर 9.6 प्रतिशत रह गई जबकि यह एक साल पहले 10.5 प्रतिशत थी।
मौजूदा वित्त वर्ष में अलग-अलग परिपक्वता अवधि वाले सरकारी बॉन्ड की यील्ड में गिरावट आई है। लिहाजा सबसे ज्यादा गिरावट 15 वर्षीय खंड में नजर आई। दरअसल, 15 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड 31 मार्च को 7.45 प्रतिशत थी, जो शुक्रवार तक 51 आधार अंक गिरकर 6.94 प्रतिशत हो गई। इस अवधि के दौरान 30 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड में 39 आधार अंक, 40 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड में 37 आधार अंक और 50 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड में 26 आधार अंक की गिरावट आई।
एक इंश्योरेंस कंपनी के ऋण फंड मैनेजर ने कहा, ‘इस साल सरकारी प्रतिभूतियों के मार्केट में मांग-आपूर्ति का समीकरण बेहतर और ज्यादा संतुलित दिख रहा है। इसका कारण यह है कि लंबी अवधि वाले बॉन्ड की आपूर्ति पिछले साल के मुकाबले कम है। इसके अलावा बीते साल जिन वजहों से सरकारी प्रतिभूतियों से मांग हट गई थी, वे अब मौजूद नहीं हैं। अब इक्विटी की ओर गई कुछ मांग फिर सरकारी और राज्य सरकार के बॉन्ड की तरफ आ रही है।’
ब्याज दरों में स्थितरता के कारण भी दीर्घावधि सरकारी बॉन्ड की मांग को बढ़ावा मिल रहा है। मार्केट के जानकारों का कहना है कि जून, 2025 में भारतीय रिजर्व बैंक का नीतिगत रुख ‘तटस्थ’ रहने के बाद निवेशकों ने दीर्घावधि बॉन्ड में अपना निवेश कम कर दिया था। अब ब्याज दरों में लंबे समय तक बदलाव नहीं होने की उम्मीद के साथ निवेशक धीरे-धीरे फिर से लंबी अवधि वाले बॉन्ड में निवेश बढ़ा सकते हैं। इससे लंबी अवधि वाली सरकारी प्रतिभूतियों की मांग को मदद मिलेगी।
इसके अलावा, नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट (नेबफिड) के 15 वर्षीय बॉन्ड इश्यू के लिए कुल 8,291.49 करोड़ रुपये की बोलियां मिलीं और यह 3,000 करोड़ रुपये के इश्यू साइज से लगभग 2.8 गुना ज़्यादा थीं।