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प्रतिस्पर्धा से बदली दुनिया: हर देश को खुद तय करना होगा अपना भविष्य

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अब स्थापित रूप से यह दुनिया ‘ताकतवर लोगों’ की दुनिया है। इसमें हर देश को अपने आर्थिक भविष्य की राह, अपने गठबंधन और अपनी तरक्की का रास्ता खुद तय करना होगा

Last Updated- February 10, 2026 | 10:27 PM IST
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‘पुराना जमाना खत्म हो रहा है, और नया जमाना आने के लिए जूझ रहा है। अब राक्षसों का समय है।’ इटली के दार्शनिक एंटोनियो ग्राम्शी का यह उद्धरण आज राजनीतिक-नीति जगत में अक्सर दोहराया जाता है। यह गलत नहीं है। जनवरी 2026 में मौजूदा विश्व व्यवस्था में और अधिक उथल-पुथल तथा उतार-चढ़ाव देखने को मिला। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) में अपने संबोधन में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कुछ सचबयानी की। उन्होंने कहा कि पुरानी नियम आधारित विश्व व्यवस्था का अंत हो चुका है और अब वह वापस नहीं आने वाली है।

बात को जरा साफ-साफ समझते हैं: अब स्थापित रूप से यह दुनिया ‘ताकतवर लोगों’ की दुनिया है। इसमें हर देश को अपने आर्थिक भविष्य की राह, अपने गठबंधन और अपनी तरक्की का रास्ता खुद तय करना होगा। इसके निहितार्थ और भी मायने रखते हैं। चीन और अमेरिका के बीच श्रेष्ठता की होड़ नए क्षेत्रीय तनावों को जन्म देगी। जैसा कि हम वेनेजुएला और ग्रीनलैंड में देख रहे हैं। तकनीक के क्षेत्र में भी ऐसा ही होगा। उदाहरण के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा बनाम दहन इंजन तथा तेल, गैस और कोयला आदि के क्षेत्र में।

राष्ट्रों के बीच की इस तीव्र प्रतिद्वंद्विता में वैश्विक सहयोग परास्त हो रहा है, जबकि जलवायु परिवर्तन जैसी अस्तित्वगत चुनौतियों से निपटने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है। इसका संबंध कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण से भी है। दुर्लभ खनिजों से लेकर कोयला और तेल तक ऐसे तमाम क्षेत्र हैं। इसका संबंध प्रसंस्करण क्षमता और तकनीक पर नियंत्रण से भी है। तेल या प्राकृतिक गैस पर निर्भर देशों और बिजली आधारित ऊर्जा पर निर्भर देशों के बीच का विभाजन स्पष्ट है और यह संघर्ष अत्यधिक कठोर है। जलवायु परिवर्तन यहां एक संपार्श्विक क्षति यानी कोलैटरल डैमेज के रूप में सामने आ रहा है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज की भू-राजनीति में आर्कटिक (और ग्रीनलैंड) क्यों महत्त्वपूर्ण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण, दुनिया का यह ‘रेफ्रिजरेटर’ पिघल रहा है, और महाद्वीपों को जहाज पृथ्वी के ‘शीर्ष’ से होकर तेजी से पार कर सकते हैं। ये मार्ग रणनीतिक हैं क्योंकि वे रूस और चीन को पश्चिमी गोलार्ध तक पहुंचने में सहायता प्रदान करते हैं। पीछे हटती बर्फ़ इलाके के तेल और खनिज संपदा को भी दोहन के लिए उजागर करेगी। इस बीच नुकसान यह हो रहा है कि दुनिया का यह रेफ्रिजरेटर मौसम प्रणालियों को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन इस वाणिज्यिक विश्व व्यवस्था में, यह सब अब महत्त्वहीन प्रतीत होता है। यहां हर चीज का संबंध धन कमाने से है। चाहे इसके लिए वैश्विक स्तर पर व्यापक हानि और विनाश ही क्यों न हो रहा हो।

नए युग की हरित तकनीक वाली दुनिया के लिए खनिजों के उत्खनन का प्रश्न है। यह भी कि इसका क्षेत्रीय खोज तथा पर्यावरण पर क्या प्रभाव होगा। हाल तक यह माना जाता था कि दुनिया कोयला, लौह-अयस्क और बॉक्साइट जैसे खनिजों की मांग के चरम तक पहुंच चुकी है। लेकिन विद्युतीकरण, हरित प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस अधोसंरचना की ओर बढ़ते प्रयासों के साथ अब अनुमान है कि अगले दशक या उससे अधिक में वैश्विक तांबे की मांग दोगुनी हो जाएगी। जिन देशों के पास सबसे बड़े तांबे के भंडार हैं, उदाहरण के लिए पेरू, चिली और कांगो गणराज्य आदि, वे अब केंद्र में हैं।

चीन वैश्विक तांबे का लगभग 50 फीसदी प्रसंस्करण और परिष्करण करता है। मांग बढ़ने के साथ, और अधिक खदानें खुलेंगी, अक्सर घने जंगलों और जैव-विविधता से भरपूर क्षेत्रों में, और तांबे के स्मेल्टरों की आवश्यकता होगी। ऐसी सुविधा जिनमें प्रदूषण नियंत्रण के लिए भारी निवेश की जरूरत होती है। यही स्थिति दुर्लभ खनिजों, जैसे लिथियम से लेकर ग्रेफाइट तक, के लिए भी है।

चीन न केवल इन आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने में भारी बढ़त रखता है, बल्कि वह ग्रीन टेक्नॉलजी में भी अग्रणी है। अन्य देश अब नई खदानें खोजने और समझौते करने की होड़ में हैं। इसका हमारे भविष्य पर क्या असर होगा, यह आज की झड़पों में ही दिखाई देने लगा है। मेरे विचार में, दो व्यापक प्रश्न हैं जो हमारी वास्तविक दुनिया में सामने आएंगे।

पहला, जब देश वैश्विक व्यापार को ‘ऑन-शोरिंग’ के लिए पुनर्गठित करेंगे। यानी आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने और औद्योगीकरण को पुनर्जीवित करने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाएंगे तो क्या समृद्ध देश, जिन्होंने पहले पर्यावरण और श्रम की ऊंची लागतों के कारण ‘ऑफ-शोरिंग’ को प्राथमिकता दी थी, अब उन लागतों को घरेलू स्तर पर स्वीकार करेंगे? या वे सभी के लिए मानकों को पुनर्गठित करेंगे और दुनिया भर में उत्पादन लागत बढ़ाएंगे?

यूरोपीय संघ की दक्षिण अमेरिका के साथ मर्कोसुर साझेदारी का उसके किसानों द्वारा खाद्य-सुरक्षा मानकों के कारण विरोध किया जा रहा है। इसी तरह, कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली (सीबीएएम) को आगे बढ़ाया जा रहा है, भले ही यह उभरती दुनिया के उद्योगों में कार्बन घटाने की लागत को बढ़ा देगा।

दूसरा प्रश्न यह है कि यह विशाल अंतर ग्रीन टेक्नॉलजी की वृद्धि के लिए क्या मायने रखेगा, जो जलवायु परिवर्तन के असर को सीमित करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। विश्व आर्थिक मंच में भी यह विरोधाभास स्पष्ट था। एक ओर अमेरिकी नेतृत्व में जीवाश्म ईंधन का दबाव था, तो दूसरी ओर चीन के उप-प्रधानमंत्री विभिन्न देशों से ‘हरित अधोसंरचना, हरित ऊर्जा, हरित खनिज और पर्यावरण के अनुकूल वित्त’ पर सहयोग करने का आग्रह कर रहे थे।

देश घरेलू और आयातित ऊर्जा आपूर्ति के बीच, और प्रतिस्पर्धी गठबंधनों के बीच फंसे हुए हैं, जिन पर उन्हें अपनी भविष्य की आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए भरोसा करना होगा। साथ ही यह प्रश्न भी है कि देश घरेलू स्तर पर क्या उत्पादन करेंगे और क्या वे चीनी प्रतिस्पर्धा के सामने अपने उद्योगों को बनाए रख पाएंगे। पिछले वर्ष चीन ने 1.2 लाख करोड़ डॉलर का रिकॉर्ड व्यापार अधिशेष दर्ज किया।

वह लगभग हर चीज का उत्पादन और आपूर्ति अधिकांश देशों से सस्ते दरों पर कर सकता है। इसका विभिन्न देश की घरेलू विनिर्माण और आर्थिक वृद्धि की योजनाओं पर क्या असर होगा? एक नई दुनिया आ रही है। हमें ऐसा उत्तर चाहिए जो यह सुनिश्चित करे कि यह दुनिया लोगों और पृथ्वी दोनों के लिए बेहतर हो।


(ले​खिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरमेंट से जुड़ी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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First Published - February 10, 2026 | 10:01 PM IST

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