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16वें वित्त आयोग की नई अंतरण व्यवस्था: राज्यों के लिए फायदे-नुकसान और उठते सवाल

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सोलहवें वित्त आयोग का कर विभाजन ढांचा पुराने मॉडलों से अलग है। राजकोषीय समता कायम करने की दिशा में इसके प्रभाव भी अभी सामने आ ही रहे हैं। बता रहे हैं डीके श्रीवास्तव

Last Updated- February 09, 2026 | 10:58 PM IST
Finance Commission

राजकोषीय अंतरण की किसी भी योजना के दो मुख्य पहलू होते हैं। उनका ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज आयाम। अंतरण का मुख्य ऊर्ध्वाधर निर्धारक यानी केंद्रीय करों के साझा पूल में राज्यों का हिस्सा समय के साथ लगभग अपरिवर्तित रहा है। वास्तव में, चौदहवें वित्त आयोग ने इस हिस्से को बढ़ाकर 32 फीसदी (जैसा कि तेरहवें वित्त आयोग ने अनुशंसा की थी) से 42 फीसदी कर दिया। यह 10 फीसदी अंकों की वृद्धि केंद्र सरकार के लिए भी चकित करने वाली थी।

यह संशोधित आंकड़ा बाद के वित्त आयोगों के लिए एक ठोस आंकड़ा बन गया जिसे बदला नहीं गया। पंद्रहवें वित्त आयोग ने जरूर जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश में परिवर्तित किए जाने पर इसे 1 फीसदी घटा दिया। इस प्रकार, राज्यों का केंद्रीय करों के साझा पूल में 42 फीसदी, बाद में 41 फीसदी हिस्सा, 2015-16 से लागू रहा है और यह कम से कम 2030-31 तक जारी रहेगा।

चूंकि यह कर विभाजन प्राथमिक अंतरण तंत्र के रूप में जारी है और बाद के वित्त आयोगों द्वारा इस अनुपात का सीमित मूल्यांकन किया गया है, इसलिए यह हिस्सा बड़े पैमाने पर अपरिवर्तित रहा है। केंद्र की प्रतिक्रिया यह रही है कि उसने अनुच्छेद 275 के तहत राज्यों को दिए जाने वाले अनुदानों के माध्यम से होने वाले अंतरण को बंद कर दिया है।

सोलहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के साथ, अनुदान-आधारित अंतरण के तीन माध्यम अब समाप्त कर दिए गए हैं- अनुच्छेद 275 के प्रावधान के
मुताबिक राजस्व-आवश्यकता अनुदान, क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान, और राज्य- विशिष्ट अनुदान।

मानदंड-आधारित अंतरण के लिए संकीर्ण सूचना आधार: राज्यों के बीच अंतरण वितरण के लिए उपयोग किया जाने वाला सूचना आधार अब केवल कर-विकेंद्रीकरण फॉर्मूला या सूत्र में शामिल जानकारी पर निर्भर है और इस अर्थ में संकीर्ण हो गया है। कर-विकेंद्रीकरण सूत्र स्वभाव से व्यापक होते हैं, लेकिन वे उन सूचनात्मक विवरणों को नहीं पकड़ सकते जो राज्यों के राजकोषीय मानकों को प्रभावित करते हैं। भारत के राज्य अपने आकार, आवश्यकताओं और लागत की परिस्थितियों के संदर्भ में अत्यधिक भिन्न हैं।

कर-विकेंद्रीकरण सूत्रों का सूचना आधार कुछ सीमाओं के साथ आता है। विशेष रूप से, यह जानकारी अत्यधिक पुरानी होती है क्योंकि इसके लिए जनगणना में उपलब्ध जनसंख्या आंकड़ों का उपयोग करना आवश्यक है, जो वर्तमान स्थिति में केवल 2011 तक के उपलब्ध हैं। चूंकि जनसंख्या वित्त आयोग द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक मुख्य कारक है, इसलिए 2011 की जनसंख्या आंकड़े सोलहवें वित्त आयोग की अनुशंसा अवधि के अंतिम वर्ष 2030-31 तक लगभग 21 वर्ष पुराने हो जाएंगे।

राज्यों की राजकोषीय क्षमता को नॉमिनल प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद के आंकड़ों से मापा जाता है। इस उद्देश्य के लिए, सोलहवें वित्त आयोग द्वारा उपयोग किए गए आंकड़े वर्ष 2018-19 से 2023-24 तक के हैं। इसमें कोविड वर्ष 2020-21 को छोड़ दिया गया है। यह 2021-22 पर केंद्रित है। इस प्रकार, सोलहवें वित्त आयोग की अनुशंसा अवधि के अंतिम वर्ष तक यह आकड़े भी नौ साल पुराने हो जाएंगे।

राजस्व घाटा कर-अंतरण का एक परिणाम है: आयोग ने यह निर्णय लिया है कि वह राज्यों को कर-अंतरण के बाद की राजस्व आवश्यकताओं का कोई आकलन नहीं करेगा और न ही इस आधार पर कोई अनुदान देगा। इन अनुदानों को राजस्व-घाटा अनुदान के रूप में जाना जाने लगा है। सोलहवें वित्त आयोग द्वारा इस तरह का आकलन न करने या राजस्व-घाटा अनुदान न देने का तर्क यह है कि राज्यों का कुल राजस्व घाटा सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.3 फीसदी है।

हालांकि, इस पर बहस हो सकती है क्योंकि राज्यों के राजस्व घाटे को जोड़कर या समेकित रूप से देखना अलग-अलग राज्यों की राजकोषीय स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करता। आयोग के निर्देश में अलग-अलग राज्यों के राजस्व संतुलन स्थिति की जांच भी शामिल है। एक राज्य में राजस्व अधिशेष दूसरे राज्य के राजस्व घाटे को सीधे तौर पर संतुलित नहीं करता। अधिक उपयुक्त यह होगा कि घाटे वाले राज्यों के राजस्व घाटों के योग पर विचार किया जाए, जो 2023-24 में सकल घरेलू उत्पाद का 0.8 फीसदी था। यह एक बड़ा आंकड़ा है, विशेषकर जब आयोग द्वारा अनुशंसित अन्य दो अनुदान, स्थानीय निकाय और प्राकृतिक आपदा अनुदान, मिलकर केवल सकल घरेलू उत्पाद का 0.4 फीसदी ही होते हैं।

हालांकि, एक और महत्त्वपूर्ण विचार है। अनुच्छेद 275 के तहत राजस्व-घाटा अनुदान निर्धारित करने की कवायद में कर-अंतरण के बाद के राजस्व घाटे और राजस्व अधिशेष का अनुमान लगाना शामिल होता है। यदि अंतरण योजना बदलती है, तो राजस्व घाटे की पिछली प्रोफाइल मायने नहीं रखती। राजस्व संतुलन की प्रोफाइल उस अंतरण योजना पर निर्भर करेगी जिसकी आयोग अनुशंसा करता है।

इस योजना में, आयोग ने एक अतिरिक्त मानदंड जोड़ा है जो सभी राज्यों के सकल राज्य घरेलू उत्पाद में किसी राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद के हिस्से पर आधारित है। यह कारक उन राज्यों के लिए अधिक अधिशेष का कारण बन सकता है जिनके पास पहले से ही राजस्व अधिशेष है और उन राज्यों के लिए अधिक राजस्व घाटे का कारण बन सकता है जिनके पास पहले से ही राजस्व घाटा है, क्योंकि संरचना ऐसी है जिससे उच्च-सकल राज्य घरेलू उत्पाद वाले राज्य अधिक अंतरण प्राप्त करते हैं। इस प्रभाव की जांच की जानी चाहिए।

सोलहवां वित्त आयोग अंतरण ढांचे के राजकोषीय प्रभाव की राज्य-वार जांच से इसके समग्र अंतरण योजना के राजकोषीय समता पर पड़ने वाले प्रभाव का स्पष्ट आकलन प्रदान कर सकता था। यह परिवर्तन पहले के ढांचों से एक उल्लेखनीय विचलन पेश करता है और उस क्षेत्र को उजागर करता है जिसमें आगे की समीक्षा की आवश्यकता है ताकि यह भविष्य के वित्त आयोगों के लिए एक मिसाल न बन जाए।

कर विभाजन में लाभ और नुकसान वाले राज्य: सोलहवें वित्त आयोग की कर-अंतरण रूपरेखा में, सकल राज्य घरेलू उत्पाद योगदान के नए मानदंड को 10 फीसदी भार दिया गया। उसे आय दूरी मानदंड के भार को 2.5 फीसदी घटाकर (समता लाने वाले मानदंड में कमी) और क्षेत्र मानदंड के भार को 5 फीसदी घटाकर (लागत अक्षमता को दर्शाने वाले मानदंड में कमी) समायोजित किया गया।

इसके अतिरिक्त, कर-प्रयास मानदंड, जिसका भार 2.5 फीसदी था, हटा दिया गया। पंद्रहवें वित्त आयोग की तुलना में सोलहवें वित्त आयोग की कर-विभाजन योजना में जिन प्रमुख राज्यों को नुकसान हुआ है, वे हैं- मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मेघालय, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और गोवा। ये सामान्यतः या तो कम राजकोषीय क्षमता वाले राज्य हैं या अपेक्षाकृत छोटे राज्य। कर-विभाजन के बाद की आवश्यकताओं का आकलन करने से कुछ राज्यों के नुकसान की समस्या को आंशिक रूप से संबोधित किया जा सकता था, जबकि अन्य राज्यों के लाभ को यथावत रखा जा सकता था।


(लेखक ईवाई इंडिया के मुख्य नीति सलाहकार हैं। ईवाई इंडिया में कर एवं आर्थिक नीति समूह की वरिष्ठ प्रबंधक रागिनी त्रेहान ने भी इस आलेख में योगदान किया है। ये उनके निजी विचार हैं।)

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First Published - February 9, 2026 | 10:58 PM IST

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