facebookmetapixel
Advertisement
Bharat PET IPO: ₹760 करोड़ जुटाने की तैयारी, सेबी में DRHP फाइल; जुटाई रकम का क्या करेगी कंपनीतेल, रुपये और यील्ड का दबाव: पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी अस्थिरता, लंबी अनिश्चितता के संकेतवैश्विक चुनातियों के बावजूद भारतीय ऑफिस मार्केट ने पकड़ी रफ्तार, पहली तिमाही में 15% इजाफाJio IPO: DRHP दाखिल करने की तैयारी तेज, OFS के जरिए 2.5% हिस्सेदारी बिकने की संभावनाडेटा सेंटर कारोबार में अदाणी का बड़ा दांव, Meta और Google से बातचीतभारत में माइक्रो ड्रामा बाजार का तेजी से विस्तार, 2030 तक 4.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमानआध्यात्मिक पर्यटन में भारत सबसे आगे, एशिया में भारतीय यात्रियों की रुचि सबसे अधिकबांग्लादेश: चुनौतियों के बीच आजादी का जश्न, अर्थव्यवस्था और महंगाई बनी बड़ी चुनौतीपश्चिम एशिया संकट के बीच भारत सतर्क, रणनीतिक तेल भंडार विस्तार प्रक्रिया तेजGST कटौती से बढ़ी मांग, ऑटो और ट्रैक्टर बिक्री में उछाल: सीतारमण

प्रिय नरेंद्रभाई, क्या आप हमारे पूर्वी क्षेत्र में रणनीतिक स्थिरता को फिर से बहाल कर सकते हैं?

Advertisement

अगले सप्ताहांत तक बांग्लादेश में एक निर्वाचित सरकार होगी। यह भारत के लिए टूटे-बिखरे संबंधों को पुनः स्थापित करने का अवसर है

Last Updated- February 08, 2026 | 9:55 PM IST
India Bangladesh
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

करीब एक दशक से भी अधिक पहले अगस्त 2013 में प्रकाशित एक आलेख में मैंने तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनने जा रहे नरेंद्र मोदी से एक अपील की थी। यह उसी अपील की दूसरी कड़ी है और इसकी एक वजह है। बांग्लादेश में एक सप्ताह से भी कम समय में चुनाव होने जा रहे हैं।

अगले सप्ताहांत या उसके बाद के हफ्ते के आरंभ में बांग्लादेश में एक निर्वाचित सरकार होगी। एक ओर जहां अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के कारण विश्वसनीयता का प्रश्न होगा लेकिन इन्हें कुछ हद तक निष्पक्ष चुनाव कहा जा सकता है। पाकिस्तान के उलट बांग्लादेश में सेना किसी होड़ में नहीं है और न ही उसने किसी प्रत्याशी को समर्थन दिया है। सेना प्रमुख वकार उज जमां ने हाल ही में केवल यह कहा कि सेना एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करेगी।

अगस्त 2013 के आलेख पर वापस लौटते हैं जिसका शीर्षक था: प्रिय नरेंद्र भाई। उस लेख में कहा गया था कि भारत और बांग्लादेश ने सीमा से जुड़ी समस्याओं, खासकर सीमा के दोनों ओर भीतरी इलाकों में बनी बस्तियों के मुद्दे को सुलझाने के लिए एक ऐतिहासिक समझौता किया है। ये बस्तियां दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेद के दौर के बंटुस्तानों जैसी बन गई थीं, जहां सही मायनों में किसी का शासन नहीं था और जो अपराध, तस्करी और आतंकवाद के अड्डे बन गई थीं। मोदी की पार्टी में किसी ने सीमा समझौते के विरोध में कुछ नहीं कहा था।

तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने तो उसका समर्थन ही किया था। फिर भी पार्टी ने संसद में इसका विरोध किया। इसका संबंध पार्टी के भीतर के सत्ता संघर्ष से था। लेख में सवाल यह था कि क्या मोदी राष्ट्र हित में आगे आएंगे और अपनी पार्टी को समझौते को स्वीकार करने को राजी करेंगे। यहां तक कि बांग्लादेश के उच्चायुक्त ने भी उस वक्त अहमदाबाद की यात्रा की थी और उनका समर्थन चाहा था।

उस वक्त मोदी ने हस्तक्षेप नहीं किया लेकिन उन्होंने शायद यह संकेत दिया था कि एक बार सत्ता में आने के बाद वे इस मसले को देखेंगे। प्रधानमंत्री बनने के एक साल बाद 6 जून, 2015 को भारत-बांग्लादेश भू-सीमा समझौता हो गया। इसके साथ ही दोनों देशों ने अपनी समुद्री सीमा को भी परिभाषित किया और स्वीकार कर लिया।

इसके लिए पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से बातचीत करने और उन्हें मनाने तथा असम और त्रिपुरा में संवेदनशीलता से निपटने की भी जरूरत थी। बांग्लादेश भारत का इकलौता ऐसा बड़ा पड़ोसी बन गया जिसके साथ उसका सीमा विवाद पूरी तरह सुलझ चुका था। श्रीलंका के साथ भी कच्चातिवु का मामला भले ही औपचारिक रूप से निपट चुका है लेकिन चुनाव प्रचार में अक्सर भाजपा उसे ले आती है।

बांग्लादेश के साथ भू-समझौता उनके कार्यकाल के शुरुआती दौर में हुआ और वह अब तक मोदी सरकार की सबसे बड़ी रणनीतिक सफलताओं में से एक बना हुआ है। यह इसलिए भी एक बड़ी कामयाबी है क्योंकि यह उसी समय हुआ था जिस अवधि में नेपाल भारतीय भूभाग को लेकर उकसावे वाले दावे कर रहा था।

कई मायनों में मैं न केवल इसे मोदी की सबसे बड़ी कामयाबियों में शामिल करूंगा बल्कि इस बात का प्रमाण भी मानूंगा कि बड़े फलक पर देखते हुए वह कितने समझदार हो सकते हैं। बांग्लादेशी अवैध आप्रवासी या घुसपैठियों की समस्या भाजपा की राजनीति के केंद्र में रही है। खासतौर पर पूर्वी इलाके के राज्यों में। यह पश्चिम बंगाल विधान सभा और लोक सभा चुनावों के लिए भी अहम था। इसके बावजूद वह इस समझौते को लेकर प्रतिबद्ध रहे। यह तब था जब उनकी पार्टी इस मुद्दे पर तीखी भाषा इस्तेमाल कर रही थी और इसे जनसंख्या का स्वरूप बदलने की साजिश बता रही थी।

पूर्व ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ बिपिन रावत जैसे कुछ लोगों ने तो जर्मनी के नाजी दौर के ‘लेबेन्स्राउम’ जैसे विस्तारवादी विचारों की भी बात की थी। हिटलर ने इस शब्द का इस्तेमाल अपनी किताब ‘मीन काम्फ’ में किया था, जिसमें उसने पड़ोसी देशों में जर्मनों को बसाकर भौगोलिक विस्तार की बात कही थी। करीब एक दशक पहले जैसी स्थिति थी, आज हम इतिहास के उसी तरह के एक मोड़ पर खड़े हैं। फर्क बस यह है कि 2014 की तुलना में आज रणनीतिक असर और संभावनाएं कहीं ज्यादा बड़ी हैं। बांग्लादेश में चुनाव पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों से कुछ महीने पहले हो रहे हैं। यह एक तरह से अच्छा मौका है, क्योंकि अभी ‘घुसपैठिया’ वाला नारा बहुत तेज नहीं हुआ है।

हालांकि, प्रधानमंत्री ने राज्य सभा में अपने भाषण में इसका जिक्र जरूर किया है। इसके साथ ही सोशल मीडिया तथा कई टीवी चैनलों पर भी बांग्लादेश के विरोध में काफी कुछ है। बांग्लादेश के चुनाव पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव से पहले हो रहे हैं और यह बात मोदी सरकार को अवसर दे रही है कि वह हालात को अपेक्षाकृत सामान्य बनाए। हालात को कुछ हद तक गैर शत्रुतापूर्ण भी बनाया जा सकता है, हालांकि शेखर हसीना के दौर जैसे रिश्ते कायम कर पाना अब मुश्किल है।

यह इस बात को लेकर क्रोधित होने का समय नहीं है कि बांग्लादेश में भारत के पसंदीदा नेता को सत्ता से बाहर कर दिया गया है। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने पूरी तरह अ​धिकार वाली सरकार की तरह काम किया और विदेश नीति में नाटकीय बदलाव किए। यूनुस ने डेढ़ साल पाकिस्तान के साथ संबंधों को बेहतर बनाने में बिताए। इसमें भारत को चिढ़ाने वाली व्यवस्थित रूप से उकसावे की कार्रवाई शामिल थीं, जैसे पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों की यात्राएं।

उनकी सरकार ने बड़े हथियार खरीदने की बात की, उन्होंने भारत की ‘सात बहनों’ (पूर्वोत्तर) को लेकर भड़काऊ बयान दिए। उन्होंने भारत द्वारा शेख हसीना को सुरक्षित आश्रय देने को भी समझौता भंग करने वाला कदम बताया। यह बांग्लादेश के दृष्टिकोण से बेहद अल्पदृष्टि है और भारत के लिए खीझ पैदा करने वाला। अच्छी बात यह है कि अगर कोई चमत्कार नहीं हुआ तो एक सप्ताह में वह सत्ता एक निर्वाचित सरकार को सौंप देंगे। यही वह मोड़ है जिसके बारे में हम बात कर रहे हैं।

भारत ने खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में विदेश मंत्री एस जयशंकर को भेजकर समझदारी भरा कदम उठाया। वह जिया के बेटे और बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी के चेयरमैन तारिक रहमान से भी मिले। अब तक रहमान एक परिपक्व नेता के रूप में उभरे हैं। तथ्य यह है कि किसी को नहीं पता कि चुनाव कौन जीतेगा और किसी को स्पष्ट बहुमत मिलेगा या नहीं।

अब तक के ओपिनियन पोल यही बताते हैं कि रहमान और उनकी पार्टी बीएनपी आगे है। वहां के प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र प्रथम ऑलो का सर्वेक्षण बताता है कि बांग्लादेश में 83 फीसदी लोगों के लिए बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है, 77 फीसदी लोगों को लगता है कि माहौल कारोबार के लिए उपयुक्त नहीं है और 35 फीसदी देश के आर्थिक प्रदर्शन से निराश हैं। वहां इस्लामीकरण या अति राष्ट्रवाद की मांग नहीं है। सड़कों पर माहौल भारत विरोधी जरूर है लेकिन उसका संबंध हसीना के मामले से अधिक है। हालांकि 54 फीसदी लोग मानते हैं कि नई सरकार सामाजिक और धार्मिक रूप से सहिष्णु होगी।

प्रथम ऑलो का एक और सर्वेक्षण बताता है कि 47 फीसदी लोग तारिक रहमान को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं और केवल 22.5 फीसदी लोग ही जमात-ए-इस्लामी के शफीकुर रहमान को चाहते हैं। इससे पता चलता है कि जमात को कितना समर्थन है। शायद यूनुस समेत एक ताकत ऐसी है जो चाहेगी कि त्रिशंकु संसद बने। ऐसी मिलीजुली सरकार बने जिसमें जमात शामिल हो। कुछ लोग ‘जुलाई चार्टर’ (2025) के तहत अधिक अधिकारों वाले राष्ट्रपति की भी मांग कर रहे हैं, जिस पर इस चुनाव के साथ ही जनमत संग्रह होगा।

इसके तहत, प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित निचला सदन आनुपातिक आधार पर एक उच्च सदन का चयन करेगा और दोनों मिलकर गुप्त मतदान द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव करेंगे (बिना किसी पार्टी व्हिप के)। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री पर कुछ निगरानी शक्तियां रखेगा। 85 साल के यूनुस यही सोच रहे होंगे कि काश वे दस साल छोटे होते। पिछले शुक्रवार जारी अपने घोषणापत्र में बीएनपी ने राष्ट्रपति के लिए इन विशेष शक्तियों को अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने जुलाई चार्टर बैठकों में भी यही कहा था। यदि उन्हें बहुमत मिलता है, तो यह मुद्दा समाप्त हो जाएगा।         

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि न तो बीएनपी और न ही जमात पाकिस्तान के बारे में कुछ कहते हैं। जमात भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहती है, जबकि बीएनपी सभी के साथ ‘पारस्परिक सम्मान’  पर आधारित संबंध चाहती है। यह प्रगति है। एकमात्र पार्टी जो भारत के बारे में कठोर बातें करती है, वह है छात्रों की पार्टी जिन्होंने विद्रोह का नेतृत्व किया। इसका नाम है एनसीपी या नैशनल सिटिजंस पार्टी। इसे बमुश्किल दो फीसदी लोगों का समर्थन हासिल है हालांकि यह जमात के साथ है।

यह भारत के लिए संभावनाओं से भरा एक दिलचस्प चुनाव का मंच तैयार करता है। यह मोदी को बांग्लादेश के साथ संबंधों को पुनः स्थापित करने का अवसर देता है। पश्चिम बंगाल और असम चुनावों के ठीक पहले यह चुनौतीपूर्ण होगा। यही कारण है कि अपील 2013 जैसी ही है। क्या आप भारत के पूर्व में रणनीतिक स्थिरता वापस लाने के लिए बड़ा दिल दिखा सकते हैं? इसका अर्थ होगा विधान सभा चुनावों में बांग्लादेश-विरोधी बयानबाजीको कम करना। या फिर हमें अपने पूर्व में एक बांग्ला-भाषी पाकिस्तान को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना होगा।

Advertisement
First Published - February 8, 2026 | 9:55 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement