पश्चिम एशिया की जंग शायद जल्दी समाप्त हो जाए लेकिन यह भी संभव है कि शायद ऐसा न हो। इस जंग के पीछे का मुख्य कारक यानी डॉनल्ड ट्रंप का अमेरिकी प्रशासन रोज विरोधाभासी संकेत देता है। शुक्रवार को कहा गया कि अमेरिका ईरान के चुनिंदा तटीय ढांचों पर नौ सेना के जरिये जमीनी हमले की योजना बना रहा है जिसमें खर्ग द्वीप जैसे तेल और गैस टर्मिनल पर हमला भी शामिल होगा। हालांकि इसके तुरंत बाद ट्रंप ने कहा कि युद्ध शायद जल्दी खत्म हो जाएगा क्योंकि अमेरिका अपने सैन्य लक्ष्य हासिल करने के करीब है।
समस्या यह है कि यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि वे उद्देश्य वास्तव में क्या हैं। शायद शुरुआत इस योजना से हुई थी कि ईरान के नेतृत्व को समाप्त किया जाए और उसकी लंबी दूरी की मिसाइलें दागने की क्षमता को न्यूनतम किया जाए, तथा उम्मीद थी कि उसके हथियार-ग्रेड परमाणु कार्यक्रम को भी धीमा किया जा सकेगा। इसके बाद विभिन्न समयों पर जंग का उद्देश्य कभी सत्ता परिवर्तन तक विस्तृत होता दिखाई दिया और कभी रिपब्लिकन गार्ड की युद्ध क्षमता को कमजोर करने तक सीमित होता गया। इस समय मुख्य उद्देश्य केवल होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलना प्रतीत होता है, जिसके माध्यम से वैश्विक जीवाश्म ईंधन आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है।
बाजार लगातार ट्रंप के बयानों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहे हैं, हालांकि इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि उनका बाद की कार्रवाइयों से शायद ही कोई संबंध होता है। उदाहरण के लिए, 9 मार्च को बाजार उस समय उछल गए जब उन्होंने एक पत्रकार से कहा कि ‘युद्ध लगभग पूरा हो चुका है’ और फिर सार्वजनिक रूप से कहा कि युद्ध ‘बहुत जल्दी समाप्त हो जाएगा’। राष्ट्रपति के सामने दो परस्पर विरोधी आवश्यकताएं हैं। पहली, वे इस युद्ध को ऐसी शर्तों पर समाप्त करना चाहेंगे जिससे लगे कि इसमें शामिल होना सार्थक था।
दूसरी, उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका अमेरिकी उपभोक्ताओं पर प्रभाव राजनीतिक रूप से संभालने योग्य हो। ये दोनों आवश्यकताएं परस्पर टकराती हैं क्योंकि, उदाहरण के लिए, उन्हें एक साथ यह दावा करना पड़ता है कि ईरानी शासन उनके कदमों के कारण अधिक अलग-थलग और आर्थिक रूप से असुरक्षित हो गया है और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है कि समुद्र में पहले से मौजूद ईरानी कच्चा तेल बिकता रहे, ताकि तेल की कीमतों में तेजी को थामा जा सके।
इसका अर्थ यह भी है कि वे ईरान के ऊर्जा ढांचे के पूर्ण विनाश का स्वागत नहीं करेंगे। ट्रंप और उनके रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्हें अपने सहयोगी इजरायल के उस हमले के बारे में कुछ पता नहीं था, जो दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार ‘साउथ पार्स फील्ड’ पर किया गया था। वहीं इजरायल ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह छापेमारी अमेरिकी बलों के साथ समन्वय में की गई थी। इन विरोधाभासी संदेशों ने बाजारों को मूल रूप से इतना भ्रमित कर दिया है कि वे सूचना-संग्राहक के रूप में ढहने की कगार पर पहुंच गए हैं। अनुसंधान फर्म ‘वेरिएंट परसेप्शन’ ने पिछले गुरुवार को एक नोट में कहा कि आने वाले दिन युद्ध को लेकर ‘चरम अनिश्चितता’ का समय होंगे, और सोने तथा इक्विटी का एक साथ नीचे जाना घबराहट से प्रेरित ‘रणनीतिक नकदीकरण’ का संकेत है।
माना जा सकता है कि कुशल बाजार का सिद्धांत उस दुनिया में टिक नहीं पाएगा, जहां दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक संकेतक यानी ब्रेंट क्रूड के एक बैरल की कीमत एक अत्यंत अप्रत्याशित व्यक्ति की इच्छाओं पर निर्भर करती है। फिर भी कुछ संकेतक ऐसे हैं जिन पर ध्यान देना सार्थक है। शायद इसलिए कि वे उसी समस्याग्रस्त गतिशीलता को मजबूत करते हैं जिसने हमें इस संकट में डाला। इनमें से एक है ब्रेंट (जो नॉर्थ सी ऑयल को ट्रैक करता है), मुरबान (जो खाड़ी के तेल को ट्रैक करता है), और वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) के बीच का अंतर।
गत शनिवार को मुरबान 146.40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि ब्रेंट 112 डॉलर पर था और डब्ल्यूटीआई 90 डॉलर से थोड़ा ऊपर। जैसे-जैसे इसकी आपूर्ति लाइनों पर दबाव बढ़ रहा है, ज्यादातर वैश्विक बाजार विखंडित हो रहा है। एशियाई खरीदारों पर इसका असर यूरोपीय खरीदारों से अधिक होगा, और यूरोपीय खरीदारों पर अमेरिकी खरीदारों की तुलना में कहीं अधिक।
ट्रंप के पास यह शक्ति है कि वे दुनिया के किसी दूरस्थ हिस्से में ऐसा युद्ध छेड़ दें जो असंख्य अर्थव्यवस्थाओं को ठप कर सकता है। लेकिन, भले ही यह हर अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाए, अमेरिका को सबसे कम चोट पहुंचती है। आंशिक रूप से इसलिए कि वह दूरी से सुरक्षित है और इसलिए भी कि यदि आर्थिक दबाव का मुख्य कारण जीवाश्म ईंधन की कीमतें हैं, तो अमेरिका अब ऊंची कीमतों का लाभार्थी भी है और पीड़ित भी।
ईरान पर पहले हमलों के बाद से शेवरॉन का शेयर 5-10 फीसदी बढ़ा है, जबकि डाॅऊ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 7 फीसदी गिरा है। आज अमेरिका के पास हर जगह अराजकता पैदा करने के लिए प्रोत्साहन है, क्योंकि इससे उसकी अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मज़बूत होती है और बाकी सबकी कमजोर। वहीं दुनिया के पास उस पर न तो राजनीतिक और न ही आर्थिक रूप से कोई वास्तविक दबाव है। लंबे समय में इस तरह का असंतुलन टिक नहीं सकता।
ऐसे में दो प्रतिक्रियाएं संभव हैं। या तो बाकी दुनिया स्वयं को एक अधिक प्रभावी गुट में संगठित करेगी, और ट्रंप के बाद के अमेरिका को अपने प्रतिद्वंद्वियों से भी बड़ा ख़तरा मानेगी या फिर वह ऐसे विशिष्ट तंत्रों की पहचान करेगी जिनके माध्यम से वह अमेरिका पर लागत थोप सके। पहले परिदृश्य की कल्पना करना कठिन है, लेकिन कुछ संकेत दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में पॉलिटिको द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में प्रमुख पश्चिमी देशों के नागरिकों से पूछा गया कि चीन पर निर्भर रहना बेहतर है या ट्रंप के अमेरिका पर। परिणाम चौंकाने वाले थे।
कनाडा में 57 फीसदी लोगों ने चीन को चुना, जबकि अमेरिका को केवल 23 फीसदी। फ्रांस में चीन को 34 फीसदी और अमेरिका को 25 फीसदी समर्थन मिला। यहां तक कि परंपरागत रूप से अटलांटिक समर्थक ब्रिटेन में भी 42 फीसदी ने चीन का समर्थन किया, जबकि ट्रंप के अमेरिका को केवल 34 फीसदी। इन देशों के सामने चीन की ओर से संभावित आर्थिक दबाव के किसी दूरगामी खतरे को लेकर तर्क देना मुश्किल है, जबकि उन्हें अमेरिका की एकतरफा कार्रवाइयों के कारण पैदा हुए कहीं अधिक आसन्न आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।
दूसरा परिदृश्य और भी कठिन प्रतीत होता है। यह सच है कि उदाहरण के लिए जापान, जो तेल आयातक है और खाड़ी संकट से गहराई से प्रभावित है, उसके पास अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की बड़ी हिस्सेदारी है। अन्य देश कुछ समय से डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात कर रहे हैं। लेकिन इसे व्यवहार में लाना आसान नहीं होगा। फिर भी, जितना अमेरिकी व्यवहार बिगड़ता जाएगा, उतनी ही संभावना है कि विभिन्न देश इसकी काट के लिए जोखिम उठाने को तैयार होंगे।