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आधुनिक शहर पर पुराने कायदे: क्यों बुनियादी ढांचे के बावजूद बेहाल हैं भारतीय शहर?

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चमकती इमारतों और डिजिटल सुविधाओं के बावजूद भारतीय शहर बुनियादी तालमेल और नियमों के अभाव में जूझ रहे हैं। असली सुधार केवल कंक्रीट से नहीं, भरोसेमंद शासन से आएगा

Last Updated- March 31, 2026 | 9:39 PM IST
Delhi Traffic
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारत के शहर बहुत पुराने तरीकों से बहुत आधुनिक चीजें करना सीख रहे हैं। हम 10 मिनट में किराने का सामान मंगा सकते हैं, यूपीआई से सड़क पर किसी वेंडर को भुगतान कर सकते हैं, ऐप पर अपनी बस को देख सकते हैं और विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़े किसी कांच के टॉवर में बैठकर अपना काम कर सकते हैं। तभी अचानक बारिश आ जाती है, चौराहे पर जाम लग जाता है, सर्विस लेन पर कचरा फैल जाता है, कारों की भीड़ फुटपाथ को जाम कर देती है और शहर फिर से बातचीत के पुराने ढर्रे पर लौट जाता है।

शहरों की इस अदृश्य कमी को इस वर्ष की आर्थिक समीक्षा में भी शामिल किया गया है। उसमें कहा गया है कि नागरिकों और राज्य के बीच कमजोर तालमेल भारतीय शहरों के निवेश को व्यवस्था में बदलने और विकास को रहने योग्य बनाने के लिए संघर्षरत छोड़ देता है।

यह आकलन बहुत दिलचस्प है बजाय इस नजरिये के कि भारतीय शहरों को केवल अधिक पैसे, अधिक सड़कों और अधिक फ्लाईओवरों की आवश्यकता है। यह सही है कि उन्हें निवेश की आवश्यकता है लेकिन इसके साथ ही उन्हें कुछ और भी चाहिए जो हासिल करना कठिन है लेकिन जिसकी अनदेखी करना मुश्किल है। शहरों को एक व्यापक रूप से साझा समझ की आवश्यकता है कि सार्वजनिक नियम वास्तविक हैं, सार्वजनिक स्थान साझा है, और अनुपालन करना बेवकूफी नहीं है।

जो बात अमूर्त नजर आ सकती है वह बहुत व्यावहारिक है। इसी से तय होता है कि ट्रैफिक सिग्नल यातायात को समन्वित करते हैं या केवल सुझाव के रूप में काम करते हैं, कि आवास योजनाएं शहरी विकास का मार्गदर्शन करती हैं या धीरे-धीरे अतिक्रमणों से खोखली हो जाती हैं, और कि कचरा छांटने के अभियान रोजमर्रा की आदतों को बदलते हैं या केवल पावरपॉइंट स्लाइडों तक सीमित रह जाते हैं।

भारत के शहर अब आर्थिक रूप से इतने महत्त्वपूर्ण हो गए हैं कि यह मुद्दा अब हाशिये पर नहीं रह सकता। शहरी भारत पहले से ही राष्ट्रीय उत्पादन का बड़ा हिस्सा पैदा करता है और भविष्य में देश के जनसांख्यिकीय और आर्थिक बदलावों का अधिकांश हिस्सा भी यहीं होगा। विश्व बैंक ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2036 तक भारत के कस्बे और शहरों का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में योगदान लगभग 70 फीसदी का हो सकता है।

भारत में मानक शहरी चर्चा अभी भी भौतिक अधोसंरचना पर केंद्रित रहती है। लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि शहर केवल इंजीनियरिंग परियोजनाएं नहीं हैं। वे अजनबियों के बीच सहयोग की बड़ी प्रणालियां हैं। उनकी सफलता इस पर निर्भर करती है कि क्या लाखों लोग विश्वास करते हैं कि नियमों को पूर्व नियोजित तरीके से लागू किया जाएगा और क्या राज्य स्वयं ऐसे व्यवहार करता है मानो प्रवर्तन नियमित हो, न कि केवल दिखावटी।

भारत में शहरी व्यवस्थाएं नियमों की कमी के कारण कम और इस कमजोर अपेक्षा के कारण अधिक लड़खड़ाती हैं कि वे नियम टिकेंगे। शहरी शासन पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अनुपालन मुख्य रूप से मानी गई वैधता और विश्वसनीय प्रवर्तन पर निर्भर करता है, न कि केवल नियमों के घनत्व पर। कई भारतीय शहरों में नियम और व्यवहार के बीच का अंतर रोजमर्रा की समन्वय विफलताओं में दिखाई देता है।

उदाहरण के लिए, बेंगलूरु के यात्री अब सालाना लगभग 168 घंटे जाम में गंवाते हैं, जबकि औसत अधिकतम गति 14 किमी/घंटा से नीचे गिर जाती है। यह दर्शाता है कि कैसे व्यावहारिक और संस्थागत रुकावटें अवसंरचना की सीमाओं को और बढ़ा देती हैं। ऐसे पैटर्न शहरी अर्थशास्त्र में अच्छी तरह दर्ज हैं: जब प्रवर्तन असमान दिखता है और प्रक्रियाएं अस्पष्ट होती हैं, तो नागरिक तार्किक रूप से अनुकूलन करते हैं। संकेत बातचीत योग्य हो जाते हैं, नियम लचीले हो जाते हैं, और अनौपचारिक उपाय धीरे-धीरे शहर की व्यावहारिक परिचालन प्रणाली बन जाते हैं। 

भारत का शहरी इतिहास यह समझाने में मदद करता है कि यह संतुलन इतना जिद्दी क्यों साबित हुआ है। औपनिवेशिक नगरपालिकाएं सशक्त बनाने की बजाय प्रशासन के लिए अधिक तैयार की गई थीं। स्वतंत्रता के बाद, शहरीकरण इतनी तेज गति से बढ़ा कि शासन प्रणालियां कभी पूरी तरह मेल नहीं खा सकीं। शहर बाहर की ओर फैलते गए, संस्थाएं बिखरी रहीं, और अनौपचारिक व्यवस्थाएं आधिकारिक नियमों और वास्तविक जीवन के बीच की खाई को भरती गईं। समय के साथ, शहर ऐसे स्थान बन गए जहां वैधता और व्यवहारिकता दोनों अलग-अलग हो गए।

यह भूमि बाजार से लेकर यातायात तक हर जगह दिखाई देता है। भारत में केवल जाम नहीं है, बल्कि बातचीत से तय होने वाली आवाजाही की संस्कृति है। केवल महंगा आवास नहीं है, बल्कि एक ऐसी नियोजन प्रणाली है जिसकी औपचारिक कठोरता अक्सर लोगों को अनौपचारिक समाधानों की ओर धकेल देती है। केवल कचरे की समस्या नहीं है, बल्कि शहरी साझा संसाधनों की समस्या है, जहां सार्वजनिक क्षेत्र सैद्धांतिक रूप से सबकी चिंता है लेकिन व्यवहार में अक्सर किसी की जिम्मेदारी नहीं बनती।

फिर भी, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। भारतीय शहरों में ऐसे प्रमाण भी हैं कि नागरिक मानदंड बदल सकते हैं। इंदौर में स्वच्छता में सुधार केवल ट्रकों और डिब्बों का मामला नहीं था। इसमें लगातार यह संकेत देना शामिल था कि नियमों का पालन होगा, उनकी निगरानी होगी और सामाजिक रूप से उन्हें मजबूत किया जाएगा। डिजिटल टोलिंग, ऑनलाइन भवन मंजूरी और प्रत्यक्ष लाभ प्रणाली यह दिखाते हैं कि जब भारतीय शहरी शासन विवेकाधिकार के बजाय प्रक्रिया को चुनता है तो तनाव कम कर सकता है।

सबक यह नहीं है कि तकनीक शहर को बचा लेगी। भरोसे के बिना तकनीक अक्सर केवल अव्यवस्था को डिजिटाइज कर देती है। असली सबक यह है कि मानदंड तब बदलते हैं जब संस्थाएं अधिक विश्वसनीय बनती हैं। लोग उन प्रणालियों के साथ जल्दी अनुकूलन कर लेते हैं जो स्पष्ट, न्यायसंगत और भरोसेमंद तरीके से लागू होती हैं।

इसका शहरी नीतियों पर बड़ा असर पड़ता है। सुधार की अगली पीढ़ी केवल पूंजीगत व्यय तक सीमित नहीं रह सकती। इसमें उबाऊ लेकिन बुनियादी कार्य शामिल होने चाहिए। यानी स्पष्ट नगरपालिका जवाबदेही, कम ओवरलैप करने वाली एजेंसियां, सरल नियम, तेज अनुमोदन, और अनुपालन न करने पर अधिक साफ नतीजे। इसमें नागरिकों को बाधा मानने के बजाय साझेदार के रूप में देखना भी आवश्यक है। वार्ड-स्तरीय भागीदारी, निवासियों द्वारा निगरानी, विक्रेताओं का एकीकरण, विकेंद्रीकृत कचरा प्रणाली और पड़ोस की देखरेख भावनात्मक जोड़ नहीं हैं। ये मानव स्तर पर नागरिक समझौते को फिर से बनाने के तरीके हैं। 

भारतीय शहरी नीति के लिए अब सबसे प्रासंगिक प्रश्न यह नहीं है कि क्या शहरों को अधिक बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है। यकीनन उन्हें है लेकिन अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत ऐसे शहर बना सकता है जहां सार्वजनिक प्रणालियों पर पर्याप्त भरोसा हो और सार्वजनिक व्यवहार इतना समन्वित हो कि अधोसंरचना अपने उद्देश्य के अनुसार काम कर सके। अदृश्य दरार शहरी अराजकता का रूपक नहीं है। यह उन शहरों में गहरी संस्थागत नाजुकता का वर्णन है जो ऊपर से तेजी से आधुनिक दिखते हैं लेकिन रोजमर्रा के उपयोग में अस्थिर बने रहते हैं।

भारत का शहरी भविष्य केवल इस पर तय नहीं होगा कि वह कितना कंक्रीट इस्तेमाल करता है। यह इस पर तय होगा कि क्या वह नागरिक जीवन को कम बातचीत योग्य बना सकता है, सार्वजनिक अधिकार को अधिक विश्वसनीय बना सकता है, और साझा स्थानों को वास्तव में साझा बना सकता है। एक बार ऐसा हुआ तो भारतीय शहर केवल बढ़ेंगे नहीं बल्कि वे बेहतर काम करना शुरू करेंगे।

(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कंपेटेटिवनेस के अध्यक्ष हैं। लेख में मीनाक्षी अजित का भी सहयोग है। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - March 31, 2026 | 9:39 PM IST

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