पश्चिम एशिया में युद्ध ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है बल्कि इसने दुनिया के वित्तीय और मुद्रा बाजारों में भी महत्त्वपूर्ण बदलाव किए हैं। इसने एक ऐसे रुझान को बढ़ाया है जो पिछले कुछ वर्षों से स्पष्ट दिखाई देने लगा है और ऐसे संकेत दिख रहे हैं कि कुछ देश धीरे-धीरे अमेरिकी डॉलर के प्रति अपनी निर्भरता को कम कर रहे हैं।
इसका एक प्रमुख संकेतक, केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की खरीद में की गई भारी वृद्धि है। वर्ष 2025 में इन बैंकों ने अपने भंडार में रिकॉर्ड 850 टन सोना जोड़ा। हालांकि यह वृद्धि हाल के दिनों में थोड़ी धीमी हुई है लेकिन यह जारी है। इसके परिणामस्वरूप, सोने की कीमतें लगभग 5,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई हैं जो ऐतिहासिक रूप से एक अभूतपूर्व स्तर है।
पिछले संकट और युद्धों के दौरान जब अमेरिका इनमें खुद शामिल था, उस वक्त अमेरिकी डॉलर और अमेरिका की सरकार द्वारा जारी बॉन्ड और प्रतिभूतियां एक सुरक्षित मुद्रा के रूप में काम करती थीं। लेकिन इस बार के युद्ध के दौरान ऐसा नहीं हुआ। अब अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर गंभीर संदेह होने लगा है।
यदि अमेरिका अपनी ब्याज दरें बढ़ाता है ताकि अमेरिकी ऋण में निवेश आकर्षित किया जा सके तो इससे उसकी पहले से ही गंभीर हो चुकी वित्तीय स्थिति और भी बिगड़ सकती है। वर्तमान में अमेरिकी ऋण 36 लाख करोड़ डॉलर है और युद्ध के खर्च, नष्ट हुए हथियारों की दोबारा पूर्ति और रक्षा खर्चों में वृद्धि की संभावना इसके बोझ को और बढ़ाएगी, जबकि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बड़ी कर कटौती का वादा किया है।
फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर धारणा यह है कि इसकी सेहत अच्छी है क्योंकि इसके शेयर बाजार गहरे संकट के बावजूद लगातार वृद्धि कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़े शेयरों में दिख रही हलचल है। अत्याधुनिक तकनीकी कंपनियों के शेयरों में बड़ी मात्रा में पूंजी निवेश किया जा रहा है जो लगातार बेहतर लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) तैयार करने की होड़ में लगी हुई हैं।
हालांकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में इस निवेश को रिटर्न के जरिये न्यायोचित नहीं ठहराया जा सका है और अब यह संदेह बढ़ने लगा है कि भविष्य में भी यह निवेश किसी लाभ में परिवर्तित हो पाएगा या नहीं। कम से कम, एक बड़े स्तर पर संकट की स्थिति बनने या इन कंपनियों के एकीकरण की संभावना जताई जा रही है। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि यह कब होगा।
संभावना यह जताई जा रही है कि इसका बुलबुला फट सकता है जिसका पैमाना बेहद व्यापक होगा और जिसकी तीव्रता बहुत अधिक हो सकती है। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह एक वैश्विक वित्तीय और आर्थिक संकट की ओर ले जा सकता है जो वर्ष 2007-08 के संकट से कहीं अधिक गंभीर और लंबे समय तक चल सकता है। उस संकट के दौरान, अमेरिकी डॉलर ने अपनी सुरक्षित मुद्रा के दर्जे के कारण मजबूती दिखाई थी।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं चाहे वे विकसित हों या विकासशील, सबने एक समन्वित और सहयोगात्मक प्रतिक्रिया दी थी ताकि वित्तीय संकट का समाधान निकाला जा सके। वर्ष 2008 का जी20 अब अस्तित्व में नहीं है और डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिका इसके सदस्य देशों को अपनी अर्थव्यवस्था और मुद्रा को सहारा देने के लिए राजी करने में सक्षम नहीं होगा।
मैंने पहले के लेखों में शांघाई से संचालित होने वाले पेट्रो-युआन बाजार के उभार पर ध्यान आकर्षित कराया था। चीन ने दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देश के रूप में अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए, तेल निर्यातकों को चीनी मुद्रा में निर्यात की कीमत तय करने के लिए प्रेरित किया है। जब 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा रूस के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाए गए तब रूस ने शांघाई में तेल की कीमतों के सूचकांक के लिए पेट्रो-युआन बाजार का उपयोग शुरू किया और तेल से जुड़े लेनदेन युआन में निपटाए जाने लगे।
रूस एक प्रमुख तेल निर्यातक देश है इसलिए उसने शांघाई एक्सचेंज का उपयोग करके पेट्रो-युआन बाजार को और व्यापक बना दिया है। चीन में होने वाले सऊदी तेल निर्यात के एक छोटे हिस्से के लिए भी अब युआन में भुगतान किया जाता है। पश्चिम एशिया युद्ध के बीच, ईरान ने अपने तेल निर्यात के लिए युआन में भुगतान की मांग की है साथ ही होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर ‘टोल’ के लिए भी युआन में भुगतान करने की बात कही है जिसे अब वह नियंत्रित कर रहा है।
यह भी कहा जा रहा है कि ईरान अब भुगतान के रूप में स्टेबलकॉइन क्रिप्टोकरेंसी भी स्वीकार कर रहा है। यह संभवतः पहली बार हो सकता है जब कोई देश डॉलर को नकारते हुए अन्य मुद्राओं का चुनाव कर रहा हो और यह मजबूरी के कारण नहीं हो रहा है बल्कि सोच समझकर हो रहा है।
ब्रिक्स-प्लस देशों का समूह (जिसमें मूल पांच देश ब्राजील, चीन, भारत, रूस और दक्षिण अफ्रीका और बाद में शामिल हुए देश जैसे ईरान, इंडोनेशिया, मिस्र, इथियोपिया और यूएई शामिल हैं) इस साल के अंत में भारत में एक शिखर सम्मेलन के लिए एकत्र होगा। इस बीच ब्राजील, चीन और रूस ने एक साझा ब्रिक्स मुद्रा को लेकर सक्रियता दिखाने के लिए प्रोत्साहित किया है हालांकि भारत इसको लेकर सतर्कता बरत रहा है ताकि अमेरिका को नाराज न किया जाए। ट्रंप ने धमकी दी है कि यदि ब्रिक्स देश डॉलर-रहित व्यापार को तरजीह देने का कदम उठाते हैं तो उन पर 100 फीसदी आयात शुल्क लगाए जाएंगे।
निश्चित तौर पर परिस्थितियों में बदलाव के साथ, एक बहु-ध्रुवीय मुद्रा व्यवस्था अब अप्रत्याशित नहीं लगती। कई ब्रिक्स-प्लस सदस्य देशों द्वारा एक साझा मुद्रा की दिशा में अधिक सक्रियता से प्रयास किया जा सकता है। भारत को इस पहल में पीछे नहीं रहना चाहिए। इस बारे में एक गंभीर बहस होनी चाहिए कि भारत के हित में सबसे बेहतर क्या होगा। अमेरिका इसके लिए खुद जिम्मेदार है कि उसने डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा की स्थिति का उपयोग आर्थिक युद्ध के एक उपकरण के रूप में किया है।
अमेरिका ने उन देशों को वैकल्पिक वित्तीय लेनदेन के रास्ते ढूंढ़ने के लिए प्रेरित किया है जिन्हें अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। इनमें अनौपचारिक और रडार से बाहर नेटवर्क भी शामिल हैं। इंटरनेट-आधारित क्रिप्टोकरेंसी नेटवर्क का जन्म इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित हुआ है क्योंकि ये नेटवर्क गुमनाम और प्रभावी होते हैं और इन्हें नियंत्रित करना लगभग असंभव है। क्रिप्टो वॉलेट को विशेष लेनदेन के लिए बनाया जा सकता है और फिर इनका उपयोग खत्म होने पर हटा दिया जाता है।
चीन के अर्थशास्त्रियों ने एक बार फिर तीनध्रुवीय मुद्रा प्रणाली की भविष्यवाणी की है जिसमें अमेरिकी डॉलर का पश्चिमी गोलार्ध में दबदबा होगा जबकि यूरो का यूरोप में और युआन का एशिया में। हालांकि, यह कोई अपरिहार्य स्थिति नहीं है। युआन का व्यापार निपटान मुद्रा के रूप में उपयोग बढ़ेगा क्योंकि चीन दुनिया की सबसे बड़ी व्यापारिक शक्ति के रूप में अपने दबदबे को बनाए रखेगा।
लेकिन दो मुख्य कारणों से युआन को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में पूरी तरह से प्रचलित करने में कुछ बाधाएं आएंगी। पहला, राजनीतिक कारणों से, चीन अपनी मुद्रा की संभावित अस्थिरता को सहन नहीं कर सकता, जिसका मूल्य बाजार की ताकतों द्वारा निर्धारित हो। यदि युआन को पूरी तरह से परिवर्तनीय नहीं बनाया जाता ताे इसकी भूमिका स्पष्ट रूप से सीमित रहेगी।
दूसरा, एक विनिर्माण महाशक्ति बने रहने के चीन के दृढ़ संकल्प के कारण उसके सकल घरेलू उत्पाद में उपभोग का हिस्सा कम हो जाता है, और उसके बाहरी खाते में लगातार अधिशेष का होना अपरिहार्य हो जाता है। इसके कारण, चीन की मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय वित्त में भूमिका की भी स्पष्ट सीमाएं हैं। ऐसे में, भविष्य में एक बहुध्रुवीय मुद्रा व्यवस्था, न कि तीनध्रुवीय मुद्रा की व्यवस्था, की संभावना अधिक बनती हुई नजर आती है।
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं)