लोक सभा ने गुरुवार को कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया, जिसमें भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन का भी प्रस्ताव है। इससे केंद्र सरकार को यह तय करने का अधिकार मिलेगा कि इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के कौन से माध्यम निःशुल्क रहेंगे और किन पर शुल्क लागू हो सकते हैं। हालांकि विधेयक में किसी शुल्क, दर या समयसीमा का उल्लेख नहीं है, फिर भी यह शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) व्यवस्था पर पुनर्विचार करने के लिए कानूनी लचीलापन प्रदान करता है और संभावित रूप से कुछ एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) लेनदेन पर एमडीआर लागू करने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
इस प्रस्ताव ने इस बहस को फिर से हवा दे दी है कि क्या भारत की डिजिटल भुगतान अवसंरचना, जो विश्व में सर्वश्रेष्ठ में से एक है, शून्य शुल्क मॉडल के तहत अनिश्चित काल तक संचालित हो सकती है। डिजिटल अपनाने को प्रोत्साहित करने के लिए यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड जनवरी 2020 से ही एमडीआर से मुक्त हैं। यूपीआई वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 66 करोड़ लेनदेन प्रोसेस करता है, जिससे रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े खुदरा विक्रेताओं तक सभी के लिए निर्बाध भुगतान संभव हो पाता है, और यह भारत के डिजिटल भुगतान की रीढ़ बन गया है।
डिजिटल लेनदेन उपयोगकर्ताओं और व्यापारियों के लिए निःशुल्क हैं, लेकिन इनका संचालन निःशुल्क नहीं है। बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता, भुगतान एग्रीगेटर और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) बुनियादी ढांचे के रखरखाव, उन्नयन और सुरक्षा का खर्च वहन करते रहते हैं।
इसलिए इसके टिकाऊपन का मुद्दा अनदेखा करना मुश्किल है। इस वर्ष की शुरुआत में प्रस्तुत वित्त संबंधी स्थायी समिति की 32वीं रिपोर्ट में बताया गया कि सरकार की प्रोत्साहन योजना उद्योग की वास्तविक लागत का केवल 11 फीसदी और सामान्य एमडीआर व्यवस्था से उत्पन्न होने वाले राजस्व का 14 फीसदी ही वहन कर पाती है।
केंद्रीय बजट में इस वर्ष कम मूल्य वाले यूपीआई और रुपे लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए लगभग 2,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, लेकिन उद्योग का अनुमान है कि भुगतान प्रणाली के संचालन और विस्तार के लिए इससे कहीं अधिक की आवश्यकता है। यूपीआई से उपयोगकर्ताओं की संख्या में वृद्धि होने की संभावना है, इसलिए सरकारी सब्सिडी पर निरंतर निर्भरता दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे के निवेश को सीमित कर सकती है।
इसी कारण उद्योग निकायों और विश्लेषकों ने बड़े व्यापारियों और उच्च मूल्य वाले लेनदेन तक सीमित, एक सुसंगत एमडीआर की वकालत की है। विश्लेषकों के अनुमानों से पता चलता है कि 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर 15-30 आधार अंकों (बीपीएस) की एमडीआर वित्त वर्ष 2028 तक सालाना लगभग 5,000 करोड़ से 10,000 करोड़ रुपये दिला सकती है।
गौरतलब है कि 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन कुल लेनदेन संख्या का केवल 4-5 फीसदी हैं, लेकिन लेनदेन मूल्य का लगभग 70 फीसदी हैं। इससे पता चलता है कि लक्षित एमडीआर अधिकांश उपयोगकर्ताओं को प्रभावित किए बिना वित्तीय स्थिरता में सुधार कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव से भी पता चलता है कि शून्य एमडीआर ही डिजिटल भुगतान की सफलता का एकमात्र मार्ग नहीं है।
उदाहरण के लिए, ब्राजील की पिक्स और चीन की रियल-टाइम भुगतान प्रणालियां 30-40 बीपीएस के कारोबारी शुल्क पर संचालित होती हैं, जिससे भुगतान प्रदाताओं को डिजिटल भुगतान को जारी रखते हुए अपनी लागत वसूल करने में मदद मिलती है।
इसके अलावा, यह ध्यान देने योग्य है कि लगभग 90 फीसदी यूपीआई लेनदेन केवल दो थर्ड पार्टी ऐप के माध्यम से होते हैं, जिससे लगभग एकाधिकार की स्थिति बन जाती है। राजस्व के मामले में एक स्थायी व्यावसायिक वातावरण प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा और अधिक ऑपरेटरों को आकर्षित करेगा। व्यापक नीतिगत स्तर पर, यह महत्त्वपूर्ण होगा कि भविष्य का एमडीआर ढांचा सरल बना रहे।
नीतिगत प्राथमिकता भारत की डिजिटल भुगतान अवसंरचना में निरंतर निवेश सुनिश्चित करना होनी चाहिए, जिससे लेनदेन लागत कम रखने में मदद मिलेगी और कम मूल्य वाले लेनदेन के साथ भेदभाव नहीं होगा।