भारत में आज भी ज्यादातर माता-पिता रिटायरमेंट के बाद अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए बच्चों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन बदलते समय, महंगाई और आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह व्यवस्था अब पहले जैसी आसान नहीं रही। परिवार छोटे हो रहे हैं और खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में बुढ़ापे में बच्चों के सहारे रहने का तरीका लंबे समय तक टिकाऊ नहीं माना जा रहा है। इसलिए एक्सपर्ट्स का कहना है कि आज के इस बदलते दौर में युवा नौकरी शुरू करते ही, यानी पहली सैलरी से ही अपने रिटायरमेंट के लिए बचत और प्लानिंग शुरू कर दें।
‘इंडियाज फ्यूचर्स इन्वेस्टर्स’ की फाउंडर महक तोमर का कहना है कि पहले भारत में संयुक्त परिवार हुआ करते थे। परिवार बड़ा होता था, पेंशन की सुविधा होती थी और घर के सभी संसाधन मिल-जुलकर इस्तेमाल किए जाते थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं।
तोमर बताती हैं कि आज न्यूक्लियर फैमिली का चलन बढ़ रहा है। युवा नौकरी के लिए दूसरे शहरों में जाकर बस रहे हैं। साथ ही उन पर होम लोन और दूसरी EMI का बोझ है, जबकि बच्चों की पढ़ाई और परवरिश का खर्च भी उठाना पड़ता है। ऐसे में एक कमाने वाले व्यक्ति के लिए एक साथ दो अलग-अलग परिवारों का पूरा खर्च उठाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
डिजिट लाइफ इंश्योरेंस के वाइस प्रेसिडेंट (प्रोडक्ट्स) अशोक मनवानी कहते हैं कि आदर्श तौर पर इंसान को कमाई शुरू करते ही अपने बुढ़ापे की तैयारी भी शुरू कर देनी चाहिए। अगर 20 से 30 साल की उम्र में निवेश शुरू कर दिया जाए, तो कंपाउंडिंग यानी ब्याज पर मिलने वाले ब्याज का बड़ा फायदा मिलता है। इससे छोटी-छोटी रकम का निवेश भी लंबे समय में एक बड़ा फंड बना सकता है।
हालांकि, असल जिंदगी में ऐसा करना हमेशा आसान नहीं होता। कई लोग सालों तक होम लोन चुकाने, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने या किसी पारिवारिक परेशानी से निपटने में लगे रहते हैं। ऐसे में 40 या 50 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते रिटायरमेंट के लिए उनके पास पर्याप्त बचत नहीं हो पाती।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर 40 या 50 की उम्र तक पहुंचने के बाद भी रिटायरमेंट के लिए पर्याप्त फंड नहीं बना है, तो घबराने या खुद को नाकाम मानने की जरूरत नहीं है। इस समय सबसे जरूरी है कि अपनी पूरी आर्थिक स्थिति का ईमानदारी से आकलन किया जाए। इसके बाद गैर-जरूरी खर्चों में तुरंत कटौती करनी चाहिए और क्रेडिट कार्ड या ज्यादा ब्याज वाले नए कर्ज लेने से हर हाल में बचना चाहिए।
40 की उम्र पार कर चुके लोगों को अब अपनी बचत बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान देना होगा। साथ ही, पुराने और महंगे कर्जों को जितनी जल्दी हो सके खत्म करना चाहिए और ऐसे विकल्पों में पैसा लगाना चाहिए, जहां सुरक्षित और नियमित आय मिल सके।
ऐसे लोगों के लिए बाजार में मौजूद एन्युटी प्रोडक्ट्स और पेंशन प्लान मददगार हो सकते हैं। कुछ एन्युटी प्लान पूरी जिंदगी 100 प्रतिशत गारंटीड आय देने का भरोसा देते हैं। वहीं, कुछ दूसरे विकल्प गारंटीड आय के साथ शेयर बाजार के निफ्टी-50 जैसे सूचकांकों से जुड़े होते हैं, जिससे ज्यादा रिटर्न पाने का मौका मिल सकता है।
अपनी जरूरत के हिसाब से किस्त और पेमेंट का विकल्प चुनकर उन लोगों की रिटायरमेंट प्लानिंग को भी काफी हद तक पटरी पर लाया जा सकता है, जिन्होंने इसकी शुरुआत देर से की है।
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तोमर के मुताबिक, जिन परिवारों में सिर्फ एक ही सदस्य कमाता है, वहां आर्थिक सुरक्षा का महत्व और बढ़ जाता है। अगर उस कमाने वाले व्यक्ति के साथ कोई अनहोनी हो जाए या वह गंभीर बीमारी या दुर्घटना का शिकार हो जाए, तो पूरे परिवार के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। आर्थिक सुरक्षा का मतलब सिर्फ पैसा कमाना नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में भी परिवार का आत्मसम्मान और आर्थिक आजादी बनाए रखना है।
इसके लिए सबसे पहला और जरूरी कदम एक मजबूत टर्म इंश्योरेंस लेना है। टर्म प्लान का कवर इतना होना चाहिए कि उससे घर के बकाया लोन चुकाए जा सकें, महंगाई को ध्यान में रखते हुए रोजमर्रा के खर्च पूरे होते रहें और बच्चों की उच्च शिक्षा का खर्च भी आसानी से उठाया जा सके।
टर्म इंश्योरेंस को ‘मैरिड विमेन प्रॉपर्टी एक्ट’ यानी MWPA के तहत लेना भी समझदारी भरा कदम माना जाता है। इस एक्ट के तहत लिया गया इंश्योरेंस क्लेम सिर्फ पत्नी और बच्चों का होता है। इसे कोई देनदार, बैंक या कारोबारी विवाद में फंसा व्यक्ति जब्त नहीं करवा सकता।
टर्म प्लान के अलावा, कंपनी से मिलने वाले कवर पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपना व्यक्तिगत हेल्थ इंश्योरेंस लेना भी जरूरी है। इसके साथ गंभीर बीमारी (क्रिटिकल इलनेस) और विकलांगता का कवर भी होना चाहिए।
पति-पत्नी दोनों का नाम सभी बैंक खातों और संपत्तियों में नॉमिनी के तौर पर दर्ज होना चाहिए। साथ ही, एक वसीयत (विल) भी बनाकर रखनी चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर कानूनी अड़चनों के बिना संपत्ति आसानी से ट्रांसफर हो सके।
सबसे जरूरी बात यह है कि घर के पैसे, बैंक खाते और निवेश से जुड़ी पूरी जानकारी दोनों जीवनसाथियों को होनी चाहिए। इससे मुश्किल समय आने पर किसी एक व्यक्ति को पैसों से जुड़ी जरूरी जानकारी के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
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मनवानी कहते हैं कि अक्सर लोग आज के खर्चों को देखकर अंदाजा लगा लेते हैं कि रिटायरमेंट के लिए उन्हें कितने पैसे चाहिए। लेकिन यह सबसे बड़ी गलती हो सकती है। रिटायरमेंट फंड का हिसाब आज के खर्चों के हिसाब से नहीं, बल्कि 20 या 30 साल बाद होने वाले खर्चों को ध्यान में रखकर लगाना चाहिए। भारत में रोजमर्रा के सामान, खाने-पीने की चीजों और ईंधन की कीमतें करीब 7 से 8 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही हैं।
आसान भाषा में समझें तो अगर आज आपके घर का खर्च 50,000 रुपये महीना है, तो 20 साल बाद उसी तरह की जिंदगी जीने के लिए आपको कम से कम 2,00,000 रुपये महीने की जरूरत पड़ सकती है।
मनवानी के मुताबिक, इसके साथ ही, बेहतर इलाज और मेडिकल सुविधाओं की वजह से लोगों की औसत उम्र भी बढ़कर 75 से 80 साल या उससे ज्यादा हो रही है। यानी नौकरी या काम छोड़ने के बाद भी 20 से 30 साल तक खर्च चलाने की जरूरत पड़ सकती है।
दूसरी तरफ, अस्पताल और इलाज का खर्च यानी मेडिकल इंफ्लेशन 12 से 14 प्रतिशत की तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। ऐसे में कोई गंभीर बीमारी कई सालों की जमा-पूंजी को एक झटके में खत्म कर सकती है।
तोमर कहती हैं कि रिटायरमेंट के लिए कितने पैसे चाहिए, इसका सही अंदाजा लगाने के लिए सबसे पहले यह तय करना जरूरी है कि आप काम छोड़ने के बाद किस तरह की जिंदगी जीना चाहते हैं। एक सुरक्षित रिटायरमेंट कॉर्पस के लिए आसान नियम यह है कि आपके महंगाई के हिसाब से बढ़े हुए सालाना खर्च का 25 गुना पैसा आपके पास होना चाहिए।
इसके अलावा, मेडिकल इमरजेंसी के लिए अलग से एक फंड रखना चाहिए, जिसे बाकी पैसों से अलग रखा जाए। रिटायरमेंट से पहले चुकाए जाने वाले सभी कर्ज और बकाया रकम को जोड़कर ही अपना अंतिम रिटायरमेंट लक्ष्य तय करना चाहिए।
दोनों एक्सपर्ट्स का मानना है कि बुढ़ापे में बच्चों पर निर्भर होने की स्थिति अचानक नहीं आती। अक्सर यह कई सालों तक सही आर्थिक फैसलों को टालते रहने का नतीजा होती है। घर खरीदने, बच्चों की पढ़ाई या कारोबार की जरूरतों के बीच रिटायरमेंट की प्लानिंग हमेशा पीछे छूट जाती है। इसलिए समय रहते सिर्फ संपत्ति बनाने पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि उस संपत्ति से जीवनभर नियमित आय कैसे मिलती रहे। यही तरीका वरिष्ठ नागरिकों को बिना किसी पर आर्थिक रूप से निर्भर हुए सम्मान के साथ जिंदगी जीने में मदद कर सकता है।