इस वर्ष मार्च में हरीश राणा बनाम भारत सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उस समय उनके लिए जारी जीवन रक्षक उपचार को बंद करने की इजाजत दे दी थी क्योंकि उनके जारी रहने से कोई चिकित्सकीय लाभ नहीं हो रहा था। इस निर्णय ने उन्नत चिकित्सकीय निर्देशन यानी लिविंग विल, को भारतीय कानून में स्थान दिया
अब कोई भी स्वस्थ मानसिक स्थिति वाला व्यक्ति एक लिविंग विल बना सकता है जिसमें वह पहले से यह तय कर सके कि यदि भविष्य में उसकी निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो जाए तो उसके जीवन के अंतिम चरण का प्रबंधन कैसे किया जाए। महत्वपूर्ण निर्णय संकट आने से पहले ही लेना सबसे अच्छा होता है। यही समझ कंपनियों पर भी लागू होती है। उन्हें वित्तीय संकट की तैयारी तब करनी चाहिए जब वे स्वस्थ स्थिति में हों।
वित्तीय नियमन पहले ही रिजॉल्वबिलिटी यानी समाधान योग्यता के विचार को अपना चुका है। समाधान योग्यता एक नियामकीय और वित्तीय अवधारणा है, जो यह आकलन करती है कि कोई बैंक या बड़ी वित्तीय संस्था बिना प्रणालीगत आर्थिक संकट पैदा किए और बिना करदाताओं द्वारा उबारे जाने पर निर्भर हुए असफल होने के लिए कितनी तैयार है। वर्ष 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट यह दिखा चुका है कि अव्यवस्थापूर्ण ढंग से विफल होने और करदाताओं के धन से किसी संस्थान को उबारने की कोशिश करने में कितनी अधिक लागत चुकानी होती है।
इसकी प्रतिक्रिया में नियामकों ने प्रणालीगत रूप से महत्त्वपूर्ण बैंकों के लिए यह आवश्यक किया कि वे अपनी रिकवरी और निस्तारण योजनाएं तभी तैयार कर लें जब वे सक्षम बनी रहती हों। वित्तीय स्थिरता बोर्ड की मुख्य विशेषताओं ने संकट-पूर्व तैयारी को संस्थान की अपनी जिम्मेदारी के रूप में संस्थागत रूप दिया।
एक दशक पुरानी ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) मुख्य रूप से तब हस्तक्षेप करती है जब संकट सामने आ चुका होता है। फिर भी इसका विकास धीरे-धीरे बेहतरी की ओर हुआ है। 2021 में शुरू की गई पूर्व निर्धारित दिवालियापन प्रक्रिया छोटे उद्यमों से यह अपेक्षा करती है कि वे आवेदन करने से पहले एक आधारभूत समाधान योजना तैयार करें। हालिया संशोधनों ने लेनदारों को सक्षम बनाया है कि वे समाधान प्रक्रिया को पहले और अदालत से बाहर भी शुरू कर सकें। इसकी दिशा एकदम स्पष्ट है। आईबीसी अब प्रतिक्रिया से तैयारी की ओर बढ़ रहा है। अगला स्वाभाविक कदम यह है कि स्वस्थ कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे संकट आने से पहले ही समाधान योग्य बनी रहें।
वास्तविक क्षेत्र की कंपनी कोई प्रणालीगत रूप से महत्त्वपूर्ण बैंक नहीं होती और उसका असफल होना शायद ही कभी वित्तीय स्थिरता को खतरे में डालता है। इसलिए अनिवार्य समाधान योग्यता का तर्क बैंकिंग से पूरी तरह लागू नहीं होता। फिर भी कंपनियां कमजोर नहीं हैं। उनका अस्तित्व वाणिज्यिक, वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों के नाज़ुक संतुलन पर निर्भर करता है जो बिना चेतावनी के बदल सकता है।
सीमित देयता जिसे उद्यम को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया था वह लापरवाह प्रबंधन को ढाल दे सकती है जबकि नियंत्रक यदि अल्पकालिक लाभ हासिल करने पर ही ध्यान दें तो वे कंपनी के भविष्य को खोखला कर सकते हैं। कंपनियों की घटती आयु यह याद दिलाती है कि कॉरपोरेट मृत्यु वास्तविक है।
कई कंपनियां इसलिए असफल होती हैं क्योंकि वे बचाव से परे नहीं थीं, बल्कि इसलिए कि वे उसके लिए तैयार नहीं थीं। समाधान योग्यता इस बात को अलग से रेखांकित करती है कि व्यापार विफलता आर्थिक वास्तविकता से हुई है या तैयारी की कमी से।
यही वजह है कि वास्तविक क्षेत्र की कंपनियों के लिए समाधान योग्यता को बाजार अनुशासन के जरिये विकसित होना चाहिए न कि नियामकीय आदेश से। कम से कम आरंभ में बड़ी और ऋणग्रस्त कंपनियों में जहां तैयारी से सबसे अधिक लाभ मिलता है, वहां समाधानयोग्य कंपनी स्वाभाविक रूप से अधिक मूल्यवान होती है क्योंकि संकट की हालत में उसे बचाना आसान होता है।
निवेशकों और ऋणदाताओं को कम उधारी लागत, मजबूत मूल्यांकन और ज्यादा भरोसे के जरिये उस गुणवत्ता को पहचानना चाहिए। यानी ऐसे मूल्य निर्धारण को सुगम बनाने के लिए, एक स्वतंत्र समाधान योग्यता सूचकांक कंपनी की संरचनात्मक और सूचनात्मक तैयारी का आकलन कर सकता है। नियामक एक सामान्य मूल्यांकन ढांचा विकसित करके और एक स्वैच्छिक प्रकटीकरण व्यवस्था की प्रारंभिक परियोजना चलाकर इस विकास को प्रोत्साहित कर सकते हैं
मान लीजिए कोई कंपनी एक लाभदायक संयंत्र चलाती है लेकिन जिस जमीन पर वह बना है उसका मालिक उसका प्रवर्तक है। जब संकट आता है तो संभावित खरीदार हिचकिचाता है क्योंकि व्यवसाय को उसके सबसे महत्त्वपूर्ण संपत्ति के स्वामित्व को सुलझाए बिना स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। जो एक सीधा बचाव होना चाहिए था वह कानूनी पुनर्निर्माण की कवायद बन जाता है और हर बीतते सप्ताह के साथ उद्यम का मूल्य घटता जाता है।
एक समाधानयोग्य कंपनी ऐसे अवरोधों से बचती है। वह महत्त्वपूर्ण संपत्तियों को कंपनी के भीतर रखती है, अनावश्यक बोझ से बचती है, सरल स्वामित्व संरचना बनाए रखती है, अपने रिकॉर्ड अद्यतन रखती है, संबंधित-पक्ष व्यवस्थाओं का खुलासा करती है, वगैरह वगैरह। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि कल कोई बचाने वाला सामने आए तो व्यवसाय को एक निरंतर चिंता के रूप में स्थानांतरित किया जा सके न कि मुकदमेबाजी के माध्यम से पुनर्निर्मित किया जाए।
एक समाधानयोग्य कंपनी एक अच्छे प्रबंधन वाले ऊंचे भवन जैसी होती है। फायर अलार्म काम करता है, बचाव मार्ग अवरोध-मुक्त रहते हैं, और निकासी योजनाओं का लगातार उन्नयन होता रहता है। जब फायर ब्रिगेड यानी एक बाहरी संस्था आती है तो वह तुरंत बचाव शुरू कर सकती है क्योंकि भवन पहले से ही बचाव के लिए तैयार है। ब्रिगेड की सफलता केवल उसके कौशल पर ही नहीं बल्कि इस पर भी निर्भर करती है कि भवन को बचाना कितना आसान है।
आईबीसी ने बार-बार यह सिद्धांत दर्शाया है। निस्तारण पेशेवर और संभावित निस्तारण आवेदक वास्तव में फायर ब्रिग्रेड ही हैं। जितना आसान कंपनी को समझना और उसे एक निरंतर चिंता के रूप में स्थानांतरित करना होता है, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि उसका बचाव सफल हो।
समाधान योग्यता का दूसरा आयाम है एक स्थायी बचाव योजना। यानी एक कॉरपोरेट लिविंग विल जिसे संकट आते ही सक्रिय किया जा सके। इसमें एक सूचना डॉजियर और एक ऑपरेशनल प्लेबुक शामिल होती है। डॉजियर में स्वामित्व संरचना, वित्तीय जानकारी, महत्त्वपूर्ण अनुबंध, बोझ, मुकदमेबाजी और वर्तमान सूचना ज्ञापन दर्ज होता है। इनमें से अधिकांश जानकारी पहले से मौजूद होती है। नवाचार यह है कि इसे संकलित, अद्यतन और तुरंत उपयोग योग्य रखा जाए। प्लेबुक एक चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका देती है।
यानी वह मूल्य को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कार्यों की पहचान करती है, उन संपत्तियों को चिह्नित करती है जिन्हें सुरक्षा चाहिए, उन व्यवसायों को बताती है जिन्हें चालू स्वरूप में बेचा जा सकता है, उन अनुबंधों को चिह्नित करती है जिन्हें बनाए रखना जरूरी है, संभावित वित्तीय विकल्पों को सूचीबद्ध करती है, और उन परिस्थितियों को बताती है जिनमें कंपनी को स्वेच्छा से दिवालियापन कार्यवाही शुरू करनी चाहिए।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस व्यापार चक्रों को संकुचित कर रहा है और संकट के उभरने और फैलने की गति को तेज कर रहा है। कंपनियों के पास संकट को पहचानने और बचाव संगठित करने के लिए कम समय होगा। जो कंपनियां अपनी समाधान योग्यता बनाए रखती हैं वे तुरंत प्रतिक्रिया दे सकती हैं। जो केवल संकट आने के बाद तैयारी शुरू करती हैं उन्हें बचाव की खिड़की पहले ही बंद मिल सकती है। इसलिए एआई समाधान योग्यता के मूल्य को और बढ़ा देता है।
अंत में एक महत्त्वपूर्ण समानता है। जैसे मनुष्यों ने यह अधिकार पाया है कि वे अपने जीवन के अंत का सामना अपनी उन शर्तों पर करें जिन्हें उन्होंने स्वस्थ रहते तय किया था, कंपनियों को भी वैसी ही दूरदर्शिता का अधिकार मिलना चाहिए। अपनी समाधान योग्यता बनाए रखकर वे असफलता की आशंका नहीं करतीं बल्कि वे जीवित रहने की संभावना को अधिकतम करती हैं।
जब अंततः कोई बचाने वाला आता है तो कंपनी केवल विवादित संपत्तियों और अधूरे रिकॉर्ड का मौन संग्रह नहीं होती। वे अपने बारे में समझा सकती है, अपना मूल्य सुरक्षित रख सकती है और अपने बचाव का मार्गदर्शन कर सकती है। इस प्रकार एक कॉरपोरेट लिविंग विल असफलता को प्रबंधित करने से अधिक, निरंतर जीवन की संभावना को बेहतर बनाने के बारे में होगी।
(साहू दिवालियापन विधि अकादमी के विशिष्ट फेलो और पांडेय राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली में दिवालियापन एवं पुनर्गठन अध्ययन के प्रमुख हैं। ये उनके निजी विचार हैं)