भारत की औद्योगिक रणनीति में एक गंभीर खामी है। नीति निर्माताओं ने सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, ड्रोन, रोबोटिक्स और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) में संसाधनों का भरपूर निवेश किया है, लेकिन उन्होंने उन हजारों औद्योगिक उत्पादों की अनदेखी की है जिन पर हर सफल विनिर्माण अर्थव्यवस्था टिकी होती है। इनमें मशीन टूल्स, बियरिंग, पंप, वॉल्व, इलेक्ट्रिक मोटर्स, कंप्रेसर, गियर, फास्टनर्स, औद्योगिक रसायन, ट्रांसफॉर्मर, केबल और हजारों अन्य इंजीनियरिंग उत्पाद शामिल हैं। ये उन्नत विनिर्माण की नींव हैं।
भारत को अत्याधुनिक तकनीकों में निवेश जारी रखना चाहिए, लेकिन जब तक वह इन औद्योगिक बुनियादी उत्पादों में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं बन जाता, तब तक वह एक वास्तविक विनिर्माण शक्ति बनने के बजाय एक असेंबली अर्थव्यवस्था ही बना रहेगा।
विनिर्माण को तीन-स्तरों के पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखा जा सकता है। सबसे निचले स्तर पर इस्पात, एल्युमीनियम, रसायन और पेट्रोकेमिकल्स जैसे औद्योगिक कच्चे माल हैं। सबसे ऊपरी स्तर पर सेमीकंडक्टर, एआई, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, एरोस्पेस और रोबोटिक्स जैसे उभरते उद्योग हैं। इन दोनों के बीच सबसे बड़ा स्तर है-औद्योगिक आधारभूत उत्पाद जो कच्चे माल को तैयार माल से जोड़ते हैं।
ग्राहक तक पहुंचने से पहले प्रत्येक इलेक्ट्रिक वाहन को मोटर, बियरिंग, गियर, फास्टनर, वायरिंग, मोल्ड, डाई और मशीन टूल की आवश्यकता होती है। इस मध्यवर्ती स्तर को अनदेखा करने पर, संपूर्ण विनिर्माण प्रणाली आयात पर निर्भर हो जाती है।
पिछले दो दशकों में, भारत की औद्योगिक नीति का अधिकांश ध्यान उभरते उद्योगों पर केंद्रित रहा है। मेक इन इंडिया, उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएं, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन, एफएएमई यानी फेम, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं ड्रोन कार्यक्रमों जैसी पहलों के माध्यम से सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में अरबों डॉलर का निवेश किया गया है।
इस रणनीति से लाभ हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली का विस्तार हुआ है और स्टार्टअप बैटरी सिस्टम, ड्रोन, रोबोटिक्स, चिकित्सा उपकरण और सेमीकंडक्टर पैकेजिंग समाधान विकसित कर रहे हैं। फिर भी, इस विनिर्माण का अधिकांश भाग असेंबली-आधारित ही बना हुआ है।
अधिकांश नए विनिर्माण स्टार्टअप इलेक्ट्रिक वाहनों, ड्रोन, उपग्रहों और सौर उपकरणों को लक्षित करते हैं। कुछ ही उद्यमी बियरिंग, औद्योगिक वाल्व, मशीन टूल्स, कंप्रेसर, मोल्ड या बारीक इंजीनियरिंग पुर्जों का निर्माण करने वाली विश्व स्तरीय कंपनियां बनाने की आकांक्षा रखते हैं। कोई भी देश केवल उच्च-तकनीकी उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करके और उनके नीचे मौजूद औद्योगिक आधार की उपेक्षा करके विनिर्माण क्षेत्र का अग्रणी नहीं बन सकता।
चीन ने यह बात बहुत पहले ही समझ ली थी। वह सेमीकंडक्टर या इलेक्ट्रिक वाहनों से शुरुआत करके विश्व का कारखाना नहीं बना। उसने पहले हजारों औद्योगिक आधारभूत उत्पादों में महारत हासिल की, जिससे आपूर्तिकर्ताओं, उपकरण कंपनियों, घटक निर्माताओं और इंजीनियरिंग फर्मों का सघन नेटवर्क स्थापित हुआ। एक बार यह आधार तैयार हो जाने के बाद, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव, बैटरी और नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग तेजी से विकसित हुए। भारत लगभग इसके विपरीत प्रयास कर रहा है।
1980 के दशक के उत्तरार्ध में भारत और चीन ने लगभग समान विनिर्माण स्तरों से शुरुआत की थी, लेकिन 1990 के दशक के बाद उनके रास्ते अलग हो गए। चीन ने अपने विनिर्माण तंत्र को लगातार मजबूत किया, जबकि भारत की औद्योगिक रीढ़ कमजोर हो गई।
कुछ नीतिगत फैसलों ने इस परिणाम में योगदान दिया। भारत ने इस्पात, एल्युमीनियम और पेट्रोकेमिकल्स जैसे उद्योगों को टैरिफ और अन्य सहायता के माध्यम से संरक्षण दिया। इससे कुछ बड़े उत्पादकों को तो फायदा हुआ, लेकिन मशीनरी, पुर्जे और इंजीनियरिंग सामान बनाने वाले हजारों निर्माताओं के लिए इनपुट लागत बढ़ गई।
जैसे-जैसे चीन में उत्पादन सस्ता और अधिक कुशल होता गया, कई भारतीय कंपनियों को स्थानीय उत्पादन की तुलना में आयात करना अधिक लाभदायक लगने लगा। कई क्षेत्रों में, उत्पादन की जगह धीरे-धीरे व्यापार ने ले ली। चीन ने उभरते उद्योगों में आक्रामक रूप से निवेश किया, साथ ही अपने पारंपरिक विनिर्माण आधार को भी मजबूत करना जारी रखा। भारत इन दोनों मामलों में पीछे है।
राष्ट्रीय रणनीति: भारत को सेमीकंडक्टर, बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स में निवेश जारी रखना चाहिए। लेकिन साथ ही, अपने औद्योगिक आधार को मजबूत करने के लिए उसे विनिर्माण हेतु राष्ट्रीय रिवर्स इंजीनियरिंग कार्यक्रम (एनआरईपीएम) की भी आवश्यकता है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है: भारतीय कंपनियों को विश्व स्तरीय गुणवत्ता और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी लागत पर हजारों औद्योगिक उत्पादों का निर्माण करने में सक्षम बनाना।
पहला काम उन एक हजार से अधिक औद्योगिक उत्पादों की पहचान करना है जो भारत के इंजीनियरिंग आयात का अधिकांश हिस्सा हैं। इनमें बियरिंग, पंप, नट, बोल्ट, कंप्रेसर, मशीन टूल्स और फास्टनर शामिल हैं। हजारों भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम और मध्यम आकार की कंपनियां पहले से ही इनमें से कई उत्पादों का निर्माण करती हैं, लेकिन अक्सर वैश्विक मानकों से पीछे रह जाती हैं।
एनआरईपीएम को इस अंतर को पाटने, आयात को प्रतिस्थापित करने और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने में उनकी मदद करनी चाहिए।
दूसरा कार्य है तकनीकी क्षमताओं का निर्माण करना। पीएलआई योजनाओं के विपरीत, जिनमें यह मान लिया गया था कि कंपनियों के पास पहले से ही आवश्यक तकनीक मौजूद है, एनआरईपीएम को इन क्षमताओं के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद की प्रयोगशालाएं और अन्य प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थान इस कार्यक्रम के मुख्य संस्थान बनने चाहिए।
अपनी विशेषज्ञता के आधार पर, प्रत्येक संस्थान को औद्योगिक उत्पादों के एक समूह की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, विश्व के सर्वश्रेष्ठ डिज़ाइनों का अध्ययन करना चाहिए, उनकी रिवर्स इंजीनियरिंग करनी चाहिए, बेहतर प्रोटोटाइप विकसित करने चाहिए और भारतीय निर्माताओं को तकनीक हस्तांतरित करनी चाहिए।
सफलता का मापन शोध पत्रों से नहीं, बल्कि व्यावसायीकृत उत्पादों, प्रतिस्थापित आयातों और उत्पन्न निर्यातों से होना चाहिए। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने वाले संस्थानों और टीमों को तदनुसार पुरस्कृत किया जाना चाहिए।
एनआरईपीएम के लिए धनराशि सरकार के अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष (आरडीआईएफ) से प्राप्त की जा सकती है, जो अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन के अंतर्गत आता है। आरडीआईएफ की स्थापना उद्योग-नेतृत्व वाले अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास और व्यावसायीकरण को समर्थन देने के लिए की गई थी। विनिर्माण क्षेत्र के लिए प्रौद्योगिकी विकास को वित्तपोषित करने हेतु इसके दायरे का विस्तार करने से भारत को उन्नत औद्योगिक क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमताएं विकसित करने में मदद मिलेगी।
तीसरा कार्य इंजीनियरिंग उत्पादों से परे कार्यक्रम का विस्तार करना है। एक बार स्थापित हो जाने पर, एनआरईपीएम को कार्बनिक रसायन, फार्मास्यूटिकल्स, सिंथेटिक वस्त्र और अन्य औद्योगिक इनपुट को शामिल करना चाहिए, जहां भारत के पास विनिर्माण क्षमता है लेकिन आयात पर भारी निर्भरता बनी हुई है।
भारत का लक्ष्य उन्नत उत्पादों के लिए विश्व की असेंबली लाइन बनना नहीं होना चाहिए बल्कि, उसका लक्ष्य उन औद्योगिक उत्पादों के लिए विश्व की कार्यशाला बनना होना चाहिए जो इन उन्नत उत्पादों को संभव बनाते हैं। यही वह आधार है जिस पर हर विनिर्माण महाशक्ति का निर्माण हुआ है।
(लेखक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक हैं)