बाजार नियामक सेबी ने एक्सचेंज-ट्रेडेड कमोडिटी डेरिवेटिव (ईटीसीडी) में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की भागीदारी बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। इसमें उन्हें गैर-कृषि इंडेक्स डेरिवेटिव और नकदी के बिना सेटल होने वाले गैर-कृषि जिंस डेरिवेटिव में ट्रेड करने की अनुमति देना शामिल है।
मंगलवार को जारी सेबी के परामर्श पत्र के अनुसार इन प्रस्तावों का मकसद भागीदारों का आधार बढ़ाना, नकदी और बाजार की मजबूती को बेहतर करना, कीमत खोज में सुधार लाना और डेरिवेटिव और फिजिकल मार्केट के बीच तालमेल अच्छा करना है।
पहले प्रस्ताव के तहत एफपीआई को गैर-कृषि इंडेक्स डेरिवेटिव अनुबंधों में हिस्सा लेने की इजाजत होगी, चाहे इन अनुबंधों से जुड़े अंडरलाइंग कॉन्ट्रैक्ट्स नकदी में सेटल हों या नहीं। अभी, एफपीआई सिर्फ नकदी में सेटल होने वाले गैर-कृषि डेरिवेटिव अनुबंधों में हिस्सा ले सकते हैं, जिनमें इनसे संबंधित अंडरलाइंग कॉन्ट्रैक्ट्स कैश में सेटल किए जाते हैं।
सेबी ने कहा कि इंडेक्स डेरिवेटिव का निपटान हमेशा नकदी में होता है, भले ही उनकी अंडरलाइंग एसेट्स का निपटान कैश में होता हो या नहीं। इसलिए, ऐसे अनुबंधों में एफपीआई की भागीदारी की अनुमति से डिलिवरी से जुड़ी कोई समस्या नहीं होगी। कमोडिटी डेरिवेटिव एडवाइजरी कमेटी (सीडीएसी) इस प्रस्ताव से सहमति जताई है।
दूसरे प्रस्ताव में एफपीआई को घरेलू एक्सचेंजों पर उपलब्ध नकदी में सेटल न होने वाले या फिजिकली सेटल होने वाले गैर-कृषि जिंस डेरिवेटिव में हिस्सा लेने की इजाजत देने की बात कही गई है। इनमें कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, सोना, चांदी और आधार धातु आदि जिंसों से जुड़े अनुबंध शामिल हैं, जो वैश्विक बेंचमार्कों से गहरे से जुड़े होते हैं।
सेबी ने कहा कि इन सेगमेंट में एफपीआई को अनुमति देने से प्रतिभागियों का आधार बढ़ेगा, लिक्विडिटी बेहतर होगी, डेरिवेटिव और फिजिकल मार्केट के बीच तालमेल मजबूत होगा और भारत के कमोडिटी डेरिवेटिव बाजार को अंतरराष्ट्रीय जिंस बाजार से जोड़ने में आसानी होगी।
लेकिन, टेंडर अवधि शुरू होने से पहले एफपीआई को अपने निवेश को बेचना या रोल-ओवर करना होगा, जो एक्सपायरी से तीन दिन पहले (टी-3) शुरू होती है। अगर वे ऐसा खुद करने में नाकाम रहते हैं तो उनकी ओपन पोजीशन अपने आप किसी भी ट्रेडिंग मेंबर (टीएम) या ट्रेडिंग-कम-क्लियरिंग मेंबर (टीसीएम) के प्रोपराइटरी खातों में हस्तांतरित कर दी जाएंगी।
यह सुरक्षा उपाय इसलिए सुझाया गया है क्योंकि भारत में एफपीआई को देश में कोई स्थायी ठिकाना न होने के कारण डिलिवरी लेने या देने की इजाजत नहीं है। नियामक ने कहा कि भले ही एफपीआई अपनी तरफ़ से सामान की डिलिवरी के लिए किसी ट्रेडिंग मेंबर या ब्रोकर को नियुक्त करें, फिर भी उन्हें भारत में कमोडिटी खरीदने या बेचने के लिए अनिवार्य रूप से जीएसटी पंजीकरण कराना पड़ सकता है।
ऐसे में निवेश की बिक्री या रोल ओवर का नियम प्रस्तावित किया गया है। साथ ही सेबी ने माना है कि सिर्फ निवेश की बिक्री के लिए सुरक्षा उपाय काफी नहीं हो सकते क्योंकि यह पूरी तरह से एफपीआई द्वारा समय पर उठाए गए कदमों पर निर्भर करता है।