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लेखक : एम एस साहू

आज का अखबार, लेख

मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों के नियमों पर भी हो संसदीय निगरानी

कल्पना कीजिए कि एक सामान्य रूप से प्रयोग में लाई जाने वाली एल्गोरिद्म आधारित कारोबारी रणनीति को अचानक चालबाजी घोषित कर दिया जाए। इसके अत्यंत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मसलन दंड, निलंबन और यहां तक कि आपराधिक कार्रवाई भी। यदि संसद या भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) इस प्रकार का वर्गीकरण करता तो […]

आज का अखबार, लेख

बचाव, पुनरुद्धार और सुधार: IBC के पहले दशक ने भारत की क्रेडिट संस्कृति को बदला

भारत जब बाजार अर्थव्यवस्था बना कारोबारी चक्र की गतिविधियां – विस्तार, मुश्किल और विफलता भी स्वाभाविक रूप से आ गईं। वृद्धि के दौर में बनी कई कंपनियां होड़ गहरी होने पर कदमताल नहीं कर पाईं। वे होड़ में पिछड़ गईं, आर्थिक रूप से काम की नहीं रहीं मगर निकासी की प्रभावी व्यवस्था नहीं होने के […]

आज का अखबार, लेख

मार्केट में चूक पर सिर्फ निजी कंपनियों पर ही क्यों गिरे गाज, सरकारी एजेंसियों की लापरवाही पर भी तय हो कड़ा जुर्माना

जानकारी के मुताबिक देश का अग्रणी स्टॉक एक्सचेंज नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) कानूनों के मुताबिक कामकाज करने में नाकाम रहने के पुराने आरोप भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के साथ निपटाने जा रहा है। इसके लिए एनएसई 1,800 करोड़ रुपये चुकाएगा।  एक तरह से यह विनियमित संस्था और उसके वैधानिक नियामक के बीच निपटारा […]

आज का अखबार, लेख

नया सिक्योरिटीज कोड अपने वैधानिक उद्देश्य से भटका, निवेशक असुरक्षित हुए

भारत के प्रतिभूति बाजार अब खुदरा युग में हैं। पहली बार निवेश करने वाले लाखों निवेशक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, म्युचुअल फंड्स और सेवानिवृत्ति संबंधी योजनाओं के जरिये निवेश करते हैं। उनके लिए नियामक ढांचे पर विश्वास कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है बल्कि यह वह शर्त है जो भागीदारी को संभव बनाती है। इसलिए, प्रतिभूति बाजार संहिता […]

आज का अखबार, लेख

IBC: संकट में फंसी कंपनियों का ‘समाधान’ या कर्ज वसूली का नया ‘हथियार’?

ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी), 2016 का उद्देश्य उस तरीके में निर्णायक बदलाव करना था जिसमें कॉरपोरेट संकट के समय लेनदारों की ज्यादा चलती थी और नियमों को सख्ती से लागू करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था। इसे एक ऐसे ढांचे के रूप में तैयार किया गया था जिसमें उन व्यवसायों को बचाया […]

आज का अखबार, लेख

रेगुलेटरी सिस्टम में खामियां: भारतीय नियामक ढांचे और ट्रिब्यूनलों को बड़े सुधार की दरकार

सर्वोच्च न्यायालय ने 19 नवंबर को न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ अहम प्रावधानों को निरस्त कर दिया। यह लंबे समय से चले आ रहे चक्र का ताजा हिस्सा है। तीन दशकों से न्यायालय ने बार-बार कहा है कि कुछ खास संस्थागत व्यवस्थाएं संवैधानिक आवश्यकताओं का उल्लंघन करती हैं। विधायिका ने अक्सर प्रावधानों में मामूली […]

आज का अखबार, लेख

10 साल से अटकी दिवाला सुरक्षा प्रक्रिया, छोटे कर्जदारों के घर जोखिम में

एक ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचिए जिसका एक छोटा सा घर है और जो एक छोटा कारोबार शुरू करने के लिए मामूली कर्ज लेता है। शायद किसी गलती की वजह से नहीं ब​ल्कि विपरीत आर्थिक हालात के कारण वह अपने ऋण की किस्त चुकाने में चूक जाता है। इस हालत में क्या उसका घर […]

आज का अखबार, लेख

नियामकीय व्यवस्था में खामियां: भारत को शक्तियों का पृथक्करण बहाल करना होगा

देश में शक्तियों के बंटवारे की बहस पारंपरिक रूप से संवैधानिक ढांचे के भीतर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर केंद्रित रहती है। बहरहाल आज कहीं अधिक बड़ी चुनौती इस शास्त्रीय त्रयी से इतर नियामकीय संस्थाओं में निहित है। नियामक अपने-अपने क्षेत्र में छोटे स्वयंभू राज्यों की तरह काम करते हैं और इस दौरान वे एक […]

आज का अखबार, लेख

वास्तविक जलवायु कार्रवाई नीतिगत निर्णयों से संभव, वित्तीय बाजारों से नहीं

सरकारें, वित्तीय बाजार नियामक और सामाजिक नागरिक संगठन सभी पृथ्वी के पर्यावरण को बेहतर बनाने में वित्तीय बाजारों की भूमिका को अहम मान रहे हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि निवेशक अपने निजी लाभ पर सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दें और पूंजी प्रवाह को टिकाऊ लक्ष्यों के साथ जोड़ा जा सके। वित्तीय […]

आज का अखबार, लेख

IBC की रफ्तार थमी: अस्तित्व मूल सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर

भारतीय संसद ने 2016 में ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) का गठन किया ताकि देश को वित्तीय दिक्कत और फंसा कर्ज संभालने की चुनौतियों से उबारा जा सके। शुरुआती सालों में आईबीसी को संस्थागत तालमेल का फायदा मिला। विधायिका ने पहले पांच साल में संहिता में छह संशोधन किए ताकि क्रियान्वयन की चुनौतियां […]

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