कॉरपोरेट लिविंग विल है जरूरी, संकट से पहले तैयारी ही बचा सकती है कंपनियों का भविष्य
इस वर्ष मार्च में हरीश राणा बनाम भारत सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उस समय उनके लिए जारी जीवन रक्षक उपचार को बंद करने की इजाजत दे दी थी क्योंकि उनके जारी रहने से कोई चिकित्सकीय लाभ नहीं हो रहा था। इस निर्णय ने उन्नत चिकित्सकीय निर्देशन यानी लिविंग विल, को भारतीय कानून […]
IBC में हितों का टकराव: खुद फैसला लेने वाले वित्तीय ऋणदाताओं को फायदा, परिचालन ऋणदाता बेआवाज
दिवालिया कानून सुधार समिति यानी बीएलआरसी, विधायिका और न्यायपालिका ने लगातार एक ही प्रस्थापना को मजबूत किया है और वह यह कि भारतीय दिवाला और ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), 2016 के तहत कॉरपोरेट दिवालिया निस्तारण प्रक्रिया (सीआईआरपी) वित्तीय ऋणदाताओं से संबंधित है। उनकी व्यावसायिक समझ सर्वोपरि है और उस पर शायद ही कोई सवाल उठाया […]
मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों के नियमों पर भी हो संसदीय निगरानी
कल्पना कीजिए कि एक सामान्य रूप से प्रयोग में लाई जाने वाली एल्गोरिद्म आधारित कारोबारी रणनीति को अचानक चालबाजी घोषित कर दिया जाए। इसके अत्यंत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मसलन दंड, निलंबन और यहां तक कि आपराधिक कार्रवाई भी। यदि संसद या भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) इस प्रकार का वर्गीकरण करता तो […]
बचाव, पुनरुद्धार और सुधार: IBC के पहले दशक ने भारत की क्रेडिट संस्कृति को बदला
भारत जब बाजार अर्थव्यवस्था बना कारोबारी चक्र की गतिविधियां – विस्तार, मुश्किल और विफलता भी स्वाभाविक रूप से आ गईं। वृद्धि के दौर में बनी कई कंपनियां होड़ गहरी होने पर कदमताल नहीं कर पाईं। वे होड़ में पिछड़ गईं, आर्थिक रूप से काम की नहीं रहीं मगर निकासी की प्रभावी व्यवस्था नहीं होने के […]
मार्केट में चूक पर सिर्फ निजी कंपनियों पर ही क्यों गिरे गाज, सरकारी एजेंसियों की लापरवाही पर भी तय हो कड़ा जुर्माना
जानकारी के मुताबिक देश का अग्रणी स्टॉक एक्सचेंज नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) कानूनों के मुताबिक कामकाज करने में नाकाम रहने के पुराने आरोप भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के साथ निपटाने जा रहा है। इसके लिए एनएसई 1,800 करोड़ रुपये चुकाएगा। एक तरह से यह विनियमित संस्था और उसके वैधानिक नियामक के बीच निपटारा […]
नया सिक्योरिटीज कोड अपने वैधानिक उद्देश्य से भटका, निवेशक असुरक्षित हुए
भारत के प्रतिभूति बाजार अब खुदरा युग में हैं। पहली बार निवेश करने वाले लाखों निवेशक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, म्युचुअल फंड्स और सेवानिवृत्ति संबंधी योजनाओं के जरिये निवेश करते हैं। उनके लिए नियामक ढांचे पर विश्वास कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है बल्कि यह वह शर्त है जो भागीदारी को संभव बनाती है। इसलिए, प्रतिभूति बाजार संहिता […]
IBC: संकट में फंसी कंपनियों का ‘समाधान’ या कर्ज वसूली का नया ‘हथियार’?
ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी), 2016 का उद्देश्य उस तरीके में निर्णायक बदलाव करना था जिसमें कॉरपोरेट संकट के समय लेनदारों की ज्यादा चलती थी और नियमों को सख्ती से लागू करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था। इसे एक ऐसे ढांचे के रूप में तैयार किया गया था जिसमें उन व्यवसायों को बचाया […]
रेगुलेटरी सिस्टम में खामियां: भारतीय नियामक ढांचे और ट्रिब्यूनलों को बड़े सुधार की दरकार
सर्वोच्च न्यायालय ने 19 नवंबर को न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ अहम प्रावधानों को निरस्त कर दिया। यह लंबे समय से चले आ रहे चक्र का ताजा हिस्सा है। तीन दशकों से न्यायालय ने बार-बार कहा है कि कुछ खास संस्थागत व्यवस्थाएं संवैधानिक आवश्यकताओं का उल्लंघन करती हैं। विधायिका ने अक्सर प्रावधानों में मामूली […]
10 साल से अटकी दिवाला सुरक्षा प्रक्रिया, छोटे कर्जदारों के घर जोखिम में
एक ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचिए जिसका एक छोटा सा घर है और जो एक छोटा कारोबार शुरू करने के लिए मामूली कर्ज लेता है। शायद किसी गलती की वजह से नहीं बल्कि विपरीत आर्थिक हालात के कारण वह अपने ऋण की किस्त चुकाने में चूक जाता है। इस हालत में क्या उसका घर […]
नियामकीय व्यवस्था में खामियां: भारत को शक्तियों का पृथक्करण बहाल करना होगा
देश में शक्तियों के बंटवारे की बहस पारंपरिक रूप से संवैधानिक ढांचे के भीतर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर केंद्रित रहती है। बहरहाल आज कहीं अधिक बड़ी चुनौती इस शास्त्रीय त्रयी से इतर नियामकीय संस्थाओं में निहित है। नियामक अपने-अपने क्षेत्र में छोटे स्वयंभू राज्यों की तरह काम करते हैं और इस दौरान वे एक […]








