facebookmetapixel
Advertisement
क्या ट्रंप की चीन यात्रा बेअसर? दो दिवसीय दौरे में व्यापार और ईरान युद्ध पर नहीं मिली कोई ठोस सफलताकुछ बेरोजगार युवा ‘कॉकरोच’ की तरह, जो व्यवस्था पर हमला करते हैं: CJI सूर्यकांतRBI की बड़ी राहत: छोटी NBFC को पंजीकरण से छूट, इक्विटी बाजारों में बढ़ेगा निवेशरैपिडो ने जुटाए 24 करोड़ डॉलर; 3 अरब डॉलर के मूल्यांकन के साथ उबर और ओला को देगी कड़ी टक्करअमेरिका में तेल-गैस इंजन मॉडल बरकरार रखेगी JLR, EV की घटती मांग के बीच रणनीति में बदलावटाटा स्टील का मुनाफा 125% उछला; ITC होटल्स, फुजियामा पावर और पटेल इंजीनियरिंग को भी बंपर लाभसायरन का परीक्षण तो हो गया, लेकिन देश में आपातकालीन संचार का बुनियादी ढांचा अब भी अधूराईरान को लेकर गलत साबित हुए तेल बाजार, होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट मेंEditorial: जजों की कमी और बदहाल इंफ्रास्ट्रक्चर से जूझ रही न्यायिक प्रणाली, सुधार की जरूरतशेयर बाजार में मची हाहाकार! सेंसेक्स और निफ्टी भारी गिरावट के साथ लाल निशान पर हुए बंद

आरबीआई के हस्तक्षेप के बावजूद रुपये में नहीं थम रही गिरावट, ये कारण लगातार डाल रहे दबाव

Advertisement

डीलरों ने बताया कि डॉलर की चारों ओर से मांग बनी हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 115 डॉलर प्रति बैरल हो गई हैं।

Last Updated- March 31, 2026 | 9:56 AM IST
Dollar vs Rupee

Dollar vs Rupee: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। पश्चिम में जारी तनाव की वजह से क्रूड तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी है और इसका सीधा असर रुपये की चाल पर पड़ा है। दरअसल महंगा तेल का मतलब है कि सरकार को ज्यादा डॉलर खरीदने पड़ेंगे।

इससे पहले सोमवार को रुपये ने उम्मीदों के उलट प्रदर्शन किया। डॉलर के मुकाबले रूपया शुक्रवार के 94.81 के बंद स्तर से गिरकर 93.58 पर कमजोर खुला और प्री-मार्केट ट्रेडिंग में 93.10 तक भी पहुंच गया था। हालांकि, सुबह 9 बजे के बाद डॉलर ने फिर से मजबूती हासिल की जबकि रुपया कमजोर हो गया।

इस बीच, विश्लेषकों का मानना ​​है कि बाजार तेल की कीमतों में अचानक उछाल के जोखिम को कम आंक रहे हैं। उनका अनुमान है कि अगर पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध कुछ और महीनों तक खिंचा और इससे खाड़ी क्षेत्र में तेल एवं गैस के प्रमुख बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा तो कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर के स्तर तक पहुंच सकती हैं।

कच्चे तेल की कीमतें 3 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 116 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं। पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से इनमें लगभग 53 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। जानकारों का कहना है कि कीमतों में हालिया तेजी पिछली बड़े भू-राजनीतिक संकटों यानी इराक युद्ध और यूक्रेन संघर्ष के दौरान दर्ज बढ़ोतरी से कहीं ज्यादा रही है। उन्होंने कहा कि साथ ही साथ राजनीतिक संकेत भी अनिश्चितता को बढ़ावा दे रहे हैं।

रुपये में क्यों नहीं थम रही गिरावट?

दरअसल देसी कंपनियों ने ऑनशोर और ऑफशोर बाजारों के बीच आर्बिट्राज (कीमतों के अंतर से फायदा उठाने) का लाभ उठाया जबकि आयातकों की डॉलर की मांग के कारण रुपये पर दबाव बना रहा।

रिपोर्ट्स के अनुसार, तेल कंपनियों की ओर से रूसी तेल खरीदने के लिए डॉलर की भारी मांग थी। तेल कंपनियां अमेरिका के 30 दिन की छूट का फायदा उठाना चाह रही है। इसके तहत भारतीय रिफाइनर समुद्र में फंसे रूसी कच्चे तेल को खरीद सकते हैं। जानकारों का अनुमान है कि यह छूट 5 अप्रैल को समाप्त हो रही है। इसलिए खरीदारी की जल्दी मची हुई है।

डीलरों ने बताया कि डॉलर की चारों ओर से मांग बनी हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 115 डॉलर प्रति बैरल हो गई हैं और विदेशी फंड प्रतिदिन लगभग 50 करोड़ डॉलर की निकासी कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में रुपये के 93.58 के स्तर पर दिखना कंपनियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं था और उन्होंने बड़ी मात्रा में खरीदारी की।

Advertisement
First Published - March 31, 2026 | 9:21 AM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement