क्या फेल हो गई पाकिस्तान को अलग-थलग करने की नीति? कूटनीति के मोर्चे पर भारत को नए सिरे से सोचना होगा
पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान के प्रति भारत के आधिकारिक दृष्टिकोण के तीन भाग हैं। पहला, भारत ने उसे राजनयिक तौर पर अलग-थलग करने का प्रयास किया है क्योंकि उसे लगता है कि मित्र देशों के बगैर पाकिस्तान इस क्षेत्र में अशांति कम फैला पाएगा। दूसरा, भारत ने हर उकसावे का जवाब देने का विकल्प […]
स्ट्रेट और संकरे रास्ते: ग्लोबल चोकपॉइंट बंद करने की भारी कीमत
अपने सबसे संकरे स्थान पर होर्मुज स्ट्रेट की चौड़ाई 40 किलोमीटर से भी कम है। सामान्य समय में इस संकरे मार्ग के भीतर दो सावधानीपूर्वक निर्धारित गलियारों से 100 से अधिक जहाज गुजरते हैं लेकिन वे केवल तेल और गैस के रूप में ही करोड़ो डॉलर मूल्य का माल ले जाते हैं। जहाज यातायात के […]
ट्रंप की अमेरिका: वैश्विक प्रभाव और शून्य जवाबदेही की ऐतिहासिक समस्या
पश्चिम एशिया की जंग शायद जल्दी समाप्त हो जाए लेकिन यह भी संभव है कि शायद ऐसा न हो। इस जंग के पीछे का मुख्य कारक यानी डॉनल्ड ट्रंप का अमेरिकी प्रशासन रोज विरोधाभासी संकेत देता है। शुक्रवार को कहा गया कि अमेरिका ईरान के चुनिंदा तटीय ढांचों पर नौ सेना के जरिये जमीनी हमले […]
डेविड बनाम गोलियत: ईरान युद्ध ने हथियार प्रणालियों की कीमतों में असमानता उजागर कर दी
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई संघर्षों को जन्म दिया है। कुछ पुराने थे लेकिन उन्हें नया बल मिला, जैसे गाजा पर इजरायल की बमबारी या यूक्रेन पर रूस का आक्रमण। अन्य अचानक ही भड़क उठे, जैसे ईरान में चल रहा मौजूदा संघर्ष। इतिहासकार कोरेली बार्नेट के अनुसार युद्ध ही अंतिम परीक्षा होती है। […]
डॉनल्ड ट्रंप को 6-3 का संदेश: व्यापारिक शक्ति का असली नियंत्रण अमेरिकी कांग्रेस के पास
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा शुल्क को व्यापार नीति के हथियार के रूप में अंधाधुंध इस्तेमाल करने के प्रयास को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का एजेंडा कुछ हद तक भ्रमित हो गया है। यह घटनाक्रम एक साथ चकित करने वाला भी था और नहीं भी। […]
दुनिया की मझोली ताकतों की दुविधा: क्या वे टेबल पर हैं या शिकार बन रहे हैं?
किसी केंद्रीय बैंक के प्रमुख से आप कभी आपसी संबंध बिगाड़ देने वाले और दुनिया हिला देने वाले भाषण की उम्मीद नहीं कर सकते। केंद्रीय बैंक संभालना ऐसा पेशा है, जिसमें लोगों को सिखाया जाता है कि कम से कम और जरूरत भर ही बोलना चाहिए और वह भी सहज तथा शांत भाव से बोलना […]
जिसकी कामना करें, सोच-समझकर करें: ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ से परे की दुनिया
दुनिया में आर्थिक रूप से कमजोर एवं विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आई तथाकथित नियम-आधारित व्यवस्था से कई शिकायतें रही हैं। उन्हें इस बात का दुख सताता रहा है कि इस व्यवस्था ने औपनिवेशिक काल से बाहर निकले राष्ट्रों के पदानुक्रम को संस्थागत रूप दे दिया और लगभग […]
बड़े बदलावों और आर्थिक झटकों का साल: कैसे 2025 ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की पुरानी नींव हिला दी
आर्थिक नीतियों में बड़े बदलाव या किसी अर्थव्यवस्था की प्रमुख तकनीक में परिवर्तन का आंतरिक राजनीतिक गतिशीलता, संपत्ति वितरण और असमानता पर दीर्घकालिक और कभी-कभी अप्रत्याशित प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, धन की सहज उपलब्धता के युग ने परिसंपत्ति मूल्यों को अत्यधिक बढ़ा दिया और संपत्ति असमानताओं को गहराई से जड़ें जमाने दीं, जिससे […]
अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति 2025: नई सोच या वैचारिक मोड़? जवाब कम और सवाल ज्यादा
अमेरिकी सरकार समय-समय पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक दस्तावेज जारी करती रहती है। इस दस्तावेज में राष्ट्रीय सुरक्षा अक्षुण्ण रखने के लिए नीतियों का जिक्र होता है। दुनिया के कई देश ऐसा करते हैं। भारत इस मामले में एक अपवाद है क्योंकि उसने पिछले कुछ समय से रक्षा पर श्वेत पत्र लाने या राष्ट्रीय […]
सुपरइंटेलिजेंस की जंग: एआई क्षेत्र में क्या वाकई हो रहा अभूतपूर्व निवेश?
मेटा के संस्थापक मार्क जकरबर्ग ने हाल ही में कहा कि वह आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) की दौड़ में पिछड़ने के बजाय ‘कुछ सौ अरब डॉलर फिजूलखर्ची’ का जोखिम उठाना पसंद करेंगे। जरा इस पर गौर करें कि उन्होंने कुछ सौ अरब डॉलर की बात कही है। जकरबर्ग जिस सरलता से यह स्वीकार करने के लिए […]









