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Economic Survey 2026: FPI इनफ्लो में बना रहेगा उतार-चढ़ाव, FDI निवेश को बढ़ावा देने पर सरकार का फोकस

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FY26 के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPIs) फ्लो में उतार-चढ़ाव बना रहा, जिसके चलते दिसंबर 2025 तक 3.9 अरब डॉलर की शुद्ध निकासी दर्ज की गई

Last Updated- January 29, 2026 | 5:01 PM IST
FPI

Economic Survey 2026: संसद में गुरुवार को पेश आर्थिक समीक्षा 2025-26 में कहा गया कि FY26 के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPIs) फ्लो में उतार-चढ़ाव बना रहा, जिसके चलते दिसंबर 2025 तक 3.9 अरब डॉलर की शुद्ध निकासी दर्ज की गई। आर्थिक समीक्षा में देश के निवेश माहौल को मजबूत करने के लिए एक बहुआयामी रणनीति अपनाने पर जोर दिया गया है। भविष्य की मुख्य चुनौती वैश्विक अस्थिरता के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की निरंतरता बनाए रखना है। इसके लिए ढांचागत और समसामयिक, दोनों कारकों पर ध्यान देना जरूरी है।

FPI भारतीय बाजार में नेट सेलर्स रहे

समीक्षा में कहा गया कि वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने और अमेरिका, ताइवान व कोरिया जैसे एआई-फोक्स्ड बाजारों में पूंजी आवंटन बढ़ने से भारतीय बाजारों से FPIs का रुझान कमजोर पड़ा। कुल मिलाकर, अप्रैल से दिसंबर 2025 तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय प्रतिभूतियों के शुद्ध विक्रेता रहे। इस अवधि के दौरान उन्होंने भारतीय डेट प्रतिभूतियों में निवेश किया, जबकि इक्विटी बाजार से लगातार निकासी की गई।

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क्यों घटा FPIs निवेश?

आर्थिक समीक्षा में कहा गया कि भारतीय शेयर बाजार से बिकवाली की मुख्य वजह अन्य बड़े वैश्विक बाजारों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन रही। व्यापार और नीतिगत अनिश्चितताओं ने भी निवेशकों के सेंटीमेंट को प्रभावित किया। रुपये के कमजोर होने से विदेशी निवेशकों का भरोसा घटा। इसके अलावा, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंची रहने के कारण वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचने का माहौल बना, जिससे FPIs निवेश पर दबाव पड़ा।

इन फैक्टर्स के कारण भारतीय शेयरों के प्रति निवेशकों की धारणा कमजोर हुई, खासकर आईटी और हेल्थकेयर जैसे निर्यात-आधारित क्षेत्रों में। इसके चलते वित्त वर्ष 2025-26 (अप्रैल–दिसंबर) के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की निकासी जारी रही।

डेट मार्केट पर FPIs बुलिश

आर्थिक समीक्षा में अनुमान जताया गया है कि डेट मार्केट में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPIs) का आउटलुक पॉजिटव बना रहेगा। इसे बाजार नियामक सेबी द्वारा एफपीआई निवेश नियमों में ढील और भारत-अमेरिका के बीच जारी व्यापार वार्ताओं से समर्थन मिल रहा है।

दिसंबर 2025 तक, एफपीआई के पास कस्टडी में मौजूद एसेट्स का कुल आधार 81.4 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 31 मार्च 2025 की तुलना में 10.4 फीसदी ज्यादा है। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से इक्विटी में मूल्यांकन लाभ (valuation gains) और डेट होल्डिंग्स में लगातार निवेश के कारण हुई।

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DIIs ने बाजार को दिया सहारा

विदेशी कैपिटल फ्लो में उतार-चढ़ाव के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs), खासकर म्युचुअल फंड और बीमा कंपनियों, ने एफपीआई निकासी से पैदा हुई अस्थिरता को काफी हद तक संतुलित किया और बाजारों को जरूरी सहारा दिया। लगातार खरीदारी के चलते सितंबर 2025 तक NSE में लिस्टेड शेयरों में DIIs की हिस्सेदारी बढ़कर 18.7 फीसदी हो गई।

FDIs की चुनौती को अवसर में बदलना होगा

समीक्षा में कहा गया कि सुधारों के लिए अवसर अब भी उपलब्ध हैं, लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं बनी रहेगी। आर्थिक वृद्धि की कहानी का अगला अध्याय लिखने के लिए FDIs की चुनौती को अवसर में बदलना होगा और इसके लिए निर्णायक कदम उठाने की जरूरत है। सरकार की स्पष्ट मंशा और बेहतर आर्थिक प्रबंधन के बावजूद, FDIs फ्लो अपनी क्षमता से कम बना हुआ है।

भारत को ज्यादा निवेश की जरूरत

विशेष रूप से बुनियादी ढांचे की जरूरतों के लिए और अधिक निवेश की जरूरत है। समीक्षा के अनुसार, अधिक विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए सक्रिय सुधार अनिवार्य हैं। इसके लिए एक लक्षित रणनीति विकसित करनी होगी, जो वैश्विक मूल्य श्रृंखला के प्रमुख केंद्रों की पहचान करे।

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FDIs की मदद के लिए सरकारी तंत्र स्थापित करना होगा

साथ ही, एक ऐसा सरकारी तंत्र स्थापित करना होगा जो इन निवेशकों के साथ साझेदार के रूप में सीधे काम करे। यह सीधा जुड़ाव विभिन्न एजेंसियों के बीच के मुद्दों को सुलझाने और समयबद्ध समाधान प्रदान करने में मदद करेगा। इसके अतिरिक्त, यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत न केवल आकर्षक प्रोत्साहन दे, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि इन प्रोत्साहनों को विश्वसनीयता के साथ लागू किया जाए।

एक विशेष ‘कार्यबल’ बनाने का सुझाव भी दिया गया है। यह कार्यबल दुनिया की टॉप कंपनियों से संपर्क करेगा और भारत की खूबियों जैसे – स्थिरता, मजबूत अर्थव्यवस्था, निरंतर वृद्धि और बड़े बाजार को उनके सामने रखेगा। इससे लक्षित क्षेत्रों में FDIs को बढ़ावा मिल सकता है। इसमें यह भी कहा गया कि सक्रिय कूटनीति के जरिये उक्त ताकतों के बारे में बताने से व्यापारिक शुल्क जैसी चुनौतियों के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।

(PTI इनपुट के साथ)

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First Published - January 29, 2026 | 5:01 PM IST

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