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कठिन वैश्विक हालात और रोजगार दबाव के बीच बजट में क्या उम्मीदें?

आगामी बजट में मुख्य रूप से कठिन वैश्विक हालात, अपर्याप्त विनिर्माण वृद्धि और रोजगार सृजन की तात्कालिकता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। बता रहे हैं नितिन देसाई

Last Updated- January 29, 2026 | 9:52 PM IST
Budget 2026
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

इस सप्ताह के अंत में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करेंगी। पुराने अनुभवों के आधार पर अनुमान लगाएं तो बजट प्रस्तुति का बड़ा हिस्सा उन योजनाओं के कार्यक्रम संबंधी बदलावों का ब्योरा होगा जो सीधे वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं हैं बल्कि अन्य मंत्रालयों की हैं। वास्तव में महत्त्वपूर्ण वे निर्णय हैं जो बजट में सरकार के कुल व्यय, उसके वित्तपोषण के तरीकों और प्रस्तावित कर परिवर्तनों के बारे में प्रस्तुत किए जाते हैं। प्रस्तुति का वही हिस्सा यानी वृहद आर्थिक और राजकोषीय प्रभाव ही सबसे अधिक मायने रखता है।

वृहद आर्थिक महत्त्व का एक अन्य अहम निर्णय यह देखना होगा कि बजट घाटे का स्तर क्या रहता है। इसकी भरपाई कैसे की जाती है, वही तय करता है कि सरकार की संचित देनदारी क्या है? अतीत की बजट प्रस्तुतियों में इस बात पर ध्यान रहता था कि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के फीसदी के रूप में राजकोषीय घाटा कितना है। सरकार ने अब अपना लक्ष्य वार्षिक राजकोषीय घाटे की जगह कुल ऋण-जीडीपी अनुपात की ओर स्थानांतरित कर दिया है।

वर्ष 2003 के राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम के तहत 2024-25 के लिए कुल ऋण-जीडीपी अनुपात का लक्ष्य 60 फीसदी निर्धारित किया गया था, जिसमें से 40 फीसदी केंद्र के लिए और 20 फीसदी राज्यों के लिए होना था। इसके विपरीत, वर्तमान में कुल ऋण-जीडीपी अनुपात लगभग 80 फीसदी है, जिसमें मार्च 2024 तक केंद्र का हिस्सा लगभग 57 फीसदी था और तब से यह इसी स्तर पर बना हुआ है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि केंद्र सरकार का परिसंपत्ति-देनदारी अनुपात, जो 1960 के दशक के मध्य से 1980 के दशक की शुरुआत तक 100 फीसदी तक पहुंच गया था, अब लगभग 45 फीसदी है। इसकी एक हद तक वजह यह है कि कोविड के दौर में इसमें तेज बढ़ोतरी हुई और मार्च 2021 तक ऋण-जीडीपी अनुपात बढ़कर 87.7 फीसदी हो गया। कोविड से पहले मार्च 2020 में यह स्तर 75.1 फीसदी था, जो पहले से ही एफआरबीएम लक्ष्य से काफी ऊपर था।

इसलिए, बजट का एक महत्त्वपूर्ण तत्व यह होगा कि केंद्र सरकार 2026-27 के लिए ऋण-जीडीपी अनुपात क्या निर्धारित करती है, साथ ही 2030 तक के लिए मध्यम अवधि का लक्ष्य भी, जो एफआरबीएम लक्ष्यों की ओर एक निर्णायक कदम का संकेत देगा।

वार्षिक राजकोषीय घाटे की जगह ऋण- जीडीपी अनुपात पर जोर दिए जाने संबंधी बदलाव समझ में आता है। हालांकि, वार्षिक राजकोषीय घाटा अभी भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसे वित्तपोषित करने का तरीका निजी क्षेत्र पर उल्लेखनीय प्रभाव डालता है।

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उपयोग किया जाने वाला मुख्य साधन बाजार से उधारी है, और इसका अधिकांश हिस्सा बैंकों, बीमा कंपनियों और अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा खरीदा और रखा जाता है। दूसरा प्रमुख साधन छोटी बचत योजनाओं का एक सेट है। इन दोनों साधनों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वित्तीय स्रोत मूल रूप से परिवार ही हैं। इसलिए, यह देखना आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपने घाटे को पूरा करने के लिए परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत का कितना हिस्सा खपत करती हैं।

महामारी से पहले के वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा बाजार और छोटी बचत से उधारी में तेज वृद्धि हुई थी। तब से जीडीपी के फीसदी के रूप में इसमें गिरावट आई है, लेकिन यह अभी भी 2018-19 के स्तर से अधिक बनी हुई है। यद्यपि एक अधिक महत्त्वपूर्ण माप यह है कि ये उधारियां परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत के फीसदी के रूप में कितनी हैं। ये बचत, जो मुख्य रूप से बैंकों, बीमा कंपनियों और अन्य वित्तीय संस्थानों के माध्यम से प्रवाहित होती हैं, सार्वजनिक और निजी उद्यमों द्वारा निवेश को सहारा देने का प्रमुख स्रोत हैं।

आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा ली गई उधारी के अनुपात में भारी बढ़ोतरी हुई है और हाल के वर्षों में यह उपलब्ध शुद्ध पारिवारिक वित्तीय बचत की मात्रा से भी अधिक हो गया है। इसका एक कारण हाल के वर्षों में परिवारों की वित्तीय देनदारियों में तेज वृद्धि है, जिसके परिणामस्वरूप सकल और शुद्ध वित्तीय बचत के बीच बड़ा अंतर पैदा हुआ है।

दूसरा कारण केंद्र सरकार द्वारा निवेश में तेजी है, जिसमें बजट में प्रभावी पूंजीगत व्यय के रूप में दिखाया गया आंकड़ा 2018-19 में जीडीपी के 2.6 फीसदी से बढ़कर 2025-26 में 4.3 फीसदी हो गया है। हाल के वर्षों के लिए पारिवारिक वित्तीय बचत का डेटा उपलब्ध नहीं है। हालांकि, पूंजीगत व्यय के संबंध में केंद्र सरकार की उधारियों में प्रतिशत गिरावट यह संकेत देती है कि यदि जीडीपी के फीसदी के रूप में परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत में गिरावट नहीं आई है, तो सुधार की संभावना हो सकती है।

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा पारिवारिक बचतों का व्यापक इस्तेमाल लागत को बढ़ाता है और निजी क्षेत्र, विशेषकर नए प्रवेशकों और छोटे उद्यमों के लिए निवेश निधियों की उपलब्धता को सीमित करता है। विनिर्माण क्षेत्र निवेश वित्त तक पहुंच पर कहीं अधिक निर्भर है। सकल स्थिर पूंजी निर्माण में निजी कॉरपोरेट क्षेत्र की हिस्सेदारी 2015-16 के 40.3 फीसदी से घटकर 2023-24 में 32.4 फीसदी हो गई है, जो आंशिक रूप से पारिवारिक बचत में इस तेज बदलाव के कारण हो सकता है।

प्रतिकूल प्रभाव का एक अन्य स्रोत छोटी बचत पर दी जाने वाली ब्याज दर है, जो बैंक लेनदेन में ब्याज दर में कमी की संभावना को सीमित करती है। इसलिए, इस सप्ताह के अंत में प्रस्तुत किया जाने वाले बजट में केंद्र सरकार की बाजार उधारी के प्रभाव को कम दिखाया जाना चाहिए और छोटी बचत को बढ़ावा देना चाहिए।

बजट के अन्य प्रमुख निर्णय कर दरों से संबंधित हैं। मुझे नहीं लगता कि इन दरों पर बहुत अधिक अपेक्षा की जा सकती है या आवश्यकता है। साल 2019 में कॉरपोरेशन टैक्स में की गई कटौती का निजी कॉरपोरेट निवेश पर कोई महत्त्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा। इसका एकमात्र असर यह हुआ कि सकल कर राजस्व में कॉरपोरेशन टैक्स संग्रह की हिस्सेदारी 2018-19 के 32 फीसदी से घटकर 2025-26 (बजट अनुमान) में 25 फीसदी हो गई।

इसी अवधि में आयकर संग्रह की हिस्सेदारी 23 फीसदी से बढ़कर 34 फीसदी हो गई। हालांकि, मैं जिस चीज की अपेक्षा करता हूं, वह है उपकर और अधिभार में कुछ कमी, जो 2010-11 से काफी बढ़ गए हैं। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है शुल्कों को निरंतर तर्कसंगत बनाना और उनमें कमी करना। संकेत हैं कि आगामी बजट में हम इसकी उम्मीद कर सकते हैं।

मेरा ध्यान व्यापक आर्थिक संतुलन और कर संबंधी मुद्दों पर रहा है, जो वित्त मंत्रालय की मुख्य जिम्मेदारी हैं और जिन्हें बजट का मुख्य केंद्र होना चाहिए, न कि सरकारी योजनाओं की लंबी प्रस्तुति। वर्तमान में, बजट प्रस्तावों के प्राथमिक प्रेरक कठिन वैश्विक वातावरण, विनिर्माण क्षेत्र की अपर्याप्त वृद्धि (जिसकी जीडीपी में हिस्सेदारी घट गई है), और रोजगार सृजन की तात्कालिकता होनी चाहिए। मुझे उम्मीद है कि बजट भाषण में वृहद आर्थिक और कर परिवर्तनों की व्याख्या तथा सरकारी योजनाओं का विवरण इन्हीं प्राथमिकताओं पर केंद्रित होगा, ताकि परिवारों और निजी क्षेत्र की अपेक्षाओं को सही दिशा में प्रभावित किया जा सके।

First Published - January 29, 2026 | 9:47 PM IST

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