दुनिया में लगभग 7,000 पादप प्रजातियों का इस्तेमाल मानव भोजन के रूप में होता रहा है। मगर अब उनमें केवल लगभग 150 प्रजातियां ही बड़े पैमाने पर उगाई जा रही हैं और केवल 30 प्रजातियां लोगों की पोषण से जुड़ी अधिकांश जरूरतें पूरी कर रही हैं। वास्तव में कुल आहार में 60 फीसदी से अधिक हिस्सा केवल तीन खाद्यान्न फसलों चावल, गेहूं और मक्का का है। शेष अधिकांश खाद्य-पादप प्रजातियां या तो विलुप्त हो गई हैं या उनका इस्तेमाल काफी कम रह गया है। इसका कारण यह है कि वे आधुनिक जीवन शैली आधारित आहार की आदतों और वर्तमान कृषि प्रणालियों के अनुरूप नहीं हैं।
उपेक्षित या कम इस्तेमाल किए जाने वाले पौधों से प्राप्त खाद्य पदार्थों में रागी, क्विनोआ, कुट्टू, कोदो और कांगनी जैसे कई पोषक तत्वों से भरपूर अनाज, बेर और करौंदा जैसी फलों की किस्में और सहजन और चौलाई जैसी सब्जियां शामिल हैं। कई उपयोगी जड़ी-बूटियां और औषधीय गुणों वाले पौधे भी इस्तेमाल से बाहर हो गए हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि न केवल समकालीन खाद्य समूह (फूड बास्केट) का आकार छोटा हो गया है बल्कि इन उत्पादों के लिए विशिष्ट बाजारों के नदारद रहने से उन संसाधनहीन गरीब किसानों की आजीविका भी प्रभावित हुई है जो पारंपरिक रूप से ये फसलों उगाते रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कई उपेक्षित और व्यावसायिक रूप से कम इस्तेमाल वाली खाद्य फसलों (जिन्हें अक्सर ‘अनाथ फसलें’ कहा जाता है) में उनके विशिष्ट पोषक तत्वों के कारण महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्यवर्धक और चिकित्सीय गुण होते हैं। ये फसलें अतीत में ‘स्मार्ट फूड’ थीं और भविष्य के ‘सुपरफूड’ बनने की क्षमता भी रखती हैं।
दूसरी तरफ, धीरे-धीरे गायब हो रहे कुछ खाद्य पदार्थों बाजरा जैसे मोटे अनाजों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अभियानों के माध्यम से पुनर्वासित करने की मांग की जा रही है मगर कृषि कार्यों से बाहर हो रहे फल एवं सब्जियों के लिए अभी तक ऐसे कदम नहीं उठाए गए हैं। यहां तक कि नीति निर्माता एवं शोधकर्ता भी इन सस्ते फल एवं सब्जियों की उपेक्षा करने के लिए जिम्मेदार हैं। वे मुख्यत: व्यावसायिक रूप से अहम एवं उन्नत खाद्य उत्पादों में सुधार पर ध्यान दे रहे हैं। इनके साथ-साथ कम इस्तेमाल वाले मगर पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उत्पादकता एवं लाभप्रदता बढ़ाने का प्रयास भी किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी ने हाल ही में ‘पोषण और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए कम इस्तेमाल होने वाले फल और सब्जियां।’ शीर्षक नाम से प्रकाशित एक शोध में पौधों के इस समूह की ओर ध्यान आकर्षित करने की दिशा में अच्छा प्रयास किया है। अक्टूबर 2025 में जारी इस नीति पत्र (नंबर 140) में 10 किस्मों के फल एवं 10 सब्जियां चुनी गई हैं जिनके उत्पादन एवं खपत में भारी गिरावट आई है। ये वे उत्पाद हैं जो हाल तक काफी प्रचलित थे मगर मौजूदा समय में बाजार में शायद ही दिखाई देते हैं।
अकादमी द्वारा चिह्नित इस्तेमाल में कम आने वाली फलों की किस्मों में आंवला, बेल, जामुन, बेर, शरीफा, करौंदा, फालसा, इमली, कठबेल और शहतूत शामिल हैं। ऐसी सब्जियों की श्रेणी में चौलाई, मोरिंगा (सहजन), बेसेला, विंग्ड बीन, फाबा बीन, परवल, गोल तरबूज, क्लस्टर बीन, यम बीन और जूट मैलो शामिल हैं।
अकादमी के शोध पत्र में कहा गया है कि फल एवं सब्जियां कुपोषित और अल्प पोषित लोगों के पोषण में सुधार करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसके अलावा विविध साथ ही प्रतिकूल कृषि-जलवायु परिस्थितियों (शुष्क, अर्द्ध-शुष्क और वर्षा-निर्भर पारिस्थितिक तंत्र) में पनपने की अद्भुत क्षमता के कारण ये फसलें उन क्षेत्रों में सतत उत्पादन सुनिश्चित कर सकती हैं जहां प्रमुख फसलें अक्सर विफल हो जाती हैं। बेर, करौंदा, लसोड़ा और खेजड़ी जैसी प्रजातियों के लिए काफी कम देखभाल की जरूरत होती है और वे वर्षा जल पर जीवित रह सकती हैं।
आंवला, इमली, शरीफा और बेल के पौधे सूखे का सामना कर सकते हैं और खराब गुणवत्ता वाली मिट्टी में भी खड़े रह सकते हैं। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता और कीट एवं अन्य बीमारियों से वे बचे रहते हैं क्योंकि उनमें प्रतिरोध क्षमता काफी होती है। अपनी इन खूबियों के कारण ये कम लागत वाली बंजर भूमि बागवानी प्रणालियों के तहत उगाने के लिए भी आदर्श फसलें हैं।
इन फल एवं सब्जियों के उत्थान के तरीकों और साधनों की रूपरेखा का जिक्र अकादमी ने अपने पत्र में किया है। इसमें सुझाव दिया गया है कि परती (गैर-कृषि योग्य) और खराब भूमि के बड़े भूभागों का उपयोग इन मजबूत फसलों को उगाने के लिए किया जाना चाहिए। इन फसलों पर शुरुआती लागत काफी कम आती है और अधिक देखभाल की भी जरूरत नहीं होती है। इसका नतीजा यह होगा कि अनुत्पादक जमीन भोजन, पोषण और ग्रामीण आजीविका के स्रोतों में तब्दील हो जाएंगे। अकादमी ने इन फसलों को ‘पोषण और चिकित्सीय संसाधनों का खजाना’ बताया है।
इमली, शरीफा, बेल, खिरनी, करौंदा, फालसा, शहतूत, जंगली नोनी और कठबेल जैसी फलों की किस्में विटामिन, खनिज और आहार रेशे के उत्कृष्ट स्रोत हैं जो कई शारीरिक कार्यों के लिए आवश्यक होते हैं। नियमित आहार में इन्हें शामिल करने से कुपोषण, एनीमिया, कम भूख और जीवन शैली से संबंधित विकारों से निपटने में मदद मिल सकती है। विटामिन, खनिज, आहार फाइबर, प्रोटीन और जैव सक्रिय यौगिकों की अपनी बेहतरीन संरचना के कारण ये फसलें सामुदायिक पोषण और स्वास्थ्य में, विशेष रूप से कमजोर तबके में, सुधार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
हालांकि, इन उपेक्षित फल एवं सब्जियों के साथ समस्या यह है कि वे जल्द खराब हो जाती हैं इसलिए उपभोक्ताओं के लिए उनकी साल भर (यानी ऑफ-सीजन) उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कटाई के बाद संरक्षण उपचार की आवश्यकता होती है। उनमें से कुछ को पारंपरिक रूप से ग्रामीण समुदायों द्वारा धूप में सुखाने और अचार बनाने जैसे पारंपरिक तरीकों से संरक्षित किया जाता है। मगर फल एवं सब्जियों का मूल्यवर्द्धित और संरक्षण बढ़ाने वाले उत्पादों में वाणिज्यिक प्रसंस्करण उनकी बाजार क्षमता और लाभप्रदता को बढ़ावा देने में बहुत मददगार हो सकता है।
देश में बागवानी को बढ़ावा देने के लिए लागू की जा रही विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से फल एवं सब्जियों की इन किस्मों के औद्योगिक पैमाने पर प्रसंस्करण को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। इससे कम प्रचलित मगर अत्यधिक मूल्यवान, पारंपरिक फल एवं सब्जियों के उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों को लाभ होगा।