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India-EU FTA से फुटवियर-लेदर सेक्टर को बूस्ट, भारतीय फुटवियर उद्योग के जमेंगे पांव

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यूरोपीय फुटवियर और चमड़े के प्रमुख ब्रांड भारत को न केवल एक उपभोग बाजार के रूप में बल्कि सोर्सिंग के स्थायी आधार के रूप में भी इस्तेमाल करने के लिए उत्सुक हो सकते हैं

Last Updated- January 28, 2026 | 9:50 PM IST
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भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए व्यापार समझौते के कारण जर्मनी के स्पोर्ट्सवियर ब्रांड जैसे एडिडास और प्यूमा से लेकर फ्रांस के लाइफस्टाइल ब्रांड किकर्स और डेनमार्क के एको तक लगभग सभी यूरोपीय फुटवियर और चमड़े के प्रमुख ब्रांड भारत को न केवल एक उपभोग बाजार के रूप में बल्कि सोर्सिंग के स्थायी आधार के रूप में भी इस्तेमाल करने के लिए उत्सुक हो सकते हैं।

उद्योग जगत के सूत्रों के अनुसार किकर्स, एको और एडिडास जैसे कुछ प्रमुख ब्रांड पहले से ही भारत से अपनी खरीद बढ़ाने की प्रक्रिया में हैं। भारतीय निर्यातकों को वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्धियों पर बढ़त मिलेगी क्योंकि चमड़े पर लगने वाला 8 फीसदी और गैर-चमड़े पर लगने वाला 17 फीसदी शुल्क घटकर शून्य हो जाएगा। यूरोपीय बाजार का करीब 85 फीसदी हिस्सा गैर-चमड़े के उत्पादों का है।

इससे तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के निर्यात केंद्रों में भी ज्यादा रोजगार सृजित होंगे क्योंकि ताइवानी आपूर्तिकर्ता तंत्र से जुड़ीं कंपनियां इन अवसरों को देखते हुए भारत का रुख कर रही हैं। पिछले दो वर्षों में अकेले तमिलनाडु में 15,000 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है और 1.5 लाख रोजगार सृजित हुए हैं। पौ चेन, हांग फू (प्यूमा, एडिडास और रीबॉक की आपूर्तिकर्ता), फेंग टे और शूटाउन जैसे कई ताइवानी ओईएम निर्माताओं ने पिछले दो वर्षों में राज्य में अपनी इकाइयां स्थापित कर ली हैं।

कोठारी इंडस्ट्रियल कॉरपोरेशन के निदेशक और राष्ट्रीय फुटवियर और लेदर डेवलपमेंट काउंसिल के सदस्य एन. मोहन ने कहा, किकर्स, जिसकी कोठारी के साथ साझेदारी है और क्लार्क्स, जिसने मेट्रो के साथ समझौता किया है, जैसे मध्यम आकार के यूरोपीय लाइफस्टाइल ब्रांडों से एक व्यापक रुझान का संकेत मिलता है।

इस रुझान के और तेज होने की संभावना है। इसी तरह के कई यूरोपीय ब्रांड रणनीतिक साझेदारी के लिए भारत का रुख करेंगे और ऐसे स्थानीय सहयोगियों की तलाश करेंगे, जिनके पास मजबूत विनिर्माण क्षमताओं के साथ-साथ बाजार की गहरी समझ भी हो।

मोहन ने कहा, कई यूरोपीय ब्रांड भारत को उभरते बाजार के रूप में देखेंगे, जहां उपभोक्ताओं के पास खर्च करने योग्य आय काफी ज्यादा है। यूरोप में लगभग 85 फीसदी गैर-चमड़े के जूते-चप्पल की खपत होती है और तमिलनाडु में हाल के समय में इस तरह के कई निवेश देखे गए हैं।

उद्योग जगत का मानना है कि मूल्यवर्धित विनिर्माण की ओर रुझान बढ़ने से प्रीमियम चमड़े के बैग, एक्सेसरीज आदि के क्षेत्र में नए अवसर खुलेंगे। लेदर सेक्टर स्किल काउंसिल (एलएसएससी) के अध्यक्ष संजय लीखा ने कहा, अगले कुछ वर्षों में हमारे निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि होनी चाहिए। इससे चमड़ा क्षेत्र को अपना कारोबार दोगुना करने में मदद मिलेगी और लाखों रोजगार सृजित होंगे। बड़े यूरोपीय खुदरा विक्रेता और ब्रांड वैश्विक स्तर पर माल खरीदते हैं। एक बार जब उनको लागत में लाभ नजर आएगा तो वे भारत में इस क्षेत्र में निवेश शुरू कर देंगे।

काउंसिल ऑफ लेदर एक्सपोर्ट्स के क्षेत्रीय अध्यक्ष (दक्षिण) अब्दुल वहाब ने कहा, इससे भारी बदलाव आएगा, खासकर जूते, हैंडबैग और गैर-चमड़े के उत्पादों के लिए। हमारा लक्ष्य 2030 तक यूरोपीय संघ को होने वाले निर्यात को तीन गुना बढ़ाकर 6 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। वर्तमान में, चमड़े और चमड़े के उत्पादों का कुल निर्यात करीब 4.8 अरब डॉलर है, जिसमें से यूरोपीय संघ का बाजार करीब 2 अरब डॉलर का है।

मोहन ने कहा, यह सौदा भारतीय उद्योग के लिए महत्वपूर्ण अवसर है। भारतीय उपभोक्ता महत्त्वाकांक्षी और फैशन के प्रति तेजी से जागरूक हो रहे हैं और समकालीन, प्रासंगिक डिजाइन वाले वैश्विक लाइफस्टाइल ब्रांडों के प्रति उनकी रुचि बढ़ रही है। आज जूते और परिधान को केवल जरूरत के रूप में ही नहीं देखा जाता बल्कि वे व्यक्तिगत शैली और पहचान की सशक्त अभिव्यक्ति बन गए हैं।

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First Published - January 28, 2026 | 9:50 PM IST

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