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कई मोर्चों पर ‘पहली बार’ वाला बजट, पर भविष्य के लिए अलग सोच जरूरी

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आगामी बजट में कई ऐसी बातें होंगी जो पहली बार होंगी लेकिन भविष्य के बजटों को अलग सांचे में ढाला जाना चाहिए। बता रहे हैं एके भट्टाचार्य

Last Updated- January 28, 2026 | 9:19 PM IST
Budget 2026-27
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

वर्ष 2026-27 का आम बजट 1 फरवरी को पेश किया जाना है। इस बजट में कई ऐसी बातें शामिल होंगी जो पहली बार घटित होंगी। इनमें सबसे जाहिर बात यह है कि पहली बार बजट रविवार को पेश किया जाएगा। इससे पहले देश के किसी भी वित्त मंत्री ने रविवार को बजट नहीं पेश किया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ऐसा करने वाली पहली वित्त मंत्री होंगी। साथ ही वह पहली ऐसी वित्त मंत्री होंगी जो एक अंतरिम बजट के अलावा लगातार आठवां पूर्ण बजट पेश करेंगी। ध्यान रहे कि अंतरिम बजट वास्तव में लेखा अनुदान होता है।

सीतारमण के लिए एक और बात जो पहली बार होगी वह यह कि वित्त मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में पहली दफा वह बिना वित्त सचिव के बजट पेश करेंगी। इससे पहले सभी सात मौकों पर बजट निर्माण की प्रक्रिया में मदद के लिए एक वित्त सचिव उनके साथ रहे हैं। वित्त मंत्रालय में फिलहाल वित्त सचिव इसलिए नहीं हैं क्योंकि पिछले वित्त सचिव अजय सेठ जून 2025 में सेवानिवृत्त होकर भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के प्रमुख बन गए। यद्यपि यह उल्लेखनीय है कि इस अवधि के दौरान मंत्रालय के शीर्ष पर मौजूद सात सदस्यीय सचिवों की टीम जस की तस है।

हाल के दिनों में इस धारणा ने जोर पकड़ा है कि मंत्रालय में किसी एक सचिव को वित्त सचिव नामित करने से बजट निर्माण प्रक्रिया पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। आर्थिक मामलों की सचिव अनुराधा ठाकुर अपने विभाग में बजट प्रभाग की प्रभारी हैं और बजट निर्माण से संबंधित कार्यों में अन्य विभागों के साथ समन्वय कर रही हैं। परंतु व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो इसमें काफी अंतर है। मंत्रालय के शीर्ष पर एक नामित वित्त सचिव के होने से बजट बनाने की प्रक्रिया का मंत्रालय के भीतर अधिक प्रभावी समन्वय किया जा सकता है। इसके साथ ही अन्य प्रमुख केंद्रीय मंत्रालयों और यहां तक कि राज्यों के साथ विभिन्न राजस्व और व्यय संबंधी जरूरतों पर भी अधिक बेहतर संवाद कायम किया जा सकता है।

सबसे अहम बात यह है कि नामित वित्त सचिव विभिन्न माध्यमों से वित्त मंत्रालय के तथाकथित बजट समूह को भेजे जा रहे अलग-अलग संदेशों से उत्पन्न संभावित टकरावों को रोकने में मदद कर सकता है और किसी भी भ्रम को प्रारंभिक स्तर पर ही रोक सकता है। इस प्रकार एक प्रभावी वित्त सचिव बजट से संबंधित सभी विचारों और सुझावों की जांच, छंटनी और व्यवस्थित संप्रेषण करने के लिए एक कुशल माध्यम बन सकता है। खासतौर पर वित्त मंत्रालय और सरकार के अन्य प्रमुख हितधारकों के बीच, जिनमें प्रधानमंत्री कार्यालय भी शामिल है।

आगामी बजट में एक और बात जो पहली बार होगी वह संभवत: इसके आंकड़ों का अल्पकालिक स्थायित्व होना है। इसका संबंध इन आंकड़ों की विश्वसनीयता से नहीं बल्कि उन मानकों में बदलाव के बारे में है जिनके आधार पर इन्हें आंका जाता है। उदाहरण के लिए बजट में घाटे के आंकड़े या ऋण का आधार हमेशा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किए जाते हैं और इसी रूप में समझे जाते हैं। खासतौर पर विश्लेषकों के लिए अन्य बजटीय आंकड़े मसलन पूंजीगत व्यय, कर राजस्व तथा गैर कर राजस्व भी जीडीपी के प्रतिशत के रूप में ही आंके जाते हैं।

वर्ष 2026-27 के लिए अर्थव्यवस्था के नॉमिनल आकार का बजट अनुमान भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होगा। यह एक अहम आंकड़ा है जिसके आधार पर अधिकांश राजस्व तथा व्यय का आकलन किया जाएगा। यह आकलन 2025-26 के नॉमिनल जीडीपी के प्रथम अग्रिम अनुमान पर आधारित होगा। ये आंकड़े जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में जारी किए गए थे।

ये तमाम आंकड़े जो जीडीपी के फीसदी के रूप में हैं, वे 1 फरवरी को बजट पेश होने के बाद केवल चार सप्ताह में बदल सकते हैं। फरवरी के अंतिम शुक्रवार को सांख्यिकी मंत्रालय 2022-23 को आधार मानकर नए जीडीपी आंकड़े पेश करेगा। संभव है कि 2025-26 का बजट घाटा आंकड़ा 1 फरवरी के संशोधित अनुमान में कुछ और होगा और 27 फरवरी को कुछ और। इसका अर्थ यह हो सकता है कि घाटे, ऋण, कर संग्रह और व्यय के अनुमानित आंकड़े बदल सकते हैं। आंकड़े एक ही सूरत में अपरिवर्तित रह सकते हैं जब नई श्रृंखला 2025-26 के आंकड़ों में मामूली बदलाव दर्शाए।

क्या इससे बचा जा सकता था? हां अगर सांख्यिकी मंत्रालय ने नई श्रृंखला के आंकड़ों की प्रस्तुति को थोड़ा जल्दी कर 2026-27 के बजट पेश होने से पहले कर दिया होता। जिस प्रकार मंत्रालय बार-बार घोषणा कर रहा था कि जीडीपी श्रृंखला की नई विशेषताएं 27 फरवरी को जारी की जाएंगी, उसी तरह मंत्रालय अपनी समय-सीमा को थोड़ा घटा सकता था ताकि बजट पेश करने के तुरंत बाद राजस्व और व्यय के आंकड़ों को जीडीपी के प्रतिशत के रूप में संशोधित करने की जरूरत न पड़े।

याद रहे कि हाल के साल में ऐसा पहली बार होगा जब बजट के प्रमुख आंकड़ों को पेश करने के कुछ सप्ताह के भीतर ही संशोधित करना होगा। वर्ष 2015 में, 2011-12 को आधार बनाकर नई जीडीपी श्रृंखला 30 जनवरी 2015 को जारी की गई थी। नई श्रृंखला पर आधारित 2014-15 के पहले अग्रिम अनुमान 9 फरवरी 2015 को जारी किए गए थे। वर्ष 2015-16 का केंद्रीय बजट 28 फरवरी 2015 को नई श्रृंखला के आंकड़ों के साथ पेश किया गया था।

बजट पेश होने के बाद जीडीपी आधारित घाटे या प्राप्तियों के आंकड़ों में किसी संशोधन या समायोजन की जरूरत नहीं पड़ी थी। इससे पहले की जीडीपी श्रृंखला जिसका आधार वर्ष 2004-05 था, 29 जनवरी 2010 को जारी की गई थी और उस नई श्रृंखला पर आधारित 2009-10 के पहले अग्रिम अनुमान 8 फरवरी 2010 को जारी किए गए थे। साल 2010-11 का बजट 26 फरवरी 2010 को पेश किया गया था जिसमें घाटे, प्राप्तियों और व्यय का अनुमान नई श्रृंखला के आंकड़ों के आधार पर लगाया गया था।

सवाल यह है कि अगर जीडीपी श्रृंखला के दो पिछले दौर के संशोधन ठीक बजट प्रस्तुति के पहले पेश किए जा सकते थे तो इस बार उन्हें बजट के चार सप्ताह बाद पेश करने से क्या हासिल होगा? ताजा बजट के लिए सरकार एक और चीज पहली बार कर सकती थी। अब तक की परंपरा के मुताबिक वित्त आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश किए जाने के बाद ही सार्वजनिक की जाती है। कई साल से सरकारों ने इसे बजट पेश करने से कुछ दिन पहले या उसी दिन संसद में पेश किया है। इन सिफारिशों का विवरण जिन्हें सरकार प्राय: स्वीकार कर लेती है, आगामी वर्षों में व्यय आवंटन और राज्यों के हस्तांतरण पर स्पष्ट प्रभाव डालता है। क्या वास्तव में इन सिफारिशों को इतने सप्ताहों तक गोपनीय बनाए रखना उचित है?

सोलहवें वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट 17 नवंबर 2025 को पेश की थी। 2025 में संसद का शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर को आरंभ हुआ और 19 दिसंबर को समाप्त हो गया। यदि सरकार ने वित्त आयोग की रिपोर्ट संसद के पिछले शीतकालीन सत्र में ही पेश कर दी होती तो क्या फर्क पड़ता? समय से पहले जारी करने से बेहतर बहस संभव हो पाती और राज्यों को आगामी वित्त वर्ष में अधिक या कम संसाधनों के साथ अपनी वित्तीय हालात संभालने की पूर्व तैयारी का अवसर मिल जाता।

भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप पिछले कई वर्षों में बदल चुका है। यदि सरकार का सिगरेट पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने का निर्णय 1 फरवरी से लागू करने के लिए दिसंबर 2025 के पहले सप्ताह में संसद में लिया जा सकता है, और इससे बाजार व उद्योग पर केवल मामूली प्रभाव पड़ा, तो बजट प्रक्रिया पर भी यह जानकारी सार्वजनिक कर देने का कोई गंभीर असर नहीं पड़ता कि अगले पांच वर्षों में केंद्रीय संसाधन राज्यों को किस प्रकार हस्तांतरित होंगे।
हां, बजट में आश्चर्य का तत्व कम हो जाता। लेकिन जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था विकसित होती है, वार्षिक बजट का स्वरूप भी बदलना चाहिए। यानी उसमें कम आश्चर्य, कम गोपनीयता और संभवत: कर दरों में बदलाव पर खुला विमर्श होना चाहिए। आखिरी बात, निश्चित रूप से एक व्यापक बहस की मांग करती है।

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First Published - January 28, 2026 | 9:15 PM IST

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