भारत और यूरोपीय संघ के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर मंगलवार को हस्ताक्षर हुए। हाल के दिनों का यह दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा समझौता है जो दो अरब लोगों का बाजार तैयार करता है। बहरहाल, 16वीं भारत-यूरोपीय संघ शिखर बैठक और दोनों पक्षों के नेताओं का संवाद केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहा। इस अवसर पर कई अन्य समझौतों पर भी हस्ताक्षर हुए ताकि आपसी सहयोग बढ़ाया जा सके और रिश्तों को मजबूती प्रदान की जा सके।
उदाहरण के लिए दोनों पक्षों ने भारत-यूरोपीय संघ की सामरिक साझेदारी के सभी पहलुओं को शामिल करने वाला एक व्यापक दस्तावेज तैयार किया है। भारत और यूरोपीय संघ रक्षा और सुरक्षा पर सहयोग को बेहतर बनाएंगे। गतिशीलता पर सहयोग के लिए एक व्यापक ढांचा भी सहमति से तय किया गया है। भारत और यूरोपीय संघ सेवाओं के क्षेत्र में कई उप क्षेत्रों को एक-दूसरे की प्राथमिकताओं को समायोजित करने के लिए खोलेंगे। यूरोपीय संघ ने भारतीय छात्रों को पढ़ाई के बाद कामकाजी वीजा देने का भी वचन दिया है।
जहां तक व्यापार समझौते की बात है, यह कानूनी अनिवार्यताएं पूरी होने के बाद ही लागू होगा लेकिन इससे जो हासिल हुआ है वह उल्लेखनीय है। वर्ष 2024-25 में भारत-यूरोपीय संघ द्विपक्षीय व्यापार करीब 136.54 अरब डॉलर का था। भारत ने उस वर्ष 75.85 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया जबकि उसका आयात 60.68 अरब डॉलर का रहा। पैमाने को देखते हुए व्यापार बहुत तेजी से बढ़ सकता है। भारत और यूरोपीय संघ वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 25 फीसदी और वैश्विक व्यापार में एक तिहाई हिस्सेदारी रखते हैं। दोनों पक्षों का सेवा क्षेत्र में भी गहरा कारोबारी रिश्ता है।
इस बात पर सहमति बनी है कि यूरोपीय संघ भारत से आयात होने वाली वस्तुओं के लिए मूल्य के आधार पर 99.5 फीसदी पर शुल्क कम करेगा जबकि भारत 92 फीसदी से अधिक वस्तुओं पर शुल्क को उदार बनाएगा। समझौता लागू होते ही भारत मूल्य के हिसाब से 30 फीसदी व्यापार वस्तुओं पर शुल्क को शून्य कर देगा और इसका दायरा धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा। उल्लेखनीय है कि यूरोपीय संघ ने कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) पर रियायत नहीं दी है। यद्यपि उसने यह सहमति दी है कि किसी भी अन्य देश को दिया गया लचीलापन भारत को भी प्रदान किया जाएगा।
इस एफटीए को अंतिम रूप देना एक कामयाबी है और दोनों पक्षों की नियम आधारित विश्व व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराता है। परंतु भारत को कम से कम तीन अहम मुद्दों पर ध्यान देना होगा। पहला, यह अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का विकल्प नहीं है। अमेरिका अभी भी मिलेजुले संकेत दे रहा है लेकिन भारत को एक पारस्परिक लाभकारी समझौते तक पहुंचने के प्रयास जारी रखने चाहिए। लंबे समय तक अमेरिकी बाजार की पहुंच खोने की आशंका से बचना बहुत आवश्यक है।
दूसरा, भारत को अपनी पूरी व्यापार नीति की समीक्षा करनी चाहिए और शुल्कों को उल्लेखनीय रूप से कम करना चाहिए। भारत ने यूरोप के प्रति खुलापन दिखाया है इसलिए सामान्य रूप से शुल्कों को कम करना अब आसान होना चाहिए। आगामी केंद्रीय बजट इस प्रक्रिया को सार्थक तरीके से शुरू करने का एक उत्कृष्ट अवसर होगा। इसके अतिरिक्त गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों का पुनर्मूल्यांकन भी जरूरी है जो वास्तव में व्यापार बाधाएं ही हैं।
भारत को यदि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं का हिस्सा बनना है तो यह अहम है। अब उसे व्यापक क्षेत्रीय व्यापार व्यवस्थाओं मसलन ‘प्रशांत पार साझेदारी का व्यापक और प्रगतिशील समझौता’ आदि का हिस्सा बनने पर विचार करना होगा। तीसरा भारत को अब आंतरिक सुधारों को और अधिक आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाना होगा। वह केवल तभी व्यापार समझौतों का लाभ ले पाएगा जब भारत के व्यवसाय अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे। एफटीए की एक आम आलोचना यह होती है कि वे भारतीय व्यवसायों को लाभ नहीं पहुंचाते। ऐसा प्रतिस्पर्धात्मकता के कारण होता है। आंतरिक सुधार भविष्य में ऐसे नतीजों से बचने में मददगार साबित हो सकते हैं।