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डॉलर के दबदबे को चुनौती देती चीन की मुद्रा रणनीति, भारत के लिए छिपे हैं बड़े सबक

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डॉलर के दबदबे वाली दुनिया में खुद को प्रतिबंधों से सुरक्षित रखने की चीन की कोशिशों में भारत के लिए भी सबक छिपे हुए हैं।

Last Updated- January 25, 2026 | 10:46 PM IST
China currency
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

बीते कई सालों से चीन के नीति-निर्माता इस बात के लिए जूझते रहे हैं कि चीन की मुद्रा रेनमिनबी (आरएमबी) का अंतरराष्ट्रीयकरण किया जाए और उसे अमेरिकी डॉलर के समक्षा खड़ा किया जा सके। उसके नेता वित्तीय जोखिम और उतार-चढ़ाव के डर से पूर्ण परिवर्तनीयता और एक बाजार आधारित विनिमय दर की इजाजत देने के इच्छुक नहीं थे क्योंकि उससे सामाजिक और राजनीतिक अशांति उत्पन्न हो सकती थी। बीते पांच साल में कई नीतिगत उपायों के जरिये अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वित्त औ​र सीमा पार निपटान में आरएमबी के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया।

चीन ने चरणबद्ध ढंग से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और मुद्रा बाजार के साथ एकीकृत होने की कोशिश भी की। इसका मुख्य उद्देश्य अपनी अर्थव्यवस्था को प्रतिबंध रहित यानी प्रतिबंधों से बचाव वाली बनाना रहा है, ताकि उसको वित्तीय परिसंपत्तियों की जब्ती और डॉलर-प्रधान भुगतान चैनलों जैसे अमेरिका स्थित क्लियरिंग हाउस इंटरबैंक पेमेंट्स सिस्टम (चिप्स) और ब्रसेल्स स्थित सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनैंशियल टेलीकम्युनिकेशंस (स्विफ्ट) जैसे मेसेजिंग सिस्टमों के बहिष्कार जैसी स्थिति में बचाया जा सके।

चिप्स रोज 1.8 से 2 लाख करोड़ डॉलर का लेनदेन संभालता है जबकि स्विफ्ट रोजाना 4.4 से 4.8 करोड़ संदेशों के जरिये बैंक हस्तांतरण करता है जिनकी कुल अनुमानित राशि लगभग 10 लाख करोड़ डॉलर है। इस अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्र से बाहर कर दिए जाने पर गंभीर और प्रतिकूल आर्थिक परिणाम हो सकते हैं। ईरान और रूस के साथ हम ऐसा होते देख चुके हैं। चीन ने धीरे-धीरे डॉलर वाली परिसंपत्तियों में अपना निवेश और जोखिम कम करना शुरू किया। उसके पास मौजूद अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड 2020 में 1,072 अरब डॉलर से घटकर नवंबर 2025 में 713 अरब डॉलर रह गए हैं। चीन ने अपने स्वर्ण भंडार में भी उल्लेखनीय वृद्धि की है। 2025 में उसने 2,306 टन सोना खरीदा। अनुमान है कि अब उसके विदेशी मुद्रा भंडार का 8.5 फीसदी सोने में रखा गया है।

चीन ने अपने स्वयं के भुगतान तंत्र चाइना इंटरनैशनल पेमेंट्स सिस्टम (सिप्स) और एक स्विफ्ट-जैसे मेसेजिंग सिस्टम सिप्स कनेक्ट को बढ़ावा दिया है। यद्यपि सिप्स द्वारा संभाला जाने वाला दैनिक लेनदेन चिप्स की तुलना में अपेक्षाकृत काफी कम है, लेकिन यह तेजी से बढ़ रहा है। पूरे साल 2025 में सिप्स ने 25 लाख करोड़ डॉलर के भुगतान संभाले, जो पिछले वर्ष की तुलना में 43 फीसदी अधिक था। चीन का वर्तमान व्यापार 6 लाख करोड़ डॉलर का है। इसका 40 फीसदी हिस्सा आरएमबी में निपटाया जाता है जबकि 2015 में यह केवल 25 फीसदी था। इसे आरएमबी के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए अहम माना गया।

एक प्रमुख पहल एमब्रिज परियोजना रही है, जो भाग लेने वाले केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्राओं का उपयोग करके लगभग तत्काल सीमापार निपटान को सक्षम बनाती है। यह अमेरिकी डॉलर या उसके भुगतान तंत्र के उपयोग से बचाती है और इस प्रकार प्रतिबंध-रोधी है। वर्तमान में पीपल्स बैंक ऑफ चाइना, हॉन्ग कॉन्ग मौद्रिक प्राधिकरण, तथा यूएई, थाईलैंड और सऊदी अरब के केंद्रीय बैंक इसके सदस्य हैं।

जनवरी 2026 में अनुमान लगाया गया कि एमब्रिज ने 55 अरब डॉलर के तत्काल सीमापार लेनदेन संभाले। अब एमब्रिज को शांघाई इंटरनेशनल एनर्जी एक्सचेंज से जोड़ा गया है, जो पेट्रो युआन बाजार की मेजबानी करता है और चीनी मुद्रा में तेल व्यापार के निपटान को सुविधाजनक बनाता है। वर्तमान में सऊदी अरब के 15 फीसदी तेल व्यापार का निपटान शांघाई में होता है। यह पहले की तथाकथित पेट्रो-डॉलर बाजार पर पूर्ण निर्भरता से एक बड़ा बदलाव है। चीन ने घोषणा की है कि शांघाई उसके डिजिटल युआन का अंतरराष्ट्रीय केंद्र होगा और इसे एमब्रिज से जोड़ा जाएगा।

वर्ष 2015 में चीन की महत्त्वाकांक्षा यह थी कि आरएमबी को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा और डॉलर का प्रतिद्वंद्वी बनाया जाए। यह संभव नहीं हो सका क्योंकि चीन ने पूर्ण परिवर्तनीयता को नहीं अपनाया और उसके साथ अस्थिरता जुड़ी हुई है। अब उसकी नीति एक वैकल्पिक समानांतर वित्तीय पाइपलाइन स्थापित करने की ओर स्थानांतरित हो गई है, जो चीन और उसके साझेदारों को डॉलर-आधारित बैंकिंग और मुद्रा प्रणाली को दरकिनार करने में सक्षम बनाती है। अब कथा अमेरिकी डॉलर को विस्थापित करने की नहीं है, बल्कि वह बनाने की है जिसे पीपल्स बैंक ऑफ चाइना के गवर्नर पैन गोंगशेंग ने ‘बहुध्रुवीय सह-अस्तित्व’ कहा है, जहां ‘कुछ संप्रभु मुद्राएं मौजूद रहती हैं, प्रतिस्पर्धा करती हैं और एक-दूसरे को संतुलित करती हैं।’

अमेरिकी डॉलर के हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने की स्थिति में आरएमबी को स्पष्ट रूप से एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है।  

इसके साथ ही चीन ने खुद को जोखिम से बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों से एकीकरण के रास्ते को भी अपनाया। यह विरोधाभासी प्रतीत हो सकता है लेकिन है नहीं। चीन अपने राष्ट्रपति शी चिनफिंग के उस निर्देश को लागू करने का प्रयास कर रहा है जिसके मुताबिक चीन को अपनी आर्थिक निर्भरता अन्य देशों पर कम करनी चाहिए, लेकिन साथ ही अन्य देशों को चीन पर अधिक निर्भर बनाना चाहिए। 

दुर्लभ खनिजों और चुंबकों पर चीन की पकड़ में हम ऐसा देख चुके हैं। वित्तीय मामलों में चीन अपने बड़े और विस्तारित होते वित्तीय बाजारों को विदेशी कंपनियों के लिए खोल रहा है।

चीन का बॉन्ड बाजार 26 लाख करोड़ डॉलर का है। इसमें से केंद्रीय इंटर-बैंक बॉन्ड बाजार, जो उच्च गुणवत्ता वाले चीनी सरकारी बॉन्ड्स से बना है, 22.5 लाख करोड़ डॉलर का है और अब विदेशी संस्थाओं के लिए खुला है। इन्हें अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड सूचकांकों में शामिल किया गया है, जिससे 450 अरब डॉलर के स्थिर और निष्क्रिय निवेश प्रवाह आए हैं। विदेशी स्वामित्व अभी भी तुलनात्मक रूप से कम है। यह सरकारी बॉन्ड्स का केवल 6 फीसदी है लेकिन यह लगातार बढ़ रहा है क्योंकि ये एक अशांत दुनिया में सुरक्षित निवेश का दर्जा हासिल कर रहे हैं। बाहरी संस्थाओं, विशेषकर बड़ी परिसंपत्तियों का प्रबंधन करने वालों का चीनी इक्विटी और बॉन्ड बाजारों में जितना अधिक निवेश होगा, चीन का उन पर उतना ही अधिक प्रभाव होगा। यह दृष्टिकोण गहन जांच का विषय है।

भारत को चीन के केंद्रीय बैंक के गवर्नर द्वारा प्रस्तावित विविध मुद्राओं के सहअस्तित्व वाली प्रणाली से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। डॉलर-प्रधान दुनिया में प्रतिबंधों से खुद को सुरक्षित रखने के लिए चीन द्वारा उठाए गए कदम भारत के लिए एक जोखिम-निवारक नीति के रूप में रुचिकर होने चाहिए। 

भारत को भी अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड सूचकांकों में शामिल होने का प्रयास करना चाहिए, जिससे महत्त्वपूर्ण और स्थिर निष्क्रिय निवेश प्रवाह आएगा, जो शेयर बाजार में अचानक आने वाली राशि की तरह अस्थिरता पैदा नहीं करेगा। अनुमान है कि पैसिव फंड यानी निष्क्रिय निधियों के रूप में उपलब्ध फंड पूल 18 लाख करोड़ डॉलर का है, जिसे उपयोग में लाया जा सकता है। भारत प्रमुख उभरते बाजार के बॉन्ड सूचकांकों में शामिल है, जिससे लगभग 20 अरब डॉलर की निष्क्रिय निधि आई है। यदि देश को वैश्विक समग्र सूचकांकों में भी शामिल किया जाए तो और बड़े फंड प्रवाह होंगे।

भारत ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल होने के कगार पर था, लेकिन इस वर्ष जनवरी में प्रक्रिया रोक दी गई। इसकी वजह जटिल पंजीकरण और पोस्ट-ट्रेड टैक्स सेटलमेंट प्रक्रियाओं को बताया गया है। यह ऐसा मुद्दा है जिसे 1 फरवरी के बजट में संबोधित किया जाना चाहिए। इस मामले में चीन कहीं अधिक फुर्ती से आगे बढ़ा है। 

(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - January 25, 2026 | 10:46 PM IST

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