भारत में सस्ते घरों का बाजार इन दिनों भारी दबाव में है। घरों की कीमतें आसमान छू रही हैं, कर्ज लेने की लागत ऊंची बनी हुई है, और सरकारी नियम बाजार की हकीकत से मेल नहीं खा रहे। पहली बार घर खरीदने वाले लोग अभी भी इच्छुक हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि 2026 के केंद्रीय बजट में टैक्स, लोन और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े नियमों को ठीक करके ही इस सेक्टर को दोबारा पटरी पर लाया जा सकता है। इससे न सिर्फ खरीदारों को फायदा होगा, बल्कि डेवलपर्स भी फिर से इसमें रुचि लेंगे।
2017 से किफायती आवास की परिभाषा जस की तस बनी हुई है, जबकि इस बीच घरों की कीमतों में भारी उछाल आया है। अमरावती ग्रुप के फाउंडर और चेयरमैन रजनीकांत मिश्रा बताते हैं कि ज्यादातर शहरों में पिछले पांच सालों में घरों की कीमतें 60 से 100 फीसदी तक बढ़ गई हैं। लेकिन लोगों की कमाई इतनी तेजी से नहीं बढ़ी, जिससे मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए घर खरीदना मुश्किल हो गया है।
आनंद राठी ग्लोबल फाइनेंस में SME रिटेल बिजनेस के CEO सिमरनजीत सिंह भी इस बात से सहमत हैं। उन्होंने RBI के हाउस प्राइस इंडेक्स का हवाला दिया, जो दिखाता है कि 2017 से कीमतें 45 से 50 फीसदी बढ़ चुकी हैं। सिंह का सुझाव है कि बजट 2026 में सस्ते घरों की कैटेगरी को अपडेट करके 75 लाख रुपये तक की प्रॉपर्टी को शामिल किया जाए। ये उन परिवारों के लिए हों, जिनकी सालाना कमाई 12 से 15 लाख रुपये है, और लोन की लिमिट को 60 से 70 लाख तक बढ़ाया जाए। सिंह चेतावनी देते हैं कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो सस्ते घरों का बाजार और सिकुड़ जाएगा।
टैक्स में ज्यादा छूट मिलने से घर खरीदना आसान हो सकता है। मिश्रा का कहना है कि अगर कोई पहली बार 45 लाख का घर खरीद रहा है और 36 लाख का लोन लेता है, तो 8.5 से 9 फीसदी ब्याज दर पर उसकी मासिक किस्त में काफी कमी आ सकती है। अगर सेक्शन 24(बी) की लिमिट को 5 लाख तक बढ़ा दिया जाए, लोन की मियाद बढ़ाई जाए या ब्याज पर सब्सिडी दोबारा शुरू की जाए, तो ईएमआई में 4 हजार से 8 हजार रुपये की बचत हो सकती है।
सिंह भी इससे सहमत हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि 40 लाख के लोन पर 8 फीसदी ब्याज से 20 साल की मियाद में अगर सेक्शन 24(बी) की छूट बढ़ाई जाए, 2 फीसदी ब्याज सब्सिडी दी जाए और टेन्योर लंबा किया जाए, तो हर महीने 3 हजार से 5 हजार रुपये की राहत मिल सकती है। इससे घर खरीदने की क्षमता बढ़ेगी और ज्यादा लोग बाजार में आएंगे।
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डेवलपर्स अब सस्ते घरों से मुंह मोड़ रहे हैं क्योंकि उनका मुनाफा बहुत कम रह गया है। मिश्रा कहते हैं कि 1 फीसदी GST स्कीम में इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिलता, जिससे लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा अप्रूवल में देरी भी बड़ी समस्या है। आराट डेवलपर्स और अयातना हॉस्पिटैलिटी के चेयरमैन टोनी विंसेंट का कहना है कि अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में इनपुट टैक्स क्रेडिट न मिलने से पारदर्शिता प्रभावित होती है और लागत ज्यादा हो जाती है। वे जीएसटी स्ट्रक्चर को फिर से देखने की मांग करते हैं।
रामा ग्रुप के डायरेक्टर प्रखर अग्रवाल भी GST में बदलाव और सस्ते घरों की परिभाषा को रीयलिस्टिक बनाने की बात करते हैं। खासकर टियर-टू और टियर-थ्री शहरों में, जहां असली खरीदार बढ़ रहे हैं, लेकिन प्रोजेक्ट चलाना मुश्किल है।
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सस्ते घरों की असली ग्रोथ अब महानगरों से बाहर होगी। भूतानी इंफ्रा के CEO आशीष भूतानी कहते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार काम, बेहतर कनेक्टिविटी और टैक्स में राहत से निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और शहरों का विकास लंबे समय तक चलेगा।
हीरो रियल्टी के CEO रोहित किशोर नोएडा का उदाहरण देते हैं, जहां एक्सप्रेसवे, मेट्रो का विस्तार और आने वाला एयरपोर्ट असली खरीदारों को आकर्षित कर रहा है। वे घर लोन पर ब्याज छूट बढ़ाने और मिक्स्ड-यूज और रेंटल हाउसिंग को सपोर्ट देने की जरूरत बताते हैं, ताकि रहने की सुविधा और किफायत बनी रहे।
जिंदल रियल्टी के प्रेसिडेंट और CEO अभय मिश्रा कहते हैं कि सोनीपत जैसे टियर-टू शहर एक्सप्रेसवे से जुड़ने और इंडस्ट्री ग्रोथ की वजह से हाउसिंग हब बन रहे हैं।
हाउसिंग से जुड़े बदलावों के अलावा, कुल मिलाकर पॉलिसी में क्लैरिटी जरूरी है। इंटीग्रेट लॉ के फाउंडर वेंकेट राव कहते हैं कि टैक्सेशन को साफ करना, GST को आसान बनाना और विवादों का जल्द निपटारा से कंप्लायंस का बोझ कम होगा और निवेशक ज्यादा कॉन्फिडेंट होंगे। रीयलिस्टिक रीयल्टर्स के रीजनल डायरेक्टर मोहित बत्रा कहते हैं कि टैक्स छूट और इनकम लिमिट को मौजूदा प्रॉपर्टी वैल्यू और लोन साइज के हिसाब से अपडेट करना बेहद जरूरी है।
अमरावती ग्रुप के रजनीकांत मिश्रा शहरों की सेवाओं में निवेश और वर्कफोर्स स्किलिंग पर जोर देते हैं। वोमेकी ग्रुप के चेयरमैन और फाउंडर गौरव के सिंह कहते हैं कि सस्ते घरों की ग्रोथ एमएसएमई सेक्टर से जुड़ी है, जहां क्रेडिट आसानी और स्किलिंग से रोजगार बढ़ेगा और शहरों में डिमांड आएगी।
राइज इंफ्रावेंचर्स के COO भूपिंद्रा सिंह बताते हैं कि आज के खरीदार वैल्यू को महत्व देते हैं और लंबे समय की सोचते हैं। पॉलिसी अगर इन बातों से मैच करे, तो दबी हुई डिमांड बाहर आएगी।