अमेरिका एक तरफ अपने देश में कुशल विदेशी प्रतिभाओं की आवाजाही को मुश्किल बना रहा है वहीं इसके विपरीत यूरोप इस दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) के नए मुक्त व्यापार समझौते के तहत भारतीय पेशेवरों के लिए अपने दरवाजे खोल रहा है।
इस समझौते के तहत भारत में एक यूरोपियन लीगल गेटवे ऑफिस स्थापित किया जाएगा, जो सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) क्षेत्र से शुरू होकर, श्रमिकों की यूरोपीय संघ (ईयू) में आवाजाही को सुगम बनाने और समर्थन देने के लिए एक अहम केंद्र होगा। इससे भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) पेशेवरों के लिए ईयू के सदस्य देशों में जाना और काम करना काफी आसान हो जाएगा। अमेरिका के बाद यह ब्लॉक भारत का दूसरा सबसे बड़ा तकनीकी बाजार है।
देश के आईटी सेवा उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाली उद्योग संस्था नैस्कॉम ने कहा कि भारतीय आईटी कंपनियों को यूरोप में अधिक अवसर मिलने से फायदा मिलेगा जिसमें सेवाओं का सुगम सीमा पार प्रावधान (जीएटीएस के तहत मोड 1) और पेशेवरों के लिए संभावित रूप से आवाजाही की बेहतर संभावनाएं (हालांकि मोड 4) शामिल हैं। भारत का 280 अरब डॉलर का आईटी उद्योग अपनी ज्यादातर कमाई के लिए अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर है, लेकिन ब्रिटेन और ईयू भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान करते हैं।
अब वीजा नवीनीकरण साक्षात्कार को अगले साल तक के लिए टालने के साथ ही एच-1बी वीजा की प्रक्रिया अब अधिक जटिल होने और भू-राजनीतिक अनिश्चितता की स्थिति बनी रहने के कारण, आईटी सेवा कंपनियां अपने कर्मचारियों को यूरोप में भेजने पर अधिक ध्यान दे सकती हैं क्योंकि इस क्षेत्र की कंपनियां पुरानी प्रणालियों के डिजिटल बदलाव की प्रक्रिया में तेजी ला रही हैं।
उद्योग संस्था, नैस्कॉम ने एक बयान में कहा, ‘भू-राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए, यह एफटीए भारतीय आईटी निर्यातकों के लिए बाजारों में विविधता लाएगा जिससे वैश्विक व्यापार की अनिश्चितताओं से बचाव होगा। यह डिजिटल सेवाओं के लिए वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भारत की स्थिति को मजबूत करता है।’
समझौते से प्रौद्योगिकी, नवाचार और डिजिटल सेवाओं में ईयू-भारत के बीच सहयोग और बढ़ने की उम्मीद है। नैसकॉम का मानना है कि इससे भारत के आईटी तंत्र में यूरोपीय निवेश, संयुक्त उद्यम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा पर आधारित तकनीक और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में शोध एवं विकास (आरऐंडडी) को लेकर सहयोग बढ़ सकता है। भारतीय आईटी कंपनियों को तकनीकी हस्तांतरण, सह-निर्माण और विस्तारित साझेदारी से भी फायदा हो सकता है।
भारत ने पिछले साल ब्रिटेन के साथ भी दोहरे अंशदान करार के माध्यम से इसी तरह का एक समझौता किया था, जो भारतीय श्रमिकों और उनके नियोक्ताओं को तीन साल तक ब्रिटेन में सामाजिक सुरक्षा भुगतान योगदान से छूट देता है जिससे कर्मचारियों के हाथ में आने वाले वेतन में काफी वृद्धि होती है और भारतीय कंपनियों के लिए लागत कम होती है। इस कदम का मकसद ब्रिटेन को भारतीय पेशेवरों के लिए अधिक आकर्षक जगह बनाना था।
टीसीएस, इन्फोसिस और विप्रो ने ईयू समझौते पर पूछे गए सवालों का जवाब नहीं दिया। एनएलबी सर्विसेज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सचिन अलुग ने कहा कि अब यूरोप की कंपनियां भारत में अपना कारोबार बढ़ा रही हैं तो उनका ध्यान सिर्फ भारत से लोगों को काम पर रखने पर नहीं है। वो अब भारत में मजबूत वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) बनाना चाहती हैं जिनमें बेहतर तरीके से काम हो, नियमों का पालन हो और काम करने का तरीका सख्त हो यानी वो भारत में अपने दफ्तर को और भी बेहतर और भरोसेमंद बनाना चाहती हैं।
अलुग ने कहा, ‘इस बदलाव से कंपनियों को नियमों का पालन करने, ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) को संरक्षित करने, डेटा को सुरक्षित रखने और नई तकनीक के हिसाब से काम करने के लिए खास लोगों की जरूरत होगी। साथ ही उन्हें भारत में वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) अपने दफ्तरों को बेहतर बनाने और कर्मचारियों के लिए भी बेहतर क्षमता वाले लोगों की जरूरत होगी।’
मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) रणनीतिक एआई क्षेत्रों में सहयोग का भी प्रस्ताव करता है, जिसमें लार्ज लैंग्वेज मॉडल, बहुभाषी प्राकृतिक भाषा डेटासेट, एआई प्रशिक्षण डेटा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि और जलवायु कदमों जैसे सार्वजनिक वस्तुओं के लिए एआई समाधान शामिल हैं, साथ ही एआई सुरक्षा, परीक्षण और मूल्यांकन पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में, भारत और यूरोप मिलकर काम करेंगे। दोनों देश संयुक्त रूप से शोध एवं विकास, पर जोर देने के साथ प्रतिभा और कौशल का पारस्परिक आदान-प्रदान करेंगे और चिप बनाने, उसकी पैकेजिंग तथा रणनीतिक आपूर्ति-श्रृंखला साझेदारी के लिए सहयोग वाला ढांचा तैयार करेंगे।
इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स ऐंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक चांडक ने एक बयान में कहा, ‘यूरोप से आने वाली महंगी मशीनों और कलपुर्जे पर कर कम होने से भारत में सेमीकंडक्टर चिप बनाने के कारखानों को कम खर्च में बेहतर चिप बनाने में मदद मिलेगी जिससे वो दुनिया के बाकी कारखानों से अच्छी तरह मुकाबला कर पाएंगे।’
छात्रों के लिए भी, एफटीए अच्छी खबर लेकर आया है। समझौते में यूनियन ऑफ स्किल्स, इरास्मस+ (जिसमें इरास्मस मुंडस जॉइंट मास्टर प्रोग्राम शामिल है), और मैरी स्कोडोव्स्का-क्यूरी एक्शन्स (एमएससीए) जैसी पहलों के माध्यम से छात्रों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं की एक-दूसरे के देश में आसानी से आवाजाही हो सकेगी। साथ ही भारतीय फंडिंग कार्यक्रम, जैसे कि स्कीम फॉर प्रमोशन ऑफ एकेडमिक ऐंड रिसर्च कोलैबोरेशन (स्पार्क) भी शामिल है।
विदेशी उच्च शिक्षा परामर्श संस्था यूनिवर्सिटी लिविंग के सह-संस्थापक और मुख्य परिचालन अधिकारी (सीओओ) मयंक माहेश्वरी ने कहा कि भारतीय छात्रों के लिए बिना किसी सीमा के यूरोप में पढ़ाई करने के अवसर बढ़ने से, अब उनके पास पहले से अधिक विकल्प होंगे। इससे यूरोप भी पढ़ाई के लिए अमेरिका और कनाडा जैसे देशों की तरह ही एक अच्छा विकल्प बन जाएगा।
उन्होंने कहा, ‘छात्र अब पढ़ाई से जुड़ी योजना बनाते वक्त काफी सोचते हैं और वे किसी देश के सिर्फ नाम पर ही नहीं जाते बल्कि ये भी देखते हैं कि वहां का अनुभव कैसा होगा, माहौल कितने अच्छे से समझ आएगा और आगे क्या फायदा होगा। इस संदर्भ में देखें तो यूरोप में अच्छी पढ़ाई होती है और फीस भी ज्यादा नहीं होती। साथ ही, वहां कई देशों में पढ़ाई और काम करने के मौके मिलते हैं, जिससे छात्रों को सिर्फ एक शहर या कॉलेज तक सीमित नहीं रहना पड़ता।’