Economic Survey 2026: संसद में पेश इकोनॉमिक सर्वे में सरकार ने यूरिया की कीमत को लेकर अहम सुझाव दिया है। सर्वे में कहा गया है कि यूरिया की खुदरा कीमत में थोड़ी बढ़ोतरी की जाए और उतनी ही राशि सीधे किसानों के बैंक खाते में प्रति एकड़ के हिसाब से दी जाए। इससे किसानों पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और यूरिया के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल पर रोक लगेगी, जो मिट्टी की सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है।
इकोनॉमिक सर्वे साफ तौर पर बताता है कि जब कोई एक खाद बहुत सस्ती होती है, तो उसका ज्यादा इस्तेमाल अपने आप बढ़ जाता है, चाहे उस पर कितनी ही सख्त निगरानी क्यों न हो। पिछले 10 साल से यूरिया के दाम नहीं बढ़ाए गए हैं, जिसकी वजह से यह देश की सबसे सस्ती खाद बन गई है। इसी कारण किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसका सीधा असर सरकार की खाद सब्सिडी पर पड़ रहा है। इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में खाद सब्सिडी बढ़कर करीब 1.91 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। इतना ही नहीं, चालू साल में यूरिया की खपत भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की आशंका है और यह आंकड़ा करीब 4 करोड़ टन तक जा सकता है।
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इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि किसानों की आय को खाद की खरीद से अलग किया जाना चाहिए, ताकि खाद के दाम अपनी असली कीमत का सही संकेत दे सकें। इससे जो किसान पहले से ही सही मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें सीधा फायदा होगा, क्योंकि उनका खर्च कम रहेगा और उन्हें पूरी सरकारी मदद भी मिलती रहेगी। वहीं, जो किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया डालते हैं, उनके लिए यह एक साफ संदेश होगा कि अब संतुलित खाद का इस्तेमाल जरूरी है। ऐसे किसानों को मिट्टी जांच, नैनो यूरिया, तरल खाद और जैविक खाद जैसे बेहतर विकल्पों की ओर बढ़ना पड़ेगा। इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, देश की डिजिटल खेती व्यवस्था अब इतनी मजबूत हो चुकी है कि इस तरह के सुधार को जमीन पर उतारना संभव है।
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इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, साल 2026 में खेती और उससे जुड़े कामों की बढ़त करीब 3.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो सामान्य रफ्तार से कम है। रिपोर्ट कहती है कि खेती की यह धीमी चाल मौसम की वजह से नहीं, बल्कि खेती से जुड़ी पुरानी समस्याओं के कारण है।
हालांकि, पशुपालन और मछली पालन जैसे काम 5 से 6 प्रतिशत की अच्छी रफ्तार से बढ़ रहे हैं। रबी की फसल की बुआई भी ठीक रही है, जलाशयों में पानी भरपूर है और इससे किसानों की कमाई बढ़ने और गांवों में खरीदारी बनी रहने की उम्मीद है।
इकोनॉमिक सर्वे ने यह भी कहा है कि ‘खेत से थाली तक’ की नीति अपनानी चाहिए और राशन सिस्टम में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। इससे हर साल करीब 250 करोड़ रुपये की बचत हो रही है।