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भारतीय शहरों की सुस्त रफ्तार पर इकोनॉमिक सर्वे की दो टूक: ट्रैफिक और महंगे मकान बन रहे विकास में रोड़ा

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इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि शहरों की चुनौतियों को हल करने के लिए बुनियादी ढांचे सुधारें और नागरिक चेतना बढ़ाएं ताकि अधूरी संभावनाओं को पूरा किया जा सके

Last Updated- January 29, 2026 | 4:52 PM IST
urban cities
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारत के शहर न तो पूरी तरह नाकाम हो रहे हैं और न ही सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है। ये शहर एक ऐसी अधूरी संभावना की तस्वीर पेश करते हैं, जहां बहुत कुछ हो सकता है लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी है। इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में गुरुवार को संसद में पेश इस बात को साफ तौर पर रखा गया है।

सर्वे के अनुसार, भारतीय शहरों में रोज की जिंदगी में कई तरह की मुश्किलें हैं। लंबी-लंबी यात्राएं, काम में असमानता और सार्वजनिक जगहों पर भीड़भाड़ जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। इन दिक्कतों की जड़ में जमीन, मकान और आवागमन जैसी बुनियादी चीजों की सप्लाई में लगातार रुकावटें हैं।

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मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

सर्वे में कहा गया है कि शहरों में घनत्व को सीमित रखने वाली नीतियां, जमीन के मालिकाना हक में कन्फ्यूजन और पुरानी जमीन का दोबारा इस्तेमाल न होना, ये सब मिलकर सस्ते घर बनाना मुश्किल बना रहे हैं। साथ ही, ट्रांसपोर्ट सिस्टम ज्यादातर निजी गाड़ियों पर टिका हुआ है, जिससे ट्रैफिक जाम और प्रदूषण बढ़ता जा रहा है।

पानी, सफाई और कचरा प्रबंधन जैसी बेसिक सेवाओं में पिछले कुछ सालों में काफी इजाफा हुआ है। लेकिन अब इन सेवाओं को सिर्फ फैलाने से आगे बढ़ना होगा। इन्हें ज्यादा भरोसेमंद, रिसाइक्लिंग पर आधारित और कुशल बनाना जरूरी है।

शहरों के कामकाज के पीछे एक बड़ी दिक्कत ये है कि महानगरों का प्रशासन फैलाव वाला है और शहरों को अपनी योजना बनाने, पैसे जुटाने और काम करने की पूरी आज़ादी नहीं मिलती।

सर्वे ने एक और अहम बात कही है कि शहरों की अच्छी जिंदगी सिर्फ बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं बनती। इसमें नागरिकों का व्यवहार, सार्वजनिक जगहों के प्रति जिम्मेदारी और सम्मान भी उतना ही जरूरी है। बेहतर संस्थाओं के साथ-साथ लोगों में नागरिक चेतना जगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, ताकि शहर सिर्फ काम चलाऊ न लगें बल्कि रहने में अच्छे और स्वागत करने वाले महसूस हों।

दुनिया में देखें तो कुछ ही बड़े महानगर वैश्विक स्तर पर उत्पादन, फाइनेंस, लॉजिस्टिक्स और नॉलेज के हब बन पाते हैं। भारत की आर्थिक ताकत काफी बड़ी है, लेकिन उसके शहर अभी न्यूयॉर्क, लंदन, शंघाई या सिंगापुर जैसे स्थापित वैश्विक शहरों की कतार में नहीं आ पा रहे।

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First Published - January 29, 2026 | 4:44 PM IST

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