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Economic Survey में स्मार्टफोन की लत को बताया ‘बड़ी मुसीबत’, कहा: इससे बच्चों-युवाओं में बढ़ रहा तनाव

सर्वे ने बढ़ती डिजिटल लत पर चिंता जताई है और कहा है कि बच्चों की मानसिक सेहत बचाने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर उम्र की जांच और स्क्रीन टाइम की लिमिट पर लगाम जरूरी है

Last Updated- January 29, 2026 | 4:08 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

आज के दौर में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया हर किसी की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन ये एक बड़ी समस्या भी पैदा कर रहे हैं। गुरुवार को संसद में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने डिजिटल एडिक्शन को एक तेजी से बढ़ती मुसीबत बताया है। ये सर्वे कहता है कि ये लत न सिर्फ युवाओं बल्कि बड़े लोगों के दिमागी स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रही है। पढ़ाई में पिछड़ना, काम की जगह पर कम प्रोडक्टिविटी और मानसिक तनाव जैसी दिक्कतें इससे जुड़ी हैं। सर्वे में ऑस्ट्रेलिया, चीन और साउथ कोरिया जैसे देशों के कदमों का जिक्र करते हुए भारत में भी कई तरह के कदम उठाने की बात कही गई है। साथ ही, सरकार के अलग-अलग विभागों की कोशिशों को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

सर्वे के मुताबिक, छोटे बच्चों और युवाओं को इस लत से ज्यादा खतरा है क्योंकि वे आसानी से फंस जाते हैं और गलत चीजें देखने लगते हैं। इसलिए, उम्र के हिसाब से ऐप्स और प्लेटफॉर्म्स पर रोक लगाने के नियम बनाने चाहिए। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को खुद ही उम्र की जांच करने और बच्चों के लिए सही सेटिंग्स रखने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। खासकर सोशल मीडिया, जुआ वाले ऐप्स, ऑटो-प्ले वाली वीडियो और विज्ञापनों पर नजर रखनी होगी।

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परिवार और स्कूलों से शुरू हो बदलाव

सर्वे में परिवारों को जागरूक बनाने पर खास ध्यान दिया गया है। माता-पिता को सलाह दी गई है कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर काबू रखें, कुछ घंटे बिना फोन के गुजारें और साथ में बाहर की एक्टिविटी करें। स्कूलों में वर्कशॉप चलाकर अभिभावकों को ट्रेनिंग दी जाए। इसमें लत के संकेत पहचानना, सीमाएं तय करना और पैरेंटल कंट्रोल टूल्स इस्तेमाल करने जैसे टिप्स शामिल हों।

बच्चों के लिए फैंसी गैजेट्स की बजाय सिंपल डिवाइसेस को बढ़ावा देने की सलाह दी गई है। जैसे कि बेसिक फोन या सिर्फ पढ़ाई वाली टैबलेट्स, जहां समय की लिमिट हो और कंटेंट फिल्टर लगा हो। इससे हिंसा, सेक्स या जुआ जैसी बुरी चीजों से बचाव होगा। साथ ही, इंटरनेट कंपनियों को भी इसमें शामिल करना चाहिए। वे फैमिली पैकेज बना सकते हैं, जहां पढ़ाई वाले ऐप्स के लिए अलग डेटा हो और बाकी मनोरंजन वाले ऐप्स पर कम। हाई-रिस्क वाली कैटेगरी को खुद ही ब्लॉक कर दें, और माता-पिता चाहें तो इसे बदल सकें।

रिसर्च बताती है कि सोशल मीडिया की लत से चिंता, उदासी, खुद पर कम भरोसा और ऑनलाइन बदमाशी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। भारत और दुनिया भर के स्टडीज में 15 से 24 साल के युवाओं में ये बहुत आम है। लगातार स्क्रॉल करना और दूसरों से तुलना करने से तनाव होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गेमिंग डिसऑर्डर को बीमारियों की लिस्ट में डाला है। ये वो हालत है जब कोई गेमिंग पर काबू नहीं रख पाता, इसे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी चीज बना लेता है और बुरे नतीजों के बावजूद नहीं रुकता। इससे नींद खराब होना, गुस्सा, अकेलापन और उदासी जैसी दिक्कतें आती हैं, खासकर टीनएजर्स में।

ऑनलाइन जुआ और रियल मनी गेम्स से पैसे का नुकसान, तनाव, चिंता और कभी-कभी खुदकुशी के ख्याल तक आ जाते हैं। इसी तरह, स्ट्रीमिंग और शॉर्ट वीडियो की आदत से नींद की कमी, ध्यान भटकना और ज्यादा स्ट्रेस होता है। कुल मिलाकर, डिजिटल लत कई रूपों में सेहत को नुकसान पहुंचा रही है। सर्वे ये सब देखते हुए बड़े स्तर पर कदम उठाने की बात करता है।

First Published - January 29, 2026 | 3:43 PM IST

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