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Budget 2026: ‘2047 तक सबके लिए बीमा’ को पूरा करने के लिए इंश्योरेंस सेक्टर की प्रमुख मांगे क्या हैं?

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एक्सपर्ट्स ने बजट 2026 में इंश्योरेंस सेक्टर में टैक्स छूट की सीमा बढ़ाने, GST दरों को तर्कसंगत बनाने और रेगुलेटरी में बड़े सुधार की उम्मीद जताई है

Last Updated- January 29, 2026 | 8:23 PM IST
insurance sector
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

बजट 2026 की आहट के साथ ही इंश्योरेंस सेक्टर एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सरकार ने ‘2047 तक सबके लिए बीमा’ का लक्ष्य रखा है। लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि प्रीमियम सस्ता होगा या टैक्स में राहत मिलेगी, बल्कि यह भी है कि क्या यह बजट भारत की भविष्य की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की मजबूत नींव रख पाएगा। बढ़ती महंगाई, स्वास्थ्य खर्च और जीवन की अनिश्चितताओं के बीच इंश्योरेंस अब केवल एक पॉलिसी नहीं, बल्कि भरोसे और सुरक्षा का अहम जरिया बनता जा रहा है।

इसी के चलते इंश्योरेंस इंडस्ट्री के दिग्गजों की नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। टैक्स छूट, GST ढांचे में बदलाव, रेगुलेटरी सुधार और ग्रामीण इलाकों तक पहुंच जैसे कई अहम मुद्दे हैं, जिनसे इस बजट से बड़ी उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर सरकार ने सही दिशा में फैसले लिए, तो इससे न सिर्फ इंश्योरेंस की पहुंच बढ़ेगी, बल्कि आम लोगों, छोटे कारोबारियों और किसानों के लिए सुरक्षा का दायरा भी मजबूत होगा। बजट 2026 से यही अपेक्षा है कि वह इंश्योरेंस सेक्टर को देश की लंबी आर्थिक यात्रा का भरोसेमंद साथी बना सके।

टैक्स छूट और स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स पर हो जोर

ग्रैंट थॉर्नटन भारत के पार्टनर और इंश्योरेंस इंडस्ट्री लीडर, नरेंद्र गणपुले का मानना है कि बजट में ऐसे नियम होने चाहिए जो देश की भलाई और इस सेक्टर की बढ़ोतरी को रफ्तार दें। उन्होंने कुछ जरूरी चीजों पर प्रकाश डाला है:

1. हेल्थ इंश्योरेंस और सेक्शन 80D की सीमा

गणपुले के अनुसार, इलाज का खर्च (Medical costs) लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80D के तहत मिलने वाली 25,000 रुपये की कटौती की सीमा कई सालों से स्थिर है। वे सुझाव देते हैं कि अब इस सीमा को बढ़ाकर 50,000 रुपये करने का ठोस आधार है। साथ ही, सरकार को नियमित अंतराल पर इस सीमा की समीक्षा करते रहना चाहिए ताकि यह बढ़ती महंगाई के साथ तालमेल बिठा सके।

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2. टर्म इंश्योरेंस के लिए अलग प्रोत्साहन

भारत में आज भी बहुत बड़ी आबादी के पास लाइफ इंश्योरेंस का सही सुरक्षा कवर नहीं है। रिपोर्ट्स के मुताबिक देश में करीब 17 ट्रिलियन डॉलर का मॉर्टलिटी प्रोटेक्शन गैप (मृत्यु सुरक्षा अंतर) है, यानी जरूरत के मुकाबले सुरक्षा बहुत कम है और लगभग 83% जरूरतें अब भी अधूरी हैं।

गणपुले का कहना है कि जैसे हेल्थ इंश्योरेंस पर टैक्स छूट मिलती है, वैसे ही टर्म इंश्योरेंस जैसे प्लान के लिए भी अलग से टैक्स छूट दी जानी चाहिए। इससे लोग सिर्फ निवेश के लिए नहीं, बल्कि अपने और परिवार की सुरक्षा के लिए इंश्योरेंस लेने के लिए तैयार होंगे।

3. GST और प्रीमियम की लागत

इंश्योरेंस कंपनियां चाहती हैं कि सेक्टर को सिर्फ GST से छूट देने के बजाय ‘जीरो-रेटेड’ का दर्जा मिले। गणपुले बताते हैं कि इससे कंपनियां अपने रोजमर्रा के खर्चों पर दिए गए टैक्स का इनपुट टैक्स क्रेडिट ले सकेंगी और उसका बोझ प्रीमियम में नहीं जोड़ा जाएगा। हालांकि सरकार और कुछ राज्यों का मानना है कि जीरो-रेटिंग के बजाय अगर 5% का GST स्लैब लगाया जाए, तो भी कंपनियों को ITC का फायदा मिलेगा और इससे ग्राहकों को चुकाना पड़ने वाला प्रीमियम आखिरकार कम हो सकता है।

4. दूरगामी सुधार: कंपोजिट लाइसेंसिंग

गणपुले के मुताबिक इंश्योरेंस सेक्टर की लंबी ग्रोथ के लिए दो बड़े ढांचागत सुधार बेहद जरूरी हैं। पहला है कंपोजिट लाइसेंसिंग और दूसरा डिस्ट्रीब्यूशन में ओपन आर्किटेक्चर। उनका कहना है कि इन बदलावों से कंपनियां एक ही लाइसेंस के तहत लाइफ और जनरल इंश्योरेंस दोनों तरह की सेवाएं दे सकेंगी, जिससे सेक्टर की असली क्षमता सामने आएगी और ग्राहकों को भी ज्यादा सुविधाएं मिलेंगी।

5. अर्थव्यवस्था का आधार: इंश्योरेंस

नरेंद्र गणपुले बताते हैं कि देश की लाइफ इंश्योरेंस इंडस्ट्री करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति संभाल रही है, जिसमें से लगभग 45 फीसदी पैसा सरकारी बॉन्ड्स में लगाया जाता है। यही फंड सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरी कल्याणकारी योजनाओं के काम आता है। इसके अलावा इंश्योरेंस सेक्टर आपदा के समय MSMEs को संभलने में मदद करता है और कारोबारियों को बिना डर के नए जोखिम लेने का भरोसा भी देता है।

पहुंच और रेगुलेटरी हो आसान

आनंद राठी इंश्योरेंस ब्रोकर्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, प्रदीप फुंडे ने बजट 2026 के नीतिगत सुधारों और वित्तीय प्रोत्साहनों पर विस्तार से अपनी राय रखी है:

1. न्यू टैक्स रिजीम और इंश्योरेंस का आकर्षण

प्रदीप फुंडे के मुताबिक बजट 2026 में सरकार को 80C और 80D के तहत मिलने वाली टैक्स छूट को नए टैक्स सिस्टम में भी शामिल करने पर विचार करना चाहिए। उनका कहना है कि इससे लोग सिर्फ टैक्स बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी जरूरत और सुविधा के हिसाब से इंश्योरेंस लेने को प्रेरित होंगे। अगर ऐसा होता है, तो इससे देश में इंश्योरेंस की पहुंच बढ़ाने में बड़ा फर्क पड़ सकता है।

2. रेगुलेटरी फ्रेमवर्क और कंपोजिट लाइसेंस

प्रदीप फुंडे भी नरेंद्र गणपुले की तरह कंपोजिट लाइसेंस को जरूरी मानते हैं। उनका कहना है कि अगर एक ही लाइसेंस में लाइफ, हेल्थ और जनरल इंश्योरेंस की अनुमति मिलती है, तो कंपनियों का कामकाज ज्यादा आसान और प्रभावी होगा। इससे अलग-अलग प्रोडक्ट्स बेचना भी सरल होगा और इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पहले से ज्यादा मजबूत बन सकेगा।

3. माइक्रो-इंश्योरेंस और ग्रामीण पहुंच

उम्मीद की जा रही है कि बजट में सूक्ष्म इंश्योरेंस (Micro-insurance) और ग्रामीण इलाकों के लिए इंश्योरेंस वाहक जैसी योजनाओं को खास बढ़ावा मिलेगा। इसके साथ ही MSMEs के लिए सरकार की मदद से चलने वाली इंश्योरेंस योजनाएं उन लोगों को भी इंश्योरेंस से जोड़ सकती हैं, जो पहली बार इंश्योरेंस लेने जा रहे हैं। इससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को सुरक्षा कवर मिलेगा और देश में वित्तीय समावेश (Financial Inclusion) को मजबूती मिलेगी।

4. निवेशकों और इंश्योरटेक (Insurtech) पर प्रभाव

बजट 2026 निजी इंश्योरेंस कंपनियों और इंश्योरटेक स्टार्टअप्स के लिए नए अवसर खोल सकता है। प्रदीप फुंडे के मुताबिक, अगर कंपनियों के लिए प्रवेश नियम आसान हों और पूंजी के नियम लचीले बनाए जाएं, तो इससे इनोवेशन को बल मिलेगा। इसके साथ ही, विदेशी निवेशकों के लिए FDI सीमा बढ़ाना और अप्रूवल प्रक्रिया सरल बनाना भारत को लंबे समय तक निवेश के लिए और भी आकर्षक और भरोसेमंद बाजार बना देगा।

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सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की सुरक्षा

दोनों एक्सपर्ट का मानना है कि इंश्योरेंस केवल एक फाइनेंशियल प्रोडक्ट नहीं है, बल्कि यह देश में एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा ढांचा भी है।

  • जलवायु जोखिम: भारत में 26 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की संपत्ति प्राकृतिक आपदाओं के खतरे में है। नरेंद्र गणपुले बताते हैं कि इंश्योरेंस कंपनियां अब ‘पैरामीट्रिक इंश्योरेंस’ का विस्तार कर रही हैं। इसमें नुकसान का पता लगाने के लिए लंबा सर्वे नहीं करना पड़ता, बल्कि मौसम के डेटा के आधार पर तुरंत भुगतान किया जाता है। इससे किसानों और आपदा प्रभावित इलाकों में फौरन नकदी पहुंचती है।

  • वित्तीय समावेश (Financial inclusion): देश में सभी के लिए सामाजिक कल्याण प्रणाली न होने के कारण, इंश्योरेंस प्रोडक्ट अनौपचारिक श्रमिकों और कम आय वाले लोगों को स्वास्थ्य और जीवन सुरक्षा देकर इस कमी को पूरा करते हैं।

दोनों एक्सपर्ट का कहना है कि बजट 2026 सरकार के लिए इंश्योरेंस सेक्टर को मजबूत बनाने का एक बड़ा मौका पेश करता है। टैक्स में रियायतें, GST में बदलाव और रेगुलेटरी ढांचे को सरल बनाना ऐसे कदम हैं जो भारत में इंश्योरेंस की पहुंच को वैश्विक स्तर तक ले जा सकते हैं। अगर सही तरीके से काम होता है, तो आने वाला दशक देश की इंश्योरेंस इंडस्ट्री के लिए स्वर्णिम युग साबित हो सकता है।

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First Published - January 29, 2026 | 8:23 PM IST

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