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Editorial: विकास के मजबूत संकेत, वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सुधारों पर जोर

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समीक्षा की व्यापकता और गहराई में विस्तार अधिक जानकारीपरक नीतिगत चर्चाओं को सक्षम बनाएगा और भारत को उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर तैयारी करने में मदद करेगा

Last Updated- January 29, 2026 | 10:19 PM IST
Economic survey 2025-26

वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा गुरुवार को संसद में पेश की गई। इस समीक्षा को वित्त मंत्रालय के अर्थशास्त्रियों ने मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन के नेतृत्व में तैयार किया है और यह हाल की अन्य समीक्षाओं की तुलना में नए सिरे से व्यवस्थित की गई है। जैसा कि समीक्षा में कहा गया है, यह ‘अन्य जगहों पर हो रहे महत्त्वपूर्ण बदलावों के भार को भी दर्शाता है।’ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों और भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में हुए बदलावों ने वास्तव में अनिश्चितता में इजाफा किया है और मध्यम अवधि के आर्थिक परिणाम इस बात पर निर्भर होंगे कि ये घटनाक्रम किस प्रकार विकसित होते हैं।

समीक्षा की व्यापकता और गहराई में विस्तार अधिक जानकारीपरक नीतिगत चर्चाओं को सक्षम बनाएगा और भारत को उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर तैयारी करने में मदद करेगा। समीक्षा में तीन ऐसे विषयों पर भी चर्चा शामिल है जो मध्यम से दीर्घकालिक रुचि के हैं। ये हैं- आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का विकास, भारतीय शहरों में जीवन की गुणवत्ता की चुनौती तथा रणनीतिक लचीलापन पाने में राज्य की क्षमता तथा निजी क्षेत्र की भूमिकाएं।

चालू वित्त वर्ष पहले लगाए गए अनुमानों की तुलना में कहीं अधिक बेहतर साबित हो रहा है। पहले अग्रिम अनुमानों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.4 फीसदी है जो गत वर्ष की आर्थिक समीक्षा में जताए गए 6.3 से 6.8 फीसदी की तुलना में बेहतर है। नवीनतम समीक्षा में कहा गया है कि देश की संभावित वृद्धि दर संशोधित करके 7 फीसदी तक कर दिया गया है, जबकि तीन साल पहले यह 6.5 फीसदी था।

इसने 2026-27 में वृद्धि दर के 6.8 से 7.2 फीसदी के बीच रहने का अनुमान जताया है। वृद्धि के अनुमान में यह इजाफा संकेत करता है कि हाल के वर्षों में जिन सुधारों को अंजाम दिया गया है और सरकार के पूंजीगत व्यय में जो इजाफा हुआ है उसने अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता में बढ़ोतरी की है। अल्पावधि में इसके परिणाम वैश्विक कारकों पर निर्भर करेंगे और इसकी अलग-अलग संभावनाएं हैं।

हालांकि समीक्षा में कहा गया है कि भारत अपनी वृहद अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती के कारण अन्य देशों की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर हालत में है। परंतु यह सुरक्षा की गारंटी नहीं है। विपरीत वैश्विक झटके बाहरी खाते में नजर आएंगे और उनका प्रभाव रुपये पर नजर आएगा। बीते कई महीनों से रुपया दबाव में है क्योंकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक शेयर बाजार में बिकवाली कर रहे हैं।

भारत के लिए वैश्विक उथल-पुथल का जोखिम इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यहां चालू खाते का घाटा है जिससे निपटने के लिए विदेशी निवेश आकर्षित करने की जरूरत होती है। इस बारे में समीक्षा ने सही कहा है कि भारत को निवेशकों को अपनी ओर आकृष्ट करना होगा और निर्यात आय बढ़ानी होगी। व्यापार के प्रति भारत का हालिया खुलापन इस दृष्टि से एक सकारात्मक पहल है, और यह देखना रोचक होगा कि आगामी बजट इस मुद्दे को किस प्रकार संबोधित करता है।

समीक्षा में कई रोचक तर्क प्रस्तुत किए गए हैं जिनके मध्यम अवधि के लिए नीतिगत निहितार्थ हैं। उदाहरण के लिए, उल्लेख किया गया है कि जहां शुरुआती कच्चे माल महंगे और पूंजी केंद्रित होते हैं, वहां आयात संरक्षण बढ़ाने की बजाय पूंजी की लागत कम करना अधिक प्रभावी तरीका है। हालांकि ऐसी अर्थव्यवस्था में पूंजी की लागत कम करना आसान नहीं है जो संरचनात्मक रूप से बचत की कमी का सामना कर रही हो, और जहां राजकोषीय रूप से उदार नीतियों के लिए राजनीतिक प्रोत्साहन मौजूद हों। ऐसे में दो स्पष्ट नीतिगत निष्कर्ष सामने आते हैं।

पहला, अर्थव्यवस्था में पूंजी की लागत कम करने के लिए सामान्य सरकारी बजट घाटे को पर्याप्त रूप से घटाना आवश्यक है। समीक्षा में उल्लेख है कि केंद्र ने अधिक पूंजीगत व्यय के साथ समेकन हासिल किया है, जबकि कई राज्यों ने कमजोर राजकोषीय अनुशासन दिखाया है। यद्यपि राज्य इस स्थिति पर आपत्ति कर सकते हैं, लेकिन भारत को वास्तव में अपनी वित्तीय नियमों को अर्थव्यवस्था की वित्तपोषण क्षमता के अनुरूप समायोजित करने की आवश्यकता है। यह उस समय और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है जब वैश्विक बचत की उपलब्धता पर जोखिम है और इसकी लागत भी अधिक होने की संभावना है। दूसरा, आयात संरक्षण को कम करने की जरूरत है।

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First Published - January 29, 2026 | 9:58 PM IST

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