मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने भरोसा जताया है कि घरेलू सुधारों के दम पर हमारी अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2027 में 6.8 से 7.2 फीसदी दर के साथ आगे बढ़ेगी। उन्होंने आर्थिक समीक्षा पेश किए जाने के बाद संवाददाताओं से बातचीत की। रुचिका चित्रवंशी और उदिशा श्रीवास्तव द्वारा संपादित अंश:
भारत की संभावित वृद्धि दर को 6.5 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी करने पर:
अनिश्चित भू-राजनीतिक माहौल के बावजूद यह समीक्षा पूरे आत्मविश्वास के साथ भारत की संभावित वृद्धि दर को 7 फीसदी तक बढ़ाती है। विशेष रूप से कोविड के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था और नीति निर्माताओं के प्रदर्शन को देखते हुए ऐसा संभव लगता है। हालांकि भू-राजनीतिक जोखिम, जिंस कीमतें आदि कारक कुछ समय के लिए गणना को पटरी से उतार सकते हैं, लेकिन मध्यावधि रुझान को देखते हुए हमें लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर अब 7 फीसदी है।
अगर हम विनिर्माण एवं निर्यात में प्रतिस्पर्धा हासिल करते हैं और भूमि एवं लागत सब्सिडी में सुधार के साथ-साथ विनिर्माण की लागत को कम करने में सक्षम होते हैं, तो अगले कुछ वर्षों में वृद्धि दर 7.5 से 8 फीसदी तक बढ़ सकती है। हमें लगता है कि भारतीय लोग विकसित भारत की राह पर अगले 25 वर्षों में हर दिन असंभव को संभव कर दिखाएंगे।
समय बीतने के साथ-साथ विकसित भारत महज प्रति व्यक्ति आय या जीडीपी का आंकड़ा ही नहीं रह जाएगा। विकसित भारत को इस संदर्भ में देखा जाएगा कि क्या वर्तमान पीढ़ी को लगता है कि वह पिछली पीढ़ी से बेहतर कर रही है और क्या उन्हें विश्वास है कि उनकी भावी पीढ़ी बेहतर करेगी।
रुपया और विदेशी निवेश प्रवाह में नरमी पर:
बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता का देश के लिए नतीजा पूंजी खाते पर प्रभाव है। इसलिए उभरते बाजार और पूंजी आयातक देश के रूप में मुद्रा पर भी उसका असर दिखता है। भारत का सकल एफडीआई बहुत अच्छी तरह से बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2026 में सकल एफडीआई इससे पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 10 फीसदी अधिक है। मगर शुद्ध एफडीआई एक कमजोर पक्ष पर रहा है। ऐसा मुख्य तौर पर उन निवेशकों द्वारा मुनाफावसूली के कारण दिखता है जिन्होंने पिछले दशकों में निवेश किया है।
एक कारण यह भी है कि भारतीय कारोबारियों को विदेश में निवेश करने की बाध्यता जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसलिए भारतीय कारोबारियों द्वारा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश भी बढ़ा है। परिणामस्वरूप शुद्ध एफडीआई का आंकड़ा उतना नहीं है जितना हम चाहते हैं, मगर वह चिंताजनक भी नहीं है।
पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी के भी कई कारण हैं। टैरिफ स्थिति के कारण पैदा हुई अनिश्चितता भी उन्हें भारतीय बाजार में अधिक निवेश करने से रोक रही है। मगर जब धारणा कमजोर होती है तो भविष्य में संभावित रिटर्न की गुंजाइश सबसे बेहतर होती है। जहां तक रुपये का सवाल है तो वह चालू खाते के घाटे को पूरा करने के लिए आयातित पूंजी पर निर्भर करता है।
अगर पूंजी प्रवाह कमजोर हो जाता है तो स्वाभाविक तौर पर मुद्रा में उसकी झलक दिखती है। पिछले एक साल के दौरान हमने ऐसा ही देखा है जब डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 6-7 फीसदी कमजोर हुआ। बुनियादी बातें दमदार होने के बावजूद ऐसा हुआ है। विकसित जगत में ब्याज दरें शून्य के करीब से बढ़कर 4-5 फीसदी तक पहुंच गई हैं। इसलिए विदेश में निवेश करने की लागत अधिक है। रुपये में भी इसकी झलक दिखती है।
उपभोग और वृद्धि को बढ़ावा देने के उपायों पर:
वृद्धि उपभोग को रफ्तार देने वाला एक महत्त्वपूर्ण कारक है। सरकार ने आयकर बोझ और जीएसटी स्लैब को कम कर दिया है। इससे सुनिश्चित हुआ है कि मौद्रिक एवं राजकोषीय दोनों नीतियां महंगाई को नियंत्रित करने में योगदान करते हैं। इससे लोगों की क्रय शक्ति बढ़ती है। खर्च करने लायक आय और क्रय शक्ति में वृद्धि होने के कारण उपभोग में वृद्धि उच्च स्तर पर बनी हुई है।
इसे मुख्य तौर पर खर्च करने लायक आय और रोजगार में लगातार हो रही वृद्धि से रफ्तार मिल रही है। यही कारण है कि श्रम कानूनों की अधिसूचना और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले तमाम उपायों से रोजगार सृजन होता है। इससे आय में इजाफा होगा और क्रय शक्ति एवं उपभोग में बृद्धि होगी। इस प्रकार आर्थिक चक्र चलता रहेगा।
सार्वजनिक पूंजीगत व्यय बढ़ाने की सीमाओं पर:
यह समझना जरूरी है कि भारत का सकल स्थिर पूंजी निर्माण बनाम सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुपात लगभग 30 फीसदी है और यह पूरी तरह सार्वजनिक क्षेत्र के कारण नहीं है। निजी क्षेत्र का पूंजी निर्माण उस स्तर पर नहीं हो सकता है जो हमने 2003 से 2008 के बीच वृद्धि दर के मामले में देखा था। यही कारण है कि हम उस दौर में दर्ज 8.5 से 9 फीसदी की वृद्धि पर वापस नहीं जा रहे हैं। निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र के मौजूदा पूंजी निर्माण स्तर के मद्देनजर 7 फीसदी की वृद्धि संभव है।
कंपनी जगत के अधिक मुनाफे और कम वेतन वृद्धि संबंधी चिंताओं पर:
आंकड़े उत्साहजनक हैं। मगर सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि श्रम संहिताओं से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि श्रमिकों के अधिकारों और नियोक्ताओं द्वारा पूछे जाने वाले सवालों के बीच एक संतुलन होना चाहिए। इसलिए श्रम संहिताएं यह सुनिश्चित करने के लिए अपना काम करेंगी कि वेतन वृद्धि और लाभ वृद्धि वास्तव में लाभप्रदता वृद्धि के अनुरूप हों। यह एक महत्त्वपूर्ण बात है जो हमारी पिछली समीक्षा लिखे जाने के बाद दिखी है।