अमेरिकी सरकार समय-समय पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक दस्तावेज जारी करती रहती है। इस दस्तावेज में राष्ट्रीय सुरक्षा अक्षुण्ण रखने के लिए नीतियों का जिक्र होता है। दुनिया के कई देश ऐसा करते हैं। भारत इस मामले में एक अपवाद है क्योंकि उसने पिछले कुछ समय से रक्षा पर श्वेत पत्र लाने या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक व्यापक रणनीति पर सार्वजनिक चर्चा की अवधारणा से दूरी बनाए रखी है।
मौजूदा अमेरिकी प्रशासन ने पिछले सप्ताह राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस 2025) जारी की थी। मौजूदा सरकार द्वारा पेश इस दस्तावेज में फायदे और नुकसान दोनों पहलू दिखाई देते हैं। सबसे पहले तो ये (दस्तावेज) सुरक्षा रणनीति के अंतर्निहित राजनीतिक उद्देश्यों और सोच में बदलाव को लेकर अत्यधिक स्पष्टता प्रदान कर सकते हैं। ऐसे दस्तावेज राजनयिक और आधिकारिक सूचनाओं एवं अन्य आधिकारिक बयानों की निम्न-स्तरीय चर्चा से अलग होते है।
राजनयिक स्तर पर बातचीत एवं आधिकारिक सूचनाओं में एक सुसंगत भू-राजनीतिक दृष्टिकोण के बजाय तात्कालिक घटनाक्रम या विशिष्ट उच्च-स्तरीय यात्राओं से जुड़ी प्रतिक्रियाएं शामिल होती हैं। मगर दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े ऐसे दस्तावेज में किसी देश के पिछले कार्यों के प्रति दूसरे देशों का नजरिया बदल देते हैं और भविष्य को लेकर नया दृष्टिकोण पेश करते हैं।
अमेरिका का एनएसएस 25 दस्तावेज को असामान्य और एक वैचारिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। संभवतः ऐसा इसलिए है क्योंकि अन्य लोकलुभावन सरकारों की तरह मौजूदा अमेरिकी प्रशासन भी यह दिखाने में काफी दिलचस्पी ले रहा है कि वह पिछली सरकारों से कितना अलग है। मौजूदा सरकार किसी भी नीतिगत बदलाव के दायरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है। निश्चित रूप से एनएसएस 25 दस्तावेज यह बताने की कोशिश करता दिख रहा है कि अमेरिका के पिछले राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टिकोणों ने ‘वास्तविक अमेरिकी लोगों’ के हितों का समुचित प्राथमिकता नहीं दी।
ट्रंप प्रशासन के इस दस्तावेज में कहा गया है कि विदेश नीति स्पष्ट घरेलू प्राथमिकताओं से जुड़ी होगी। इन प्राथमिकताओं में अफीम की लत पर अंकुश लगाना (जो निचले-मध्यम वर्ग के श्वेत अमेरिका को तबाह कर रही है), अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र को दोबारा पटरी पर लाना, गैर-श्वेत आप्रवासियों की संख्या कम करना और उन विभिन्न सामाजिक बदलाव को वापस लेना शामिल हैं जो एक बहु-जातीय सांस्कृतिक और शैक्षणिक अभिजात वर्ग के सृजन में सहायक साबित हुए थे।
इन्हें एनएसएस 25 में विभिन्न रूप से लागू किया गया है। अमेरिका के विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए शुल्क लगाना और दूसरे देशों पर आर्थिक दबाव डालने के ट्रंप प्रशासन के कदमों का बचाव इस दस्तावेज में किया गया है। श्वेत वर्चस्व को चुनौती देने वाले कई विचारों का स्रोत रह चुके यूरोप को एक सहयोगी के बजाय एक वैचारिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश किया गया है।
फिर आप्रवासन नियंत्रण और नशीली दवाओं की समस्या का जिक्र किया गया है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि इन समस्याओं के समाधान के लिए अमेरिका को पश्चिमी गोलार्द्ध में अन्य देशों के कदमों और विकल्पों पर करीबी नियंत्रण रखने की दिशा में फिर कदम बढ़ाना चाहिए। दस्तावेज में इसे ‘मोनरो सिद्धांत’ से जुड़ा हुआ बताया गया है। जेम्स मोनरो अमेरिका के पांचवें राष्ट्रपति और यह पद संभालने वाले अमेरिका के संस्थापक लोगों में एक थे।
उन्होंने यूरोप को अमेरिका पर प्रभाव दिखाने से दूर रहने की चेतावनी दी थी जिसे मोनरो सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। इस सिद्धांत में नई दुनिया को पुरानी दुनिया के औपनिवेशिक दुस्साहस और ताकत एवं प्रभुत्व की लड़ाई से दूर रखने का प्रयास किया गया था। एनएसएस 25 में दोनों अमेरिकी महाद्वीपों में संसाधनों, संपर्क और प्रवेश द्वार से जुड़े दावे स्पष्ट रूप से शामिल करने के लिए इस सिद्धांत को अद्यतन किया गया है।
बाकी दुनिया के लिए यह ‘प्रभाव क्षेत्रों’ के बारे में एक पुराने सिद्धांत की वापसी है जो थोड़ी चिंता बढ़ाने वाली है। एशिया के कुछ अन्य देशों के साथ भारत भी लैटिन अमेरिका में प्राकृतिक संसाधनों तक स्वतंत्र पहुंच खोने के साथ इस आशंका से भी चिंतित होगा कि अमेरिका अन्य शक्तियों को भी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र तैयार करने की राह पर धकेल देगा। इस तरह, एनएसएस 25 में इसे लेकर स्थिति काफी स्पष्ट की गई है कि भविष्य में अमेरिकी विदेश नीति कैसे तैयार की जाएगी (एक घरेलू सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गृह युद्ध में एक हथियार के रूप में)।
इसका मतलब यह भी है कि अमेरिका के फैसलों की व्याख्या हमेशा इसी संदर्भ में होती रहेगी। यूरोप या अफ्रीका के देश यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अमेरिका के साथ उनके संबंध साझा हितों को नहीं दर्शाते हैं बल्कि इसके बजाय यह जताते हैं कि उन्हें अमेरिका में घरेलू विवाद में किस तरह की भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके बदले में वे देश इस बहस को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। यानी अमेरिका अपने लोकतंत्र में अधिक विदेशी प्रभाव आमंत्रित कर रहा है।
हाल ही में चिप निर्माता कंपनी एनवीडिया को चीनी विनिर्माताओं को अपने कुछ अग्रिम उत्पादों को बेचने की अनुमति दी गई थी। इसे पहली नजर में विशुद्ध रूप से लेनदेन वाला माना जा सकता है क्योंकि अमेरिकी सरकार को बिक्री से राजस्व प्राप्त होता है। मगर एनएसएस 25 के संदर्भ में इसकी अलग से इस संकेत के रूप में व्याख्या की जाएगी कि अमेरिका चीन के साथ तकनीकी प्रतिस्पर्द्धा को केवल कुछ सीमित तरीकों से प्राथमिकता देता है और वह इस तकनीक तक पहुंच को उन मूल घरेलू बहस के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं मानता है जिन्हें ध्यान में रखते हुए नई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति तैयार की गई है। कभी-कभी एक रणनीति जवाब देने के बजाय सवाल अधिक खड़े करती है।