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IBC: संकट में फंसी कंपनियों का ‘समाधान’ या कर्ज वसूली का नया ‘हथियार’?

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आईबीसी का असल मकसद डूबती कंपनियों को बचाना था, लेकिन अब यह सिर्फ कर्ज वसूली का जरिया बनकर रह गया है, जो इसके मूल उद्देश्य को भटका रहा है

Last Updated- March 31, 2026 | 9:53 PM IST
IBC Amendment Bill 2026
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी), 2016 का उद्देश्य उस तरीके में निर्णायक बदलाव करना था जिसमें कॉरपोरेट संकट के समय लेनदारों की ज्यादा चलती थी और नियमों को सख्ती से लागू करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था। इसे एक ऐसे ढांचे के रूप में तैयार किया गया था जिसमें उन व्यवसायों को बचाया जा सके जो चल सकते हों, साथ ही कंपनी की कीमत बनी रहे और वित्तीय संकट को मिलजुलकर सुलझाया जा सके। हालांकि समय के साथ, यह संहिता धीरे-धीरे ऋण वसूली का देश का सबसे शक्तिशाली जरिया बन गई है। आज मुख्य चर्चा इस बात पर नहीं है कि इस संहिता ने संकट का कितना समाधान किया है, बल्कि यह है कि उसने कितना पैसा वसूल किया है।

आधिकारिक आंकड़े इस कथानक पर ही बल देते हैं। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया है कि आईबीसी सभी प्रणालियों में सबसे अधिक वसूली करती है। 2024-25 में इसकी औसत वसूली दर 37 फीसदी रही जबकि सरफेसी के तहत यह 32 फीसदी, डेट रिकवरी पंचाट (डीआरटी) के जरिये 10 फीसदी और लोक अदालत के जरिये महज 2 फीसदी रही। उस वर्ष बैंक रिकवरी में अकेले आईबीसी की हिस्सेदारी 52 फीसदी रही। सार्वजनिक विमर्श और मीडिया कवरेज ‘हेयरकट्स’ पर केंद्रित है, जिसे आईबीसी के प्रदर्शन का आकलन करने का प्राथमिक मानदंड माना जाता है।

लेकिन इसे इस प्रकार प्रस्तुत करना अत्यंत भ्रामक है। यह वसूली को महिमामंडित करता है, जबकि आईबीसी का उद्देश्य कभी यह नहीं था। अक्सर आंकड़ों को चुनिंदा ढंग से पेश किया जाता है और इस दौरान कई अहम बातों को अनदेखा किया जाता है। उदाहरण के लिए यह कि आईबीसी के अंतर्गत की गई वसूली कंपनियों के बचाव से अलग बात है, जबकि संहिता का मुख्य उद्देश्य कंपनियों को बचाना ही है। 

चिंता की बात यह है कि आईबीसी वसूली संबंधी कानून नहीं है। इसके उलट एक बार दिवालियापन की कार्रवाई शुरू होने पर संहिता सभी वसूली कार्रवाइयों पर रोक लगा देती है। यह प्रवर्तन आधारित परिणामों से स्पष्ट दूरी का संकेत देती है। कानूनी संरचना एकदम स्पष्ट है। धारा 65 के अनुसार दिवालियापन कार्रवाई की शुरुआत यदि दिवालियापन समाधान के अलावा किसी अन्य उद्देश्य से की जाती है तो दंड दिया जाएगा।  

सुप्रीम कोर्ट ने संहिता की शुरुआत में ही इसे स्पष्ट कर दिया था। स्विस रिबन्स प्रा. लि. मामले में, उसने आईबीसी को एक लाभकारी कानून के रूप में वर्णित किया था, जिसका उद्देश्य कंपनी को फिर से खड़ा करना है। उसने मेसर्स एचपीसीएल बायो- फ्यूल्स लिमिटेड (2024 ) के मामले में दोहराया कि दिवालियापन कार्यवाही में वसूली केवल समाधान की सहायक प्रक्रिया है, मुख्य राहत नहीं। 

इसके बावजूद विधिक आदेश और परिचालन हकीकत के बीच का अंतर अब एक गहरी खाई बन गई है। इसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला है धारा 29ए। कॉरपोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) में दाखिल 8,659 मामलों में से केवल लगभग 1,300 ही स्वीकृत समाधान योजनाओं में तब्दील हुए हैं।

इस बीच, लगभग 30,000 मामले, जिनमें 14 लाख करोड़ रुपये का ऋण शामिल है, दाखिले से पहले ही वापस ले लिए गए। प्रत्येक एक मामले के समाधान के मुकाबले लगभग 25 मामले प्रारंभिक स्तर पर ही वापस ले लिए जाते हैं।  दाखिले के बाद भी ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) की मंजूरी से मामले वापस लिए जाते हैं।

धारा 29ए, जो कई प्रवर्तकों को सीआईआरपी शुरू होने के बाद समाधान योजनाएं प्रस्तुत करने के लिए अयोग्य बना देती है, एक शक्तिशाली निवारक बन जाती है। दिवालियापन दाखिले और नियंत्रण खोने के अस्तित्वगत खतरे का सामना करते हुए, प्रवर्तक अक्सर समझौता कर लेते हैं। इस प्रकार संहिता पुनर्गठन के ढांचे के बजाय एक दबाव का साधन बन जाती है, एक प्रभावी वसूली का डंडा। यद्यपि धारा 29ए में समायोजन की आवश्यकता है, लेकिन इसका निवारक प्रभाव असंदिग्ध है। समस्या इसके अस्तित्व में नहीं, बल्कि इस बात में है कि पारिस्थितिकी तंत्र इसका कैसे उपयोग करता है।

दूसरा कारण उन वित्तीय ऋणदाताओं का नजरिया है, जो ऋणदाताओं की समिति का हिस्सा होते हैं। इन ऋणदाताओं के पास एक अच्छा वसूली तंत्र होता है और वे लंबे समय से त्वरित नकद वसूली को प्राथमिकता देते रहे हैं, बजाय इसके कि व्यवसाय को पुनर्जीवित कर मूल्य अधिकतम करने के लिए धैर्य दिखाएं। समाधान योजनाओं के अंतर्गत वसूली आमतौर पर अग्रिम रूप से की जाती है। ऋणदाता शायद ही कभी समाधान के बाद के प्रदर्शन से मूल्य प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा करते हैं। यह संस्थागत प्रवृत्ति संहिता के उद्देश्य को विकृत करने में सक्षम और शायद इसे वैध भी बनाती है।

ये दोनों कारक मिलकर वित्तीय और परिचालन ऋणदाताओं को आईबीसी को समाधान के बजाय वसूली के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं। पैटर्न काफी स्पष्ट है। प्रवर्तक अक्सर सीआईआरपी दाखिले तक प्रतीक्षा करते हैं और फिर समझौते पर बातचीत करते हैं। 

परिणामस्वरूप, दिवालियापन आवेदन वार्ता में शुरुआती चाल बन गया है: पहले दाखिल करो, बाद में बातचीत करो। सीआईआरपी दाखिले का विश्वसनीय खतरा जिसमें प्रतिष्ठा को नुकसान, क्रेडिट लाइनों का टूटना, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और प्रतिभा का पलायन शामिल है, देनदार के मन को गहराई से प्रभावित करता है। व्यक्तिगत ऋणदाता के दृष्टिकोण से यह रणनीति तर्कसंगत लग सकती है। जब आईबीसी दाखिला भुगतान वसूलने में इतना प्रभावी है, तो लंबी पुनर्गठन वार्ताओं में क्यों उलझा जाए?

यह व्यवस्था के लिए दिक्कत वाली बात है। आईबीसी को सामूहिक कार्रवाई की समस्याओं का समाधान करने और प्रवर्तन की दौड़ को रोकने के लिए बनाया गया था, जो चलती कंपनियों के मूल्य को नष्ट कर देती है। लेकिन हम इसका उल्टा देख रहे हैं: ऋणदाता अदालत की ओर जा रहे हैं, सामूहिक रूप से उद्यम मूल्य को संरक्षित करने के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत वसूली सुनिश्चित करने के लिए।

दिवालियापन कानून सुधार समिति ने यह मान लिया था कि दिवालियापन केवल गंभीर विचार-विमर्श और द्विपक्षीय विकल्पों के समाप्त होने के बाद ही शुरू होगा। यह मान्यता पूरी तरह गलत साबित हुई है। दिवालियापन याचिका अब वार्ता का अंत नहीं, बल्कि उसकी शुरुआत बन गई है। यहां तक कि जब समाधान सफल होता है, तब भी प्रक्रिया के दौरान हुआ नुकसान अक्सर स्थायी निशान छोड़ जाता है।

इसके परिणाम अजीब हैं। अस्थायी नकदी संकट का सामना कर रही सक्षम कंपनियों को केवल एक भुगतान चूकने पर सीआईआरपी में घसीटा जा सकता है, जबकि गहरी दिवालिया कंपनियों को अनेदखा किया जा सकता है क्योंकि वहां वसूली की संभावना नहीं होती। इस प्रवृत्ति को संस्थागत संस्कृति बनने से पहले रोकना आवश्यक है। एक बार जब न्यायाधीश, पेशेवर और ऋणदाता आईबीसी को वसूली उपकरण के रूप में आत्मसात कर लेते हैं, तो इसे उलटना अत्यंत कठिन होगा। पारिस्थितिकी तंत्र अनिवार्य रूप से बचाव के बजाय वसूली पर केंद्रित हो जाएगा।

आईबीसी की दिशा भारत के ऋण बाजारों, निवेश व्यवहार और आर्थिक विकास को आने वाली पीढ़ियों तक प्रभावित करेगी। दिवालियापन कार्यवाही समाधान के लिए है, वसूली के लिए नहीं। यह मंशा पूरी होती है या नहीं, यह विधायी सुधारों पर कम और ऋणदाताओं के दृष्टिकोण में मूलभूत बदलाव पर अधिक निर्भर करता है। यदि यह बदलाव जल्द नहीं आता, तो सुधार का अवसर हमेशा के लिए खोया जा सकता है।

(लेखक क्रमश: नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर और पूर्व वि​शिष्ट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - March 31, 2026 | 9:53 PM IST

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