facebookmetapixel
Advertisement
सरकार लाई नया Tax Amendment Bill, गिफ्ट सिटी, विदेशी निवेश कोष और डेटा सेंटर को मिलेंगी टैक्स में छूटManufacturing PMI जुलाई में पांच साल के निचले स्तर पर, कमजोर मांग और बिक्री से सुस्त पड़ा विनिर्माण क्षेत्रFCNR(B) जमा बढ़ने से बैंकों की CD पर निर्भरता घटी, जुलाई में 95 हजार करोड़ रुपये जुटाएकांग्रेस ने मुझे रोका नहीं होता तो मैं भारत का मूल सुधारक होता, 1991 के बजट भाषण में मेरे बजट के कई अंश: यशवंत सिन्हासड़क हादसे रोकने के लिए सरकार का बड़ा कदम, नए दोपहिया और चारपहिया वाहनों में V2V सिस्टम होगा जरूरीटैक्स दबाव के बाद आईटीसी में सुधार के संकेत, शेयर 4% चढ़कर पहुंचा ₹292.50छात्र प्रदर्शन मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख किया साफ, गंभीर अपराध छोड़ बाकी छात्रों को मिलेगी राहतउपचुनाव में भाजपा को बड़ा झटका, बांकीपुर में प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत, दतिया भी नहीं जीत सकी BJPअल-नीनो और कमजोर मॉनसून के बीच पानी पर बढ़ी सियासत, कावेरी से महानदी तक फिर गरमाए राज्यों के विवादक्लोजिंग ऑक्शन से बाजार हैरान, सेंसेक्स 544 अंक चढ़ा तो निफ्टी में 391 अंकों की बढ़त

कंपनियों के धन से अच्छी पत्रकारिता हो तो कोई बुराई नहीं

Advertisement

डिजिटल दौर ने प्रकाशन संस्थानों की दुनिया पर व्यापक और गहरा असर डाला है। इन प्रकाशन कंपनियों के सलाहकार लागत घटाने, कर्मचारी और फीचर आदि को कम करने में लगे हुए हैं।

Last Updated- May 14, 2026 | 10:01 AM IST
Representational Image

डेविड फ्रैंकल निर्देशित फिल्म ‘द डेविल वेअर्स प्राडा 2’ के बारे में चौंकाने वाली बात यह है कि यह फिल्म फैशन की दुनिया के बारे में नहीं बल्कि पत्रकारिता की रवायत को बचाने से जुड़ी है। वर्ष 2006 की उस सुपरहिट फिल्म का सीक्वल, जिसकी कहानी फैशन की दुनिया पर आधारित थी, बेहतरीन लेखन, तथ्यों और लोगों तक अनकही कहानियां पहुंचाने के माध्यम की स्तुति है। फिल्म की एक किरदार, ऐंडी सैक्स (ऐनी हैथवे) इस फिल्म में एक फैशन पत्रिका, ‘रनवे’ में फीचर संपादक के रूप में नजर आईं। पहली फिल्म में वह मिरांडा प्रिस्टली (मेरील स्ट्रीप) की सहयोगी थीं, जो एक सख्त लेकिन एक बेहद सफल संपादक की भूमिका में थीं।

निश्चित तौर पर अब कहानी वर्ष 2026 की है। डिजिटल दौर ने प्रकाशन संस्थानों की दुनिया पर व्यापक और गहरा असर डाला है। इन प्रकाशन कंपनियों के सलाहकार लागत घटाने, कर्मचारी और फीचर आदि को कम करने में लगे हुए हैं। काफी संघर्ष के बाद, सैक्स और प्रिस्टली को एक निवेशक मिल जाता है जो उस तरह की पत्रकारिता के लिए फंड देने को तैयार हैं जिसे वे करना चाहती हैं और इस तरह कहानी खुशनुमा मोड़ पर खत्म होती है।

हालांकि, वास्तविक दुनिया में देखा जाए तो अब तक यही दिखा है कि किसी बड़े निवेशक के जरिये किसी प्रकाशन संस्थान को बचाना, ज्यादातर मामलों में केवल एक अस्थायी उपाय है। अगस्त 2013 में, मशहूर निवेशक जेफ बेजोस ने वॉशिंगटन पोस्ट को 25 करोड़ डॉलर नकद में खरीद लिया। उन्होंने इसे डिजिटल बनाने के साथ ही इसे मुनाफे में लाने में सफलता पाई और बार-बार इसके संपादकीय रुख के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई। लेकिन वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनावों से पहले, परंपरा तोड़ते हुए उन्होंने कहा कि यह अखबार डेमोक्रेटिक पार्टी की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार कमला हैरिस का समर्थन नहीं करेगा। इसके अलावा कर्मचारियों में एक-तिहाई कटौती की गई और अखबार की संपादकीय नीति बदल गई।

अन्य निवेशकों ने भी स्थानीय समाचार पत्रों को खरीदते समय यही किया यानी लागत कम करने के साथ ही कर्मचारियों में कटौती की और ब्रांड मूल्य को लगभग शून्य के स्तर पर पहुंचा दिया। हालांकि, कुछ निवेशक ऐसे भी रहे जिन्होंने पत्रकारिता की गुणवत्ता और उसके दायरे को बढ़ाने में निवेश किया जैसे कि फेनवे स्पोर्ट्स ग्रुप के जॉन हेनरी ने ‘द बॉस्टन ग्लोब’ के जरिये ऐसा किया जिसे उन्होंने 2013 में खरीदा।

खबरों के कारोबार में लगातार गिरावट दिख रही है क्योंकि पाठक ऑनलाइन माध्यम में दिलचस्पी ले रहे हैं लेकिन कमाई वैसी नहीं बढ़ रही है। वर्ष 2000 में अमेरिकी समाचार पत्र बाजार में विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन से लगभग 60 अरब डॉलर की कमाई होती थी और 6 करोड़ प्रतियां बिकती थीं लेकिन वर्ष 2022 में यह घटकर 20 अरब डॉलर और 2करोड़ प्रतियां रह गई हैं।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर स्टडी ऑफ जर्नलिज्म की वर्ष 2025 की डिजिटल न्यूज रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक समाचार पाठकों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हर हफ्ते फेसबुक (36 फीसदी) और यूट्यूब (30 फीसदी) के माध्यम से खबरें देखता है। इसके लिए इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप का इस्तेमाल लगभग 20 फीसदी लोग करते हैं। सर्वेक्षण में शामिल आधे से ज्यादा लोग (58 फीसदी) इस बात को लेकर चिंतित हैं कि ऑनलाइन खबरों के मामले में वे सच और झूठ के बीच कैसे फर्क कर पाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक यह चिंता अफ्रीका (73 फीसदी) और अमेरिका (73 फीसदी) में सबसे ज्यादा और पश्चिमी यूरोप (46 फीसदी) में सबसे कम है।

इंटरनेट, फिर स्ट्रीमिंग और अब शॉर्ट वीडियो ने खबरों के कारोबार और उपभोग के मॉडल को पूरी तरह बदल दिया। इसका कोई आसान सा समाधान नहीं दिखाई देता। कई गंभीर प्रकाशन संस्थाएं अब स्थानीय, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय खबरों के बजाय लाइफस्टाइल, खानपान और सेलेब्रिटी से जुड़ी कहानियों पर जोर दे रहे हैं जिस पर खूब क्लिक मिले। अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए यह वित्तीय लिहाज से भी जरूरी हो गया है क्योंकि सोशल मीडिया मंच और शॉर्ट वीडियो ऐप ही अब मुख्य समाचार स्रोत हैं।

लेकिन किसी भी लोकतंत्र के सुचारु रूप से काम करने के लिए अच्छी पत्रकारिता बेहद जरूरी है जो आम जनता को हो रही घटनाओं की जानकारी दे। हालांकि यह पहले जितना लाभकारी नहीं है। इसका परिणाम, घाटा और कभी बेहद प्रतिष्ठित रहे ब्रांडों की मजबूरी में बिक्री के रूप में सामने आया है। जानकारी से लैस विचारों की कमी और बड़ी तकनीकी कंपनियों का समाचार की दुनिया में बढ़ता प्रभुत्व वास्तव में पाठकों, दर्शकों के एक जैसे विचारों वाले समूह बनने जैसी समस्या को जन्म देता है। इसका असर दुनिया में बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण में देखा जा सकता है। यही कारण है कि ‘द डेविल वेअर्स प्राडा 2’ फिल्म देखने लायक हो सकती है। हालांकि यह फिल्म केवल एक हल बताती है कि बेहतर पत्रकारिता के लिए एक ऐसा निवेशक ढूंढ़ा जाए जो इसमें भरोसा करता हो।

दूसरी बात यह है कि समाचार ब्रांड को संपादकीय रूप से सुरक्षित और गुणवत्ता वाली पत्रकारिता में निवेश करने योग्य बनाने के लिए एक मजबूत स्वामित्व संरचना और संतुलन प्रणाली तैयार करना बेहद महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के तौर पर द गार्डियन को एक ट्रस्ट द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जिसे विशेष रूप से इसके उदार-वामपंथी विचारधारा वाली पत्रकारिता मूल्यों की रक्षा के लिए गठित किया गया है। बीबीसी की फंडिंग ब्रिटेन के नागरिकों द्वारा टीवी सेट रखने पर लगाए जाने वाले लाइसेंस शुल्क से होती है।

द इकनॉमिस्ट ग्रुप को कई निवेशक नियंत्रित करते हैं, जिनमें एक्सॉर (एग्नेली फिएट परिवार का निवेश फर्म), कैडबरी और रॉथचाइल्ड परिवार और कर्मचारी आदि शामिल हैं। ब्रांड की वेबसाइट पर लिखा है, ‘कंपनी में कोई भी व्यक्ति या समूह, बहुल हिस्सेदारी नहीं ले सकता और कोई शेयरधारक 20 फीसदी से अधिक वोटिंग अधिकार नहीं ले सकता। संपादक की नियुक्ति, ट्रस्ट में शामिल लोग करते हैं जो वाणिज्यिक, राजनीतिक और मालिकाना प्रभावों से स्वतंत्र हैं। इस तरह की संरचना सुनिश्चित करती है कि द इकनॉमिस्ट अपना स्वतंत्र दृष्टिकोण रख सके और यह परंपरागत सोच और सत्ता के केंद्रीकरण को चुनौती देने में स्वतंत्र हो। इसका उद्देश्य लोगों को सूचना देना है न कि किसी के निजी हितों को साधना।’ आप द इकनॉमिस्ट के दृष्टिकोण से हमेशा सहमत नहीं हो सकते लेकिन यह वैश्विक घटनाओं और रुझानों की जानकारी देने में अहम भूमिका निभाता है।

वर्ष 2015 में फाइनैंशियल टाइम्स समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) जॉन रिडिंग ने मुझसे कहा, ‘फाइनैंशियल टाइम्स का शत-प्रतिशत स्वामित्व निक्केई के पास है और निक्केई का सौ फीसदी स्वामित्व इसके कर्मचारियों के पास है। ऐसे में हम कॉरपोरेट जगत के दबाव से स्वतंत्र होकर दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपना सकते हैं।’ चाहे किसी प्रकाशन संस्था का स्वरूप लाभकारी हो या गैर-लाभकारी, स्वामित्व की संरचना और उसमें मौजूद संतुलन प्रणाली ही अच्छे ब्रांड को बनाए रखने में मदद करती है।

भारत में 400 से अधिक समाचार चैनल, सैकड़ों अखबार और कई समाचार वेबसाइट हैं और हमारा देश भी इन्हीं समस्याओं का सामना कर रहा है। कई मीडिया शोधकर्ता ‘कॉरपोरेट स्वामित्व’ को लेकर चिंता जताते हैं। लेकिन दुनिया भर के लगभग सभी मीडिया संगठन कॉरपोरेट जगत के स्वामित्व में हैं। वास्तव में, भारत में समाचार पत्र क्रांति उन उदार कंपनियों से शुरू हुई, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘द हिंदू’ या ‘मलयाला मनोरमा’ जैसे अखबारों को वित्तीय मदद दी। कंपनी के स्वामित्व में होना कोई समस्या नहीं है। असली जरूरत है एक अतिरिक्त सुरक्षा परत की जो अच्छी पत्रकारिता को वित्तीय और संपादकीय रूप से टिकाऊ बनाए।

Advertisement
First Published - May 14, 2026 | 10:01 AM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement