भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता हस्ताक्षर की औपचारिकता पूरी होने के बाद इस वर्ष 15 जुलाई से प्रभावी हो गया। इस समझौते पर कुछ लोगों का कहना है कि भारत ने खुला रवैया अपनाया है और जी-7 समूह में शामिल अर्थव्यवस्था यानी ब्रिटेन के साथ अपना पहला व्यापक समझौता कर मुक्त व्यापार की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। कुछ दूसरे लोगों का कहना है कि इससे आयात बढ़ेगा, द्विपक्षीय व्यापार घाटा बढ़ेगा और घरेलू कंपनियां नुकसान में रहेंगी। ये दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएं समझौते के बारे में कम और व्यापार को लेकर भारतीय नजरिया अधिक दर्शाती हैं।
सबसे पहले द्विपक्षीय व्यापार घाटे से जुड़ी चिंता पर बात कर लेते हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा हिसाब-किताब का महज एक आंकड़ा है न कि आर्थिक सफलता का पैमाना। भारत उन चीजों (इनपुट) का आयात करता है जो सबसे सस्ती होती हैं और उनका निर्यात करता है जिनकी कीमत सबसे अधिक होती है।
उदाहरण के लिए भारत कच्चे हीरे आयात कर तराशता है और उसे पॉलिश कर महंगी कीमतों पर निर्यात करता है। इसी तरह, कच्चे तेल से परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद बनते हैं और आयातित पुर्जों से स्मार्टफोन संयोजन (असेंबल) किए जाते हैं। व्यापार में भागीदार हर सफल देश वैश्विक मूल्य श्रृंखला में शामिल होता है जिसमें कभी अधिशेष तो कभी घाटा होता है।
असल मुद्दा यह है कि क्या व्यापार समझौते भारत की अर्थव्यवस्था और अधिक खोल देते हैं। फायदे केवल आयात से अधिक निर्यात करने से नहीं मिलते बल्कि सस्ते आयात से घरेलू कंपनियों में अनुशासन आता है, वैश्विक कंपनियों और मानकों के साथ बेहतर तालमेल बनता है और संधि के तहत किए गए वादों से निवेशकों को भरोसा मिलता है।
इनसे भारतीय कंपनियों की उत्पादकता बढ़ती है जो भारत की समृद्धि का असली स्रोत है। लिहाजा काम की बात यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन किस हालत में है बल्कि यह है कि यह समझौता कितना गहरा है और इसे और कितनी गहराई दी जा सकती है।
भारतीय मानकों के हिसाब से यह समझौता काफी गहरा है। इसमें 30 अध्याय (चैप्टर) हैं जिनमें उन क्षेत्रों का जिक्र है जो भारत में लंबे समय से वर्जित माने जाते रहे हैं। इनमें सरकारी खरीद, श्रम, पर्यावरण, डिजिटल व्यापार और 137 उप-क्षेत्रों में सेवाएं आदि शामिल हैं। अन्य सभी विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तरह ब्रिटेन में शुरू से ही व्यापार संबंधी बाधाएं कम रही हैं और उन्होंने पहले दिन से ही भारत के 99 फीसदी टैरिफ लाइन (किसी देश की सीमा शुल्क अनुसूची में मौजूद वस्तुओं की सबसे विस्तृत और विशिष्ट श्रेणी) के लिए शुल्क मुक्त पहुंच दी है।
एक सामाजिक-सुरक्षा परिपाटी के तहत ब्रिटेन में काम करने वाले भारतीय कर्मचारियों को पांच वर्ष तक दोहरी कटौती से छूट दी गई है। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्राथमिकता का दावा करने के लिए निर्यातक या उत्पादक द्वारा स्व-प्रमाणन स्वीकार किया गया है न कि अलग-अलग स्रोतों के दावों के लिए सरकारी मंजूरी पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे वह संदेह दूर होता है जो हाल के वर्षों में चीन से आयात के प्रति भारत के नजरिये में दिखा है।
इसके बावजूद, भारतीय मानकों के हिसाब से व्यापार समझौते में अधिक गहराई नहीं है। यह ‘भारतीय मानक’ 2000 के दशक के संकीर्ण सोच वाले समझौतों से तय होता है। समयसीमा में अंतर पर गौर करें तो ब्रिटेन ने तुरंत 99 फीसदी भारतीय सामान पर शुल्क खत्म कर दिए। भारत ने 90 फीसदी टैरिफ लाइन पर शुल्क कम दिए मगर ब्रिटेन से होने वाले आयात का केवल 30 फीसदी हिस्सा ही तत्काल शून्य शुल्क के दायरे में आता है। बाकी हिस्सा 10 वर्षों में विभिन्न चरणों में लागू होगा।
शुरुआत में वैश्विक मानकों के हिसाब से भारतीय शुल्क बहुत अधिक थे। यह कृषि उत्पादों पर औसतन 64 फीसदी, जिन और व्हिस्की पर 150 फीसदी और कारों पर लगभग 110 फीसदी था। जब शुल्क इतने अधिक हों तो तो थोड़ी सी कटौती से भी औसत में भारी गिरावट आती है। व्हिस्की पर शुल्क अभी 150 फीसदी से घट कर 75 फीसदी हो गया है और 10वें वर्ष में यह 40फीसदी तक रह जाएगा। कारों पर शुल्क 10 फीसदी रह जाएंगे, मगर एक कोटा है और वृहद इलेक्ट्रिक वाहन खंड इससे बाहर रखा गया है।
दुग्ध उत्पादों (जिन पर सबसे अधिक शुल्क लगता है) पर शुल्क में कोई कटौती नहीं की गई है जिससे भारत के गरीबों के बेहतर पोषण के हितों को सीधा नुकसान पहुंचा है। भारत बेतुके संरक्षणवाद से हटकर अधिक संरक्षण की ओर बढ़ा है। यह प्रगति तो मानी जा सकती है मगर मुक्त व्यापार नहीं। भारत को होने वाले फायदे सीमित हैं और जो मिलेंगे वे बहुत धीरे-धीरे मिलेंगे।
नियमन के लिए समितियां तो हैं मगर पक्का इरादा नदारद है। पेशेवर सेवाओं पर बनी अनुसूची केवल नियामकों को योग्यताओं की आपसी मान्यता पर बातचीत शुरू करने के लिए ‘प्रोत्साहित’ करती है। इसके लिए कोई समयसीमा तय नहीं की गई है। नवाचार अध्याय (इनोवेशन चैप्टर) एक कार्यशील समूह का प्रावधान है जो भविष्य के नियामकीय तरीकों पर चर्चा कर सकता है।
इसके उलट यूरोपीय संघ-वियतनाम समझौते में वियतनाम ने समझौता लागू होने के पांच वर्ष बाद ईयू के वाहन प्रमाणपत्र स्वीकार करने का वादा किया था और पहला शुल्क कम होने से पहले ही एक तय कार्य योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के सिद्धांत को मंजूरी दे दी थी।
ऐसे अनुशासन के बिना व्यापारिक साझेदारों द्वारा दी गई शुल्क रियायतें भारतीय व्यवस्था का कामकाज बेहतर बनाने का जरिया नहीं बन सकतीं। इस वर्ष जनवरी में अपनी रिपोर्ट में हाउस ऑफ लॉर्ड्स की अंतरराष्ट्रीय समझौता समिति ने कहा कि ब्रिटेन के अहम हित जैसे कानूनी सेवाएं और निवेश सुरक्षा बाहर रखे गए जो निराशाजनक है।
समिति ने अधूरे द्विपक्षीय निवेश समझौते, सीमा-पार सूचनाओं के आदान-प्रदान पर प्रतिबद्धताओं की कमी और भारतीय गुणवत्ता नियंत्रण आदेश से पैदा हो सकने वाले जोखिम की ओर भी इशारा किया। सरकार की खरीद-फरोख्त में प्रतिस्पर्द्धा के जरिये भारतीय करदाताओं को अधिक से अधिक फायदा मिलना चाहिए। फिर भी इस समझौते में ब्रिटेन की कंपनियों को सीमित पहुंच ही मिलती है।
ब्रिटेन की कंपनियों को केंद्र सरकार की लगभग 40,000 निविदाओं में संधि समर्थित पहुंच मिलती है जो वास्तव में पहली बार हो रहा है। मगर वे ‘मेक इन इंडिया’ आदेश के तहत केवल क्लास-2 आपूर्तिकर्ता के तौर पर शामिल हो सकती हैं जिसमें 20 फीसदी ब्रिटेन की स्थानीय सामग्री जरूरी है और क्लास-1 घरेलू आपूर्तिकर्ताओं को पहली प्राथमिकता मिलती है। उप-राष्ट्रीय लोक वित्त को कोई फायदा नहीं होता।
कार्बन सीमा समायोजन ढांचा (सीबीएएम) को सही ढंग से संधि से बाहर रखा गया है। यह वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के साथ घरेलू नीति के एक बुनियादी स्तंभ के तौर पर काम करता है। सीबीएएम में यूरोपीय कंपनियों और भारतीय निर्यातकों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाता है।
यह व्यापार नीति का हिस्सा नहीं है। निवेश प्रतिबद्धताएं और प्रावधान दायरे से बाहर हैं। विवाद सुलझाने के लिए विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की तरह देशों के बीच ढांचा है जिसमें ठोस समयसीमाएं हैं। हालांकि, निवेशक-राज्य विवादों के लिए वास्तव में मूल्यवान ढांचे गायब हैं।
ग्लास आधा भरा है। यानी भारत का आत्मविश्वास बढ़ रहा है, हम तीसरी दुनिया से बाहर निकल रहे हैं और ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) इससे पहले के सभी समझौतों से बेहतर है। ग्लास आधा खाली है यानी यह संधि एक खुली अर्थव्यवस्था हासिल करने के भारतीय राष्ट्रीय हितों में दखल देती है जिससे आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा।
हमारा अगला कदम इस संधि की बातों को अधिक से अधिक व्यापार खुलापन में बदलने पर केंद्रित होना चाहिए और फिर अगले एफटीए के साथ और ऊंचे स्तरों पर जाने की कोशिश होनी चाहिए।
(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं)