विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी14) के लिए 166 देशों के व्यापार मंत्री 26 से 29 मार्च तक कैमरून के याउंडे में मिल रहे हैं। यह सम्मेलन वैश्विक व्यापार नियमों के लिए प्राथमिकता तय करने और उन पर बातचीत करने के लिए संगठन का सर्वोच्च मंच है।
वैश्विक व्यापार के 98 फीसदी हिस्से (35 लाख करोड़ डॉलर से अधिक मूल्य) को नियंत्रित करने वाली संस्था से इस बार उम्मीदें कम हैं, क्योंकि इसकी दिशा को लेकर गहरे मतभेद हैं। भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के नेतृत्व में एक समूह आम सहमति, समावेशिता और विकास एवं व्यापार के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता है। दूसरी ओर विकसित देशों के नेतृत्व में दूसरा समूह त्वरित निर्णय और छोटे समूह समझौतों पर जोर दे रहा है, जो अक्सर डब्ल्यूटीओ के मूल सिद्धांतों की कीमत पर होता है।
पहला समूह चेतावनी देता है कि यह बदलाव डब्ल्यूटीओ की बहुपक्षीय नींव को कमजोर कर सकता है और विकास संबंधी चिंताओं को दरकिनार कर सकता है, प्रभावी रूप से उस सीढ़ी को हटा सकता है जिसने कभी समृद्ध देशों के औद्योगीकरण में मदद की थी। यह मतभेद डब्ल्यूटीओ वार्ताओं में अधिकांश असहमति का मूल कारण है।
सम्मेलन के छह प्रमुख मुद्दे और उनके संभावित परिणाम इस प्रकार हैं:
कृषि: यह भारत के डब्ल्यूटीओ एजेंडा का प्रमुख हिस्सा बना हुआ है, जिसमें खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडार को डब्ल्यूटीओ के अनुरूप मानने की प्रमुख मांग शामिल है। मुख्य समस्या डब्ल्यूटीओ के दोषपूर्ण सब्सिडी फॉर्मूले में निहित है, जो 1986-88 की संदर्भ कीमतों का उपयोग करता है और भारत के समर्थन अनुमानों को सात से आठ गुना बढ़ा देता है, जिससे यह कृत्रिम रूप से सीमा उल्लंघन के करीब पहुंच जाता है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ इस फॉर्मूले में संशोधन करने में रुचि नहीं रखते और व्यापार विकृति के जोखिमों का हवाला देते हुए व्यापक छूटों का विरोध करते हैं, जिसके चलते भारत के पास 2013 से केवल एक अस्थायी ‘शांति खंड’ ही बचा है। कुछ देशों द्वारा पिछली प्रतिबद्धताओं को फिर से खोलने की कोशिश और मतभेदों के चलते, सम्मेलन में किसी सफलता की संभावना बहुत कम है।
ई-कॉमर्स पर छूट: इस पर पहली बार 1998 में सहमति बनी। यह इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन, जैसे डाउनलोड और डिजिटल सामग्री पर सीमा शुल्क को प्रतिबंधित करता है। अमेरिका के नेतृत्व में विकसित देश इसे स्थायी बनाना चाहते हैं, ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के डेटा और सेवाओं की ओर बढ़ने के साथ-साथ शुल्क-मुक्त डिजिटल व्यापार सुनिश्चित हो सके।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के बल पर डिजिटल अर्थव्यवस्था के आज के लगभग 16 लाख करोड़ डॉलर से बढ़कर अगले दो दशकों में लगभग 50 लाख करोड़ डॉलर होने का अनुमान है। इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन के लिए यह सीमा शुल्क-मुक्त व्यवस्था मुख्य रूप से उन अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को लाभ पहुंचाती है जो सीमा पार डिजिटल व्यापार पर हावी हैं।
भारत और अन्य विकासशील देशों का तर्क है कि व्यापार के भौतिक वस्तुओं से डिजिटल प्रारूपों में स्थानांतरित होने के कारण यह स्थगन उनके भविष्य के कर आधार को कमजोर करता है। वे इसके दायरे पर भी सवाल उठाते हैं। अधिकांश विकासशील देशों का मानना है कि डिजिटल रूप से प्रदान की जाने वाली सेवाएं इस स्थगन से बाहर हैं, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी इन्हें इसमें शामिल करना चाहते हैं। सम्मेलन में इस पर एक और अस्थायी विस्तार होने की संभावना है, जिससे असहज समझौते को बरकरार रखा जा सके।
बहुपक्षीय समझौते: ये समझौते डब्ल्यूटीओ के लिए एक प्रणालीगत चुनौती के रूप में उभर रहे हैं। भारत इनका विरोध करता है। उसका तर्क है कि ये कुछ देशों को ऐसे समझौते करने की अनुमति देकर सर्वसम्मति-आधारित नियम निर्माण को कमजोर करते हैं जिन्हें बाद में डब्ल्यूटीओ में लाया जाता है। इससे विकसित अर्थव्यवस्थाएं विकासशील देशों के लिए महत्त्वपूर्ण मुद्दों, जैसे कृषि सब्सिडी और विशेष एवं भेदभावपूर्ण व्यवहार, को नजरअंदाज करते हुए अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ा सकती हैं, जिससे कुछ देशों के प्रभुत्व वाली दो-स्तरीय प्रणाली का खतरा पैदा हो सकता है।
सम्मेलन में भारत पर विकास के लिए निवेश सुविधा (आईएफडी) समझौते का विरोध न करने का दबाव है, जो अधिक बहुपक्षीय समझौतों को अपनाने के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है। इससे पहले के सम्मेलन में भारत को दक्षिण अफ्रीका का साथ मिला था लेकिन अब भारत अकेला पड़ सकता है क्योंकि चीन की बेल्ट ऐंड रोड पहल से जुड़े अन्य अफ्रीकी देशों के दबाव में दक्षिण अफ्रीका का रुख बदलता दिख रहा है।
विशेष एवं विभेदक व्यवहार (एसडीटी): इस पर बहस डब्ल्यूटीओ में मौजूद एक गहरी दरार को उजागर करती है। विकासशील देशों ने 1995 में बौद्धिक संपदा और सेवाओं पर कड़े नियमों को स्वीकार किया था, जिसके बदले उन्हें संक्रमण काल की लंबी अवधि और नीतिगत स्वतंत्रता जैसी लचीली व्यवस्थाएं मिली थीं। अब यह समझौता तनाव में है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ का तर्क है कि बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अब ऐसे लाभ नहीं मिलने चाहिए और वे चाहते हैं कि एसडीटी मुख्य रूप से सबसे कम विकसित देशों तक ही सीमित रहे। भारत का कहना है कि विकास में अंतर अभी भी बहुत अधिक है और मूल समझौते पर पुनर्विचार किए बिना एसडीटी को हटाने से व्यवस्था और भी अधिक असमान हो जाएगी। यह विवाद निष्पक्षता और वैधता के मूल में है, और इस बार के सम्मेलन में इसका कोई समाधान संभव नहीं लगता है।
डब्ल्यूटीओ की विवाद निपटान प्रणाली: कभी इसका सबसे मजबूत स्तंभ रही यह प्रणाली अब कमजोर हो चुकी है। अमेरिका द्वारा नए सदस्यों की नियुक्ति पर रोक लगाने के बाद दिसंबर 2019 से अपील निकाय निष्क्रिय पड़ा है। हालांकि पैनल फैसले जारी करते रहते हैं, लेकिन अपीलें निरर्थक बनी रहती हैं, जिससे अंतिम निर्णय लेने में बाधा आती है और प्रवर्तन कमजोर हो जाता है। अंतरिम व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन वे आंशिक और खंडित हैं। भारत पूर्णतः कार्यशील दो-स्तरीय प्रणाली को बहाल करने का समर्थन करता है, लेकिन सुधारों पर व्यापक असहमति अभी भी अनसुलझी है। सम्मेलन से इसमें कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है।
निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार: यह भी उतना ही विवादास्पद मुद्दा है। विकसित देश तर्क देते हैं कि सर्वसम्मति का सिद्धांत प्रगति को धीमा करता है और वे अधिक लचीले दृष्टिकोणों की वकालत करते हैं, जिसमें बहुपक्षीय संगठनों पर अधिक निर्भरता शामिल है। भारत और अन्य देश सर्वसम्मति को इस प्रणाली की नींव मानते हैं, जो यह सुनिश्चित करती है कि सभी सदस्य देशों, चाहे वे बड़े हों या छोटे, उनको समान अधिकार प्राप्त हों। इसे कमजोर करने से शक्ति प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की ओर स्थानांतरित हो जाएगी और डब्ल्यूटीओ के विकास संबंधी आयाम कमजोर हो जाएंगे। इस मुद्दे पर भी चर्चा बिना किसी समाधान के जारी रहेगी।
सम्मेलन में सबसे संभावित परिणाम निरंतरता ही हो सकती है, न कि कोई क्रांतिकारी बदलाव। सत्र का विस्तार और अधिक वार्ताएं हो सकती हैं तथा कुछ ही निर्णय लिए जा सकते हैं। भारत के लिए नीतिगत स्वतंत्रता को बनाए रखने और तेजी से विभाजित हो रही व्यवस्था में प्रभावी गठबंधन का निर्माण करने की चुनौती होगी।
(लेखक जीटीआरआई के संस्थापक हैं)