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भारत में इलेक्ट्रिक कारों की रफ्तार तेज, लेकिन आम आदमी की पहुंच से अब भी दूर; मिड-मार्केट बना ग्रोथ इंजन

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वित्त वर्ष 2026 (FY26) के आंकड़ों पर नजर डालें तो EV की बिक्री में सालाना आधार पर 87.4 प्रतिशत का जोरदार उछाल आया है और कुल वॉल्यूम बढ़कर 2,33,246 यूनिट तक पहुंच गया है

Last Updated- April 26, 2026 | 7:13 PM IST
Delhi EV Policy 2.0
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारत में इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों (EV) का बाजार तेजी से रफ्तार पकड़ रहा है, लेकिन इस बढ़त के पीछे एक चौंकाने वाली तस्वीर भी सामने आई है। वित्त वर्ष 2026 (FY26) के आंकड़ों पर नजर डालें तो EV की बिक्री में सालाना आधार पर 87.4 प्रतिशत का जोरदार उछाल आया है और कुल वॉल्यूम बढ़कर 2,33,246 यूनिट तक पहुंच गया है। हालांकि, यह पूरी ग्रोथ मध्यम और प्रीमियम बजट वाली कारों तक सिमट कर रह गई है। आसान शब्दों में कहें तो अमीर और मध्यम वर्ग तो इलेक्ट्रिक कारें खरीद रहा है, लेकिन कम बजट वाला आम आदमी अभी भी इससे दूरी बनाए हुए है।

जाटो डायनेमिक्स (Jato Dynamics) के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय EV बाजार में 20 से 30 लाख रुपये की रेंज वाली कारों की हिस्सेदारी में जबरदस्त इजाफा हुआ है। वित्त वर्ष 2024 में इस सेगमेंट की हिस्सेदारी मात्र 8.6 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर 24 प्रतिशत और अब 2026 में 35.7 प्रतिशत पर पहुंच गई है।

इसके उलट, 10 लाख रुपये से कम वाली कारों का बाजार लगातार सिकुड़ रहा है। दो साल पहले यह सेगमेंट कुल बिक्री का 12.5 प्रतिशत हुआ करता था, जो अब घटकर केवल 6 प्रतिशत रह गया है। यह डेटा साफ इशारा करता है कि एंट्री-लेवल यानी सस्ती इलेक्ट्रिक कारों को लेकर ग्राहकों का उत्साह ठंडा पड़ रहा है।

मिड-साइज SUV का दबदबा और मिडिल क्लास का रुझान

बाजार के जानकारों का कहना है कि भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियां फिलहाल ‘मिडल-इनकम फेनोमेनन’ यानी मध्यम आय वर्ग का शौक बनकर उभरी हैं। रवि भाटिया के अनुसार, 15 से 30 लाख रुपये का बजट वह रेंज है जहां ग्राहकों को अपनी पसंद के फीचर्स, अच्छी रेंज और वाजिब कीमत का तालमेल मिल रहा है। यही वजह है कि मिड-साइज SUV सेगमेंट में नई लॉन्चिंग और अपडेटेड मॉडल्स ने बिक्री के आंकड़ों को आसमान पर पहुंचा दिया है।

Also Read: मर्सिडीज-बेंज को लग्जरी कारों की भारी डिमांड की उम्मीद, संघर्ष के बावजूद खरीदारों का उत्साह बरकरार

महिंद्रा की XEV 9E और BE 6 जैसे नए मॉडल्स ने बाजार में आते ही कई गुना ग्रोथ दर्ज की है। वहीं टाटा मोटर्स की नेक्सॉन EV (Nexon EV) अपनी पकड़ मजबूत बनाए हुए है। इसके विपरीत, सस्ती कारों के सेगमेंट में या तो बिक्री स्थिर है या उसमें गिरावट देखी जा रही है।

टाटा मोटर्स पैसेंजर इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के एमडी शैलेश चंद्रा का भी मानना है कि 12 लाख रुपये से कम के बजट में इलेक्ट्रिक कारों का बाजार फिलहाल न के बराबर है। आंकड़ों के अनुसार, 12 लाख से ऊपर वाले सेगमेंट में EV की पहुंच करीब 10 प्रतिशत है, जबकि इससे कम कीमत वाले बड़े बाजार (जहां सालाना 30 लाख से ज्यादा गाड़ियां बिकती हैं) में EV की पैठ केवल 1.5 प्रतिशत ही रह गई है।

बैटरी की लागत और सरकारी नियमों का दबाव

इलेक्ट्रिक कारों के इस असंतुलित विकास के पीछे सबसे बड़ी वजह बैटरी की कीमत है। ऑटो इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक बैटरी सस्ती नहीं होगी, तब तक इलेक्ट्रिक कारों की कीमत पेट्रोल-डीजल वाली कारों के बराबर लाना मुश्किल होगा।

यही कारण है कि कंपनियां अभी सस्ते मॉडल लाने के बजाय उन कारों पर ध्यान दे रही हैं जहां उनका मुनाफा सुरक्षित रहे। हालांकि, शहरों में ज्यादा चलने वाली गाड़ियों के लिए इलेक्ट्रिक मॉडल अब किफायती साबित हो रहे हैं, लेकिन शुरुआती कीमत और रेंज की चिंता अभी भी आम खरीदार के आड़े आ रही है।

आने वाले समय में सरकारी नियम भी इस बाजार की दिशा तय करेंगे। ‘कैफे-3’ (CAFE III) जैसे सख्त उत्सर्जन मानकों के लागू होने से ऑटो कंपनियों के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियां बनाना सिर्फ पसंद नहीं बल्कि मजबूरी बन जाएगा। इन नियमों के तहत इलेक्ट्रिक गाड़ियां बनाने वाली कंपनियों को वित्तीय लाभ मिलेंगे, जिससे भविष्य में सप्लाई बढ़ने की उम्मीद है।

शैलेश चंद्रा के मुताबिक, भारत में EV को मुख्यधारा में लाने के लिए एंट्री-लेवल सेगमेंट यानी 12 लाख रुपये से कम वाली कारों के बाजार को भेदना सबसे जरूरी है, क्योंकि देश की 65 प्रतिशत मांग वहीं से आती है। फिलहाल भारत का EV बाजार मध्यम वर्ग के कंधों पर सवार होकर तेजी से तो बढ़ रहा है, लेकिन इसे ‘मास मार्केट’ बनने के लिए अभी एक लंबी दूरी तय करनी है।

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First Published - April 26, 2026 | 7:08 PM IST

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