देश के फार्मास्युटिकल उद्योग के दिग्गजों ने तीव्र, सरल तथा और ज्यादा भरोसेमंद नियमन की जोरदार वकालत की है। उन्होंने आगाह किया कि मंजूरियों में देरी, क्लीनिकल परीक्षणों का कमजोर बुनियादी ढांचा और भारतीय नवाचार की घरेलू स्तर पर खराब स्वीकार्यता इस क्षेत्र को ऐसे समय में पीछे खींच रही है, जब वैश्विक प्रतिस्पर्धी, खास तौर पर चीन, मूल्य श्रृंखला में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
मेड इन इंडिया – द स्टोरी ऑफ देश बंधु गुप्ता, ल्यूपिन ऐंड इंडियन फार्मा’ किताब की लॉन्चिंग पर भारतीय फार्मा के इतिहास और भविष्य पर समूह चर्चा के दौरान उद्योग के दिग्गजों ने कहा कि अगर भारत जेनेरिक प्रधान प्रारूप से ज्यादा मूल्य वाले नवाचार की ओर बढ़ना चाहता है, तो उसे तुरंत अपने नियामकीय तंत्र में सुधार करना होगा।
उद्योग के इन दिग्गजों में सन फार्मा के प्रबंध निदेशक दिलीप सांघवी, सिप्ला के चेयरमैन डॉ. यूसुफ हामिद, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज के प्रबंध निदेशक जीवी प्रसाद, ल्यूपिन की मुख्य कार्य अधिकारी विनीता गुप्ता और यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ केमिकल टेक्नोलजी (यूडीसीटी) में प्रोफेसर डॉ. एमएम शर्मा शामिल थे।
उद्योग के दिग्गजों ने बताया कि किस तरह नियामकीय देरी, खास तौर पर क्लीनिकल परीक्षणों की मंजूरी में विलंब, भारतीय कंपनियों को शुरुआती चरण वाले अध्ययन विदेशों में करने के लिए मजबूर कर रही है।
सांघवी ने कहा कि भारत में मंजूरी मिलने से पहले चरण-1 के परीक्षण अक्सर बेल्जियम या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पूरे हो जाते हैं, जिससे यह पता चलता है कि अगर देश नवाचार का हब बनना चाहता है तो प्रक्रिया को आसान बनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सरकार के हालिया कदम इस इरादे का संकेत देते हैं, जिनमें उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन की तर्ज पर पीआरआईपी योजना और 1,000 क्लीनिकल परीक्षण केंद्रों सेंटर को प्रमाणपत्र देने की योजना शामिल है, लेकिन अहम बात इन पर अमल करना है।