हर बार जब टैक्सपेयर्स इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की सोचते हैं तो उनके दिमाग में एक ही सवाल घूमता है कि “इस बार कौन-सा फॉर्म भरना है?” सालों से चले आ रहे नियमों और मुश्किल फॉर्म्स की आदत ऐसी बन गई है कि अधिकतर टैक्सपेयर्स बिना ज्यादा सोचे वही पुराना रास्ता पकड़ लेते हैं। लेकिन अब वो दौर बदलने वाला है।
भारत का इनकम टैक्स सिस्टम एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। नया कानून आ रहा है, नए नियम बन रहे हैं और टैक्स फाइल करने का तरीका पहले से ज्यादा डिजिटल, ज्यादा डिटेल्ड और ज्यादा डिसिप्लिन्ड होने वाला है।
भारत में अभी टैक्स को लेकर जो कानून है वो साल 1961 से ही चल रहा है। लेकिन अब यह अपने आखिरी दिनों में है। उसकी जगह नया इनकम टैक्स एक्ट, 2025 लेगा, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू हो जाएगा। इस नए कानून को चलाने के लिए सरकार ने इनकम टैक्स रूल्स, 2026 का ड्राफ्ट तैयार किया है। साथ ही, ITR फॉर्म्स को भी नए सिरे से बनाया गया है।
हालांकि, अभी सब कुछ फाइनल नहीं हुआ है। सरकार ने इन ड्राफ्ट रूल्स और फॉर्म्स को पब्लिक में रखा है, ताकि टैक्सपेयर्स, प्रोफेशनल्स और दूसरे लोग अपनी राय दे सकें। ये फीडबैक देने का मौका 15 दिनों तक है, यानी 22 फरवरी 2026 तक। उसके बाद ये रूल्स नोटिफाई हो जाएंगे।
सबसे बड़ा सवाल तो ITR-1 से ITR-7 के बारे में है। आने वाले ITR की शक्ल तो वही रहेगी, लेकिन अब नियम ज्यादा साफ-सुथरे और सख्त हो जाएंगे। सिम्पल रिटर्न्स को अब ज्यादा सीमित कर दिया गया है। मतलब, जो लोग आसान फॉर्म इस्तेमाल करते थे, उन्हें अब ज्यादा सोच-समझकर चुनना पड़ेगा। कुल मिलाकर, सैलरीड लोग, बिजनेस वाले, कंपनियां, फर्म्स और ट्रस्ट्स के लिए ITR का स्ट्रक्चर वैसा ही है। लेकिन डिस्क्लोजर में पहले से कई बदलाव आने वाले हैं।
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ITR-1, जिसे सहज भी कहते हैं, अभी भी सबसे सिंपल रहने वाला है। ये उन रेजिडेंट इंडिविजुअल्स (देश में रहने वाले आम लोग) के लिए है जो सैलरी, एक घर की प्रॉपर्टी और इंटरेस्ट जैसी दूसरी इनकम से कमाते हैं। ड्राफ्ट रूल्स में साफ लिखा है कि ये सिर्फ स्ट्रेट फॉरवर्ड केस के लिए है। इसमें ज्यादा मुश्किल कुछ भी नहीं है।
फाइलिंग के तरीके में एक बड़ा पॉइंट है। अब इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग डिफॉल्ट हो गई है। पेपर फाइलिंग सिर्फ 80 साल या उससे ज्यादा उम्र के सुपर सीनियर सिटीजन के लिए है। बाकी सबके लिए या तो इलेक्ट्रॉनिक वेरिफिकेशन कोड (EVC) से या डिजिटल सिग्नेचर से फाइलिंग लागू कर दिया गया। मतलब, अब पेन-पेपर का जमाना गया। ये बदलाव टैक्स सिस्टम को ज्यादा मॉडर्न और तेज बनाने के लिए है। जो लोग सैलरी और सिंपल इनकम वाले हैं, उनके लिए ITR-1 अभी भी बेस्ट ऑप्शन है, लेकिन अगर कुछ भी एक्स्ट्रा हुआ तो उन्हें ITR-2 की तरफ जाना पड़ेगा।
ITR-2 उन व्यक्तियों और हिंदू अनडिवाइडेड फैमिलीज (HUFs) के लिए है जिनके पास बिजनेस या प्रोफेशन से इनकम नहीं है। इसमें कैपिटल गेंस, कई घरों की प्रॉपर्टी या विदेश से आय वाले लोग आते हैं। नए नियम में ITR-2 को डिफॉल्ट फॉर्म की तरह रखा गया है। मतलब, अगर ITR-1 के लिए क्वालीफाई नहीं कर रहे हो तो सीधे ITR-2 फाइल कर सकते हैं।
नए इनकम टैक्स एक्ट, 2025 में कैपिटल गेंस का नया फ्रेमवर्क है और फॉरेन एसेट्स के नियम सख्त हैं। इसलिए ITR-2 में डिस्क्लोजर्स (खुलासा) ज्यादा डिटेल्ड होने वाले हैं। जो लोग निवेश करते हैं या विदेश से कमाते हैं, उन्हें अब ज्यादा जानकारी देनी पड़ेगी। ये फॉर्म उन लोगों के लिए सही है जिनकी आय थोड़ा घुमावदार है, लेकिन बिजनेस नहीं है। कुल मिलाकर, ITR-2 अब और जरूरी हो जाएगा क्योंकि सिम्पल केस कम रहेंगे।
ITR-3 उन लोगों के लिए होता है जिनकी कमाई बिजनेस या प्रोफेशन से होती है। ड्राफ्ट रूल्स के मुताबिक, अगर कोई टैक्सपेयर प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन (Presumptive Taxation) या आसान रिटर्न के दायरे में नहीं आता, तो उसे ITR-3 ही भरना होगा।
नए नियमों में पर्क्विजिट्स (Perquisites), कैपिटल गेंस और खास तरह की इनकम पर ज्यादा फोकस किया गया है। इसका असर ये होगा कि ITR-3 भरते वक्त पहले से ज्यादा जानकारी देनी पड़ेगी। प्रोफेशनल्स, ट्रेडर्स और ज्यादा कमाई करने वालों के लिए यह फॉर्म अब और डिटेल्ड हो जाएगा। बिजनेस करने वालों को अपनी इनकम से जुड़ी ज्यादा जानकारी शेयर करनी होगी। कुल मिलाकर, बड़े बिजनेस वालों के लिए ITR-3 की अहमियत और बढ़ने वाली है।
ITR-4, जिसे सुगम कहा जाता है, अभी भी प्रेसम्प्टिव टैक्सेशन वाले मामलों के लिए रहेगा। लेकिन नए ड्राफ्ट नियमों में साफ कर दिया गया है कि किन लोगों को यह फॉर्म इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होगी। ऐसे में कई टैक्सपेयर्स अब ITR-4 के दायरे से बाहर हो जाएंगे।
अगर आपके पास विदेश में कोई एसेट या इनकम है, आप किसी कंपनी में डायरेक्टर हैं, अनलिस्टेड शेयर रखते हैं, सालाना कमाई 50 लाख रुपये से ज्यादा है, दो से अधिक घर हैं, पिछला नुकसान आगे बढ़ाया गया है या खेती से कमाई 5,000 रुपये से ऊपर है, तो आप ITR-4 नहीं भर पाएंगे। इसका मतलब यह है कि सुगम अब हर किसी के लिए आसान विकल्प नहीं रहा।
ऐसे कई छोटे कारोबारी और प्रोफेशनल्स, जो पहले ITR-4 भरते थे, अब ITR-3 की ओर जाना पड़ सकता है। ये सख्ती टैक्स सिस्टम को ज्यादा सही और पारदर्शी बनाने के लिए की गई है।
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ITR-5 फर्म्स, LLP, AOP और BOI के लिए होता है, जबकि कंपनियों को ITR-6 भरना होता है। इन फॉर्म्स का ढांचा पहले जैसा ही रखा गया है, लेकिन नए ड्राफ्ट नियमों में डिजिटल कंप्लायंस, ऑडिट से जुड़ी जानकारी और रिपोर्टिंग की शर्तों को और सख्त किया गया है। कंपनियों के लिए डिजिटल सिग्नेचर से रिटर्न फाइल करना जरूरी रहेगा।
इसके अलावा, बिजनेस रीऑर्गनाइजेशन और ब्लॉक असेसमेंट से जुड़े नए रिटर्न्स के साथ इनका तालमेल भी और मजबूत किया गया है। कुल मिलाकर, बाहर से सब कुछ पुराना दिखेगा, लेकिन अंदर के नियम पहले से ज्यादा कड़े होंगे।
ITR-7 चैरिटेबल ट्रस्ट्स, राजनीतिक पार्टियों और छूट पाने वाली संस्थाओं के लिए होता है। नए नियमों में पारदर्शिता और डिजिटल कंप्लायंस पर खास जोर दिया गया है। अब ऑडिट रिपोर्ट, डोनेशन की जानकारी और फंड्स के इस्तेमाल को सीधे रिटर्न से जोड़ा जाएगा। ड्राफ्ट रूल्स साफ कहते हैं कि अगर रिटर्न देर से या गलत तरीके से फाइल हुआ, तो रजिस्ट्रेशन या टैक्स छूट पर असर पड़ सकता है। यानी अब ट्रस्ट्स और संस्थाओं को पहले से कहीं ज्यादा साफ और जवाबदेह रहना होगा।
टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, नए नियम पूरे ITR सिस्टम को एक ही दिशा में ले जा रहे हैं। रिटर्न फाइल करना अब पूरी तरह डिजिटल होगा, आसान फॉर्म्स सिर्फ सीमित लोगों के लिए रहेंगे और टैक्सपेयर्स को पहले से ज्यादा जानकारी देनी पड़ेगी। टैक्स विभाग भी अब स्ट्रक्चर्ड डेटा पर ज्यादा भरोसा करेगा। सरकार ने इन नियमों पर लोगों से राय मांगी है, जिसके लिए 22 फरवरी 2026 तक का समय दिया गया है। जब 1 अप्रैल 2026 से नया कानून लागू होगा, तो भले ही ITR के नाम वही रहें, लेकिन रिटर्न भरने का तरीका पहले जैसा नहीं रहेगा।