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Budget 2026: विदेश में पढ़ाई और ट्रैवल के लिए रेमिटेंस नियमों में बदलाव की मांग, TCS हो और सरल

एक्सपर्ट की मांग है कि विदेश में पढ़ाई, मेडिकल और जरूरी खर्चों के लिए रेमिटेंस नियमों और सरल किया जाए ताकि लोगों के लिए योजना बनाना आसान हो

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सुरभि ग्लोरिया सिंह   
Last Updated- January 24, 2026 | 12:13 PM IST

केंद्रीय बजट 2026 नजदीक आ रहा है, ऐसे में विदेश में पढ़ाई करने वाले, काम करने वाले या घूमने जाने वाले भारतीय चाहते हैं कि पैसे विदेश भेजने में नियम आसान हों, कम झंझट हो और पहले से कैश फ्लो पर ज्यादा दबाव न पड़े।

पिछले साल के बजट में टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स (TCS) के नियमों में बदलाव हुए थे, खासकर लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत। अब लोग मांग कर रहे हैं कि नियम और भी सिंपल हों, एजुकेशन और जरूरी खर्चों के लिए साफ कैटेगरी हो और पहले से पैसे जमा करने की टेंशन कम हो।

लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम क्या है?

लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम 2004 में शुरू हुई थी। इसके तहत भारतीय रहने वाले लोग (बच्चों समेत) हर फाइनेंशियल ईयर में 2,50,000 डॉलर तक पैसे विदेश भेज सकते हैं। ये पैसे करंट अकाउंट या कैपिटल अकाउंट ट्रांजेक्शन के लिए हो सकते हैं या फिर दोनों मिलाकर भी।

जब स्कीम शुरू हुई थी, तब लिमिट सिर्फ 25,000 डॉलर थी। समय के साथ इस लिमिट को कई बार बढ़ाया गया।

विदेश में पैसे भेजने पर TCS क्या है?

टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स (TCS) वो टैक्स है जो बैंक या ऑथराइज्ड डीलर उस वक्त काटते हैं जब कोई व्यक्ति LRS के तहत पैसे विदेश भेजता है। ये कई तरह के ओवरसीज पेमेंट पर लगता है, जैसे:

  • हायर एजुकेशन
  • मेडिकल ट्रीटमेंट
  • परिवार के सदस्यों के लिए लिविंग एक्सपेंस
  • इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट
  • ट्रैवल और टूर पैकेज

ये टैक्स जो कटता है, वो व्यक्ति के फाइनल इनकम टैक्स में एडजस्ट हो जाता है या टैक्स रिटर्न फाइल करने के बाद रिफंड मिल जाता है।

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बजट 2025 में क्या बदलाव आए?

पहले हर साल अगर कोई परिवार 7 लाख रुपये से ज्यादा विदेश भेजता था, तो उस पर TCS लगता था। बजट 2025 में इस लिमिट को बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दिया गया, जिससे विदेश में पढ़ाई या रहन-सहन के खर्चों वाले परिवारों को थोड़ी राहत मिली। साथ ही, जो पढ़ाई एजुकेशन लोन से फंड की गई थी, उस पर TCS नहीं लगाया जाएगा।

बजट 2026 से क्या उम्मीदें हैं?

पृथ्वी एक्सचेंज के मैनेजिंग डायरेक्टर पवन कवाद ने कहा कि LRS के तहत TCS की वजह से लोगों ने पैसे भेजना थोड़ा कम किया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे अनऑफिशियल चैनलों की तरफ चले गए हैं।

कवाद के मुताबिक, “RBI के डेटा से साफ पता चलता है कि TCS में तेजी, खासकर ज्यादातर नॉन-एसेंशियल रेमिटेंस पर 20% टैक्स के बाद, LRS के जरिए भेजे जाने वाले पैसे कम हुए हैं। इसके कारण ट्रैवल और विदेशी निवेश जैसे खर्चे टल गए या घट गए।”

उन्होंने यह भी कहा कि अनऑफिशियल चैनलों पर जाने का कोई ठोस सबूत नहीं है। वो कहते हैं “डेटा बताता है कि रेमिटेंस सिर्फ कम या टली हैं, बदली नहीं गई हैं। बाद में पॉलिसी बदलाव से भी माना गया कि ज्यादा TCS के कारण लीगल फ्लो धीमा हुआ था।”

ओवरसीज एजुकेशन पेमेंट पर असर

यूनिवर्सिटी लिविंग के फाउंडर और CEO सौरभ अरोड़ा ने कहा कि TCS की वजह से परिवारों ने विदेश में पढ़ाई के लिए पैसे भेजने की योजना बदल दी है।

सौरभ अरोड़ा कहते हैं, “LRS के तहत एजुकेशन से जुड़े रेमिटेंस FY 2024 में 3.48 बिलियन डॉलर से FY 2025 में करीब 2.92 बिलियन डॉलर तक गिर गए, यानी लगभग 16% की कमी आई। इसके पीछे कई कारण हैं। अब परिवार ट्यूशन और सेटलमेंट के पैसे साल भर में बांटते हैं और लिमिट, टाइमिंग और डॉक्यूमेंटेशन पर ज्यादा ध्यान देते हैं।”

उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में एडमिशन साइकिल धीमी होने और करेंसी मूवमेंट को भी इसका कारण बताया।

अरोड़ा ने कहा, “TCS ने परिवारों पर कैश फ्लो का दबाव बढ़ाया, लेकिन यह अकेली वजह नहीं थी।” उन्होंने बताया कि बजट 2025 ने थ्रेशोल्ड 10 लाख रुपये तक बढ़ाकर और लोन से फंडेड एजुकेशन को TCS से छूट देकर कुछ राहत दी।

उन्होंने कहा, “बजट 2026 में उम्मीद है कि ओवरसीज एजुकेशन को LRS में एक स्पष्ट कैटेगरी में रखा जाए, थ्रेशोल्ड सही हो और TCS दर कम हो। इससे परिवारों और ऑथराइज्ड डीलरों के लिए योजना बनाना आसान हो जाएगा।”

एजुकेशन बनाम ट्रैवल से जुड़े रेमिटेंस

कवाद ने कहा कि ज्यादा TCS रेट ने एजुकेशन और ट्रैवल से जुड़े फॉरेक्स डिमांड पर अलग-अलग असर डाला है।

कवाद कहते हैं, “ट्रैवल से जुड़ी फॉरेक्स डिमांड काफी कम हुई है, क्योंकि ज्यादातर नॉन-एसेंशियल रेमिटेंस पर 20% TCS से आगे खर्च बढ़ गया और लिक्विडिटी पर दबाव पड़ा। दूसरी तरफ, एजुकेशन से जुड़ी फॉरेक्स डिमांड ज्यादा मजबूत रही, क्योंकि पढ़ाई के खर्च ज्यादातर जरूरी होते हैं और पॉलिसी से कुछ राहत भी मिली।”

एजुकेशन और मेडिकल रेमिटेंस को TCS से बाहर करने की मांग

कवाद और अरोड़ा दोनों का कहना है कि एजुकेशन और मेडिकल रेमिटेंस को TCS नियमों से अलग रखा जाए।

कवाद कहते हैं “ये पेमेंट जरूरत के होते हैं, चॉइस के नहीं। इन पर ज्यादा TCS से परिवारों और मरीजों को अनावश्यक लिक्विडिटी स्ट्रेस होता है। PAN-बेस्ड रिपोर्टिंग, बैंक चेक और इनकम-टैक्स डिस्क्लोजर से पहले ही काफी ऑडिट ट्रेल मिल जाता है।”

उन्होंने कहा कि इन कैटेगरी से TCS हटाने से झंझट कम होगी और ट्रांजेक्शन फॉर्मल चैनल में ही रहेंगे।

फॉरेक्स इंडस्ट्री के लिए ऑपरेशनल चुनौतियां

कवाद ने कहा कि ज्यादा TCS ने फॉरेक्स कंपनियों और ऑथराइज्ड डीलरों के लिए काम करना मुश्किल कर दिया है।

उन्होंने बताया, “ट्रांजेक्शन लेवल पर कंपनियों को हर कस्टमर के रेमिटेंस को ट्रैक करना पड़ता है, कई बैंकों में रेट चेंज और एग्जेम्प्शन मैनेज करना होता है, रियल-टाइम PAN वैलिडेशन, TCS कैलकुलेशन, रिपोर्टिंग और रिकॉन्सिलिएशन करनी पड़ती है। इससे प्रोसेसिंग जटिल हो गई है और टर्नअराउंड टाइम बढ़ गया है।”

लोगों के लिए मुख्य समस्या लिक्विडिटी है। कवाद कहते हैं, “कस्टमर को पहले ज्यादा रकम ब्लॉक करनी पड़ती है, भले ही TCS बाद में एडजस्ट या रिफंड हो जाए। कई ट्रांजेक्शन टल जाते हैं, बांट दिए जाते हैं या छोटे कर दिए जाते हैं ताकि लिमिट के अंदर रहें।”

अरोड़ा ने कहा कि बजट 2025 में इन कुछ चिंताओं को माना गया था। उन्होंने कहा, “बजट 2026 में उम्मीद है कि 10 लाख से ऊपर सेल्फ-फंडेड एजुकेशन पेमेंट पर अभी भी 5% TCS लगेगा। परिवार इसे पहले भुगतान करता है और टैक्स फाइलिंग में एडजस्ट करता है, जिससे ट्यूशन और सेटलमेंट के समय कैश फ्लो पर असर पड़ता है।”

उन्होंने आगे कहा कि एजुकेशन और मेडिकल रेमिटेंस के लिए सरल स्ट्रक्चर बनाने से परिवारों की योजना बनाना आसान होगा और बैंकों व टैक्स अथॉरिटी का पेपरवर्क भी कम होगा।

First Published : January 24, 2026 | 12:13 PM IST